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अपणायत के सेल्फी मोड में सरकार, गड्ढ़ों में भविष्य खोजते युवा

राज्य की राजनीति भी बड़ी अदभुत चीज है। यहां हर मौसम का अपना अलग सरकारी संस्करण होता है। गर्मी पड़े तो जनसंवाद, बारिश आए तो निरीक्षण, चुनाव नजदीक हों तो विकास यात्रा और जनता सवाल पूछने लगे तो अपणायत। इन दिनों प्रदेश में अपणायत ऋतु चल रही है। मुख्यमंत्री गांव-गांव घूम रहे हैं, किसी चौपाल में चाय पी रहे हैं, कहीं बच्चों के साथ सेल्फी ले रहे हैं, तो कहीं किसी बुजुर्ग के कंधे पर हाथ रखकर कैमरे को यह भरोसा दिला रहे हैं कि सरकार और जनता के बीच दूरी कम हो गईं है। इधर प्रदेश का एक युवा अपने कमरे में बंद बैठा है। टेबल पर नीट की किताबें खुली हैं, लेकिन उसका भरोसा बंद हो चुका है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह डॉक्टर बनने की तैयारी करे या सिस्टम की बीमारी का इलाज ढूंढे। क्योंकि परीक्षा में मेहनत कम और मैनेजमेंट ज्यादा काम आने लगा है। परीक्षा केंद्रों से लेकर रिजल्ट तक ऐसी कहानियां निकल रही हैं कि अब छात्र बायोलॉजी से ज्यादा सेटिंग साइंस को महत्वपूर्ण मानने लगे हैं। लेकिन सरकार चिंतित नहीं है। आखिर युवा का काम ही क्या है? वह या तो परीक्षा दे, या विरोध करे, या फिर अगली भर्ती का इंतजार करे। सरकार को तो फिलहाल गांव में अपणायत की फसल बोनी है। मुख्यमंत्रीजी गांव में घूमते हुए इतने सहज दिख रहे हैं मानो प्रदेश में सब कुछ ठीक चल रहा हो। ऐसा लग रहा है जैसे पूरा प्रशासन किसी पर्यटन विभाग की डॉक्यूमेंट्री शूट कर रहा हो। प्रदेश में इन दिनों सडक़ें भी बड़ी भावुक हो गई हैं। नई सडक़ों की घोषणाएं सुनते ही पुरानी सडक़ें टूटकर बिखर जाती हैं। उन्हें पता है कि अब उनका नंबर खत्म हो चुका है। नेताजी के क्षेत्र में नई सडक़ स्वीकृत हो जाए, इससे बड़ा विकास सूचकांक अब कोई नहीं। चाहे पुरानी सडक़ पर इतने गड्ढ़े हो कि कार चलाते-चलाते आदमी आध्यात्मिक यात्रा पर निकल जाए, लेकिन नई सडक़ का शिलान्यास जरूरी है। क्योंकि राजनीति में सडक़ की मजबूती नहीं, फीते की मजबूती मायने रखती है। प्रदेश का नागरिक भी अब समझदार हो गया है। वह जानता है कि सडक़ बनते समय उसमें डामर कम और फोटो ज्यादा डाले जाते हैं। ठेकेदार सडक़ नहीं बनाता, बल्कि भविष्य के गड्ढों की नींव रखता है। पहली बारिश आते ही सडक़ अपने मूल स्वरूप में लौट आती है। यानी मिट्टी। फिर अधिकारी निरीक्षण करते हैं, नेता नाराजगी जताते हैं और ठेकेदार अगले टेंडर की तैयारी करता है। यह एक पवित्र लोकतांत्रिक चक्र है, जिसे तोडऩा संविधान के खिलाफ माना जा सकता है। सडक़ हादसों की खबरें इतनी आम हो चुकी हैं कि अखबारों में अब उनके लिए भावनाएं भी सीमित हो गई हैं। तेज रफ्तार, अनियंत्रित, मौके पर मौत। ये शब्द अब खबर नहीं, स्थायी कॉलम बन चुके हैं। सडक़ें इतनी टूटी हुई हैं कि वाहन चलाने वाला व्यक्ति ड्राइवर कम और एडवेंचर स्पोट्र्स खिलाड़ी ज्यादा लगता है। कहीं गड्ढे बचाओ, कहीं आवारा पशु