
केरल के स्वतंत्रता संग्राम के उथल-पुथल भरे दौर को प्रस्तुत करते हुए दिजो जोस एंटोनी निर्देशित ‘पल्लीछत्तांबी’ फिल्म ने रिलीज के बाद दर्शकों और आलोचकों का ध्यान खींचा है। इस फिल्म की पटकथा और निर्देशन में एक पुराना और ठहराव भरा नजरिया देखने को मिलता है, जो आधुनिक सिनेमाई शैली से मेल नहीं खाता।
फिल्म की कहानी स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षों और नायकों पर आधारित है, लेकिन इसकी प्रस्तुति में नया और ताजा दृष्टिकोण न होने के कारण यह अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाती। तोविनो थॉमस द्वारा निभाया गया मुख्य किरदार अपनी दमदार एक्ट्रिंग के बावजूद इस भारी-भरकम निर्देशन के अधीन दब जाता है।
निर्देशक दिजो जोस एंटोनी ने जो ऐतिहासिक संदर्भ चुना है, वह विषय के लिए संभ्रांत और महत्वपूर्ण है, लेकिन फिल्म निर्माण के तरीके में उन्होंने पुरानी पद्धतियों से ज्यादा कुछ नया अपनाने की कोशिश नहीं की। यह फिल्म आज के दर्शकों की बढ़ती अपेक्षाओं को पूरी तरह से पूरा करने में असमर्थ रहती है।
फिल्म की पटकथा में कई जगह संवादों और दृश्यों की धीमी गति से कहानी में रूचि कम होती है। इसकी वजह यह है कि कथानक को आधुनिक रुझानों के अनुसार नहीं बदला गया है, जिससे फिल्म दर्शकों के लिए बोझिल प्रतीत होती है।
तकनीकी पक्ष से देखें तो फिल्म की छायांकन और पृष्ठभूमि संगीत अपनी भूमिका ठीक-ठाक निभाते हैं, लेकिन वह भी निर्देशक के पुराने सोच के दायरे में कहीं खो जाते हैं। यह कदम फिल्म की समग्र प्रस्तुति को और कमजोर करता है।
इसके अलावा, ‘पल्लीछत्तांबी’ की गहराई और नैतिक जटिलताओं की पूरी तरह से पड़ताल न कर पाना भी इसके कमजोर पक्षों में गिना जा सकता है। यह ऐतिहासिक ड्रामा बनाम कलाकारों के प्रदर्शन के बीच संघर्ष बनी रहती है।
आखिरकार, ‘पल्लीछत्तांबी’ आज के समय के लिए वह प्रभावपूर्ण ऐतिहासिक फिल्म साबित नहीं होती, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। पुराने फिल्म निर्माण तरीकों के चलते यह एक गंभीर विषय को अपेक्षित गंभीरता में प्रस्तुत नहीं कर पाई।
फिल्म प्रेमियों और इतिहास के प्रति रुचि रखने वालों के लिए यह फिल्म एक प्रयास जरूर है, लेकिन निश्चित ही इसे एक समय-सापेक्ष, ताजा और प्रभावशाली प्रस्तुति की जरूरत थी जिससे यह और अधिक जीवंत और असरदार साबित हो सके।