बचाओ, कहीं अचानक गायब हो जाने वाले डिवाइडर से बचो। ऊपर से प्रशासन कहता है सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। जनता पूछना चाहती है साहब, सडक़ हटी तो क्या करें? भ्रष्टाचार की हालत तो यह है कि अब वह किसी विभाग में नहीं रहता, बल्कि पूरे सिस्टम का आधिकारिक शुभंकर बन चुका है। पहले लोग चोरी-छिपे रिश्वत लेते थे, अब बड़े आत्मविश्वास से लेते हैं। जैसे यह उनका संवैधानिक अधिकार हो। आम आदमी भी अब रिश्वत देते समय शर्मिंदा नहीं होता, बल्कि डरता केवल इस बात से है कि कहीं कम न पड़ जाए। सरकारी दफ्तरों में फाइलें अब पंखों से नहीं, नोटों की हवा से उड़ती हैं। प्रदेश का युवा सबसे ज्यादा भ्रमित है। उसे बचपन से सिखाया गया कि मेहनत करो, ईमानदारी से पढ़ो, आगे बढ़ोगे। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसे पता चलता है कि आगे वही बढ़ता है जिसकी पहुंच ऊपर तक हो। बाकी लोग केवल कोचिंग सेंटरों के पोस्टर में मुस्कुराने के लिए रह जाते हैं। नीट जैसी परीक्षाओं में धांधली की खबरें आने के बाद अब छात्रों को लगता है कि परीक्षा हॉल में वे प्रश्नपत्र हल नहीं कर रहे, बल्कि अपने भरोसे का पोस्टमार्टम कर रहे हैं। लेकिन सरकार के पास हर सवाल का एक सुंदर उत्तर है जांच होगी। इस देश में जांच एक ऐसी रहस्यमयी प्रक्रिया है, जिसमें समय के साथ जनता का गुस्सा समाप्त हो जाता है और फाइलें स्थायी निद्रा में चली जाती हैं। जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट आती है, कुछ छोटे अधिकारी निलंबित होते हैं और फिर सब सामान्य हो जाता है। जैसे कुछ हुआ ही न हो। आखिर लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां हर घोटाला कुछ दिनों बाद पुरानी खबर बन जाता है। शीर्ष नेताओं को लोग गांवों में लोग फूल-मालाएं पहना रहे हैं। बच्चे कविताएं सुना रहे हैं। प्रशासन पहले से तय कर रहा है कि किस किसान को क्या बोलना है। ऐसा लगता है जैसे पूरा प्रदेश एक विशाल रियलिटी शो बन गया हो। इंडियाज बेस्ट अपणायत। कैमरे के सामने सब मुस्कुरा रहे हैं, कैमरे के पीछे बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था चाय पी रही है। राजनीति में आजकल संवेदनशीलता भी इवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा बन चुकी है। कोई हादसा हो जाए तो नेता ट्वीट कर देता है दुखद। फिर अगले कार्यक्रम में ढोल-नगाड़ों के साथ मंच पर पहुंच जाता है। जनता भी अब अभ्यस्त हो चुकी है। उसे मालूम है कि उसकी समस्याएं केवल भाषणों में जीवित रहती हैं। जमीन पर वे अक्सर फाइलों में दम तोड़ देती हैं। प्रदेश की हालत उस छात्र जैसी हो गई है, जो परीक्षा में फेल होने के बाद भी मुस्कुराकर फोटो खिंचवा रहा हो ताकि रिश्तेदारों को शक न हो। ऊपर से विकास के होर्डिंग चमक रहे हैं, नीचे गड्ढों में वाहन फंस रहे हैं। मंचों पर रोजगार की बातें हो रही हैं, कोचिंग सेंटरों में छात्र निराशा की दवाइयां खोज रहे हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि हर समस्या का समाधान अगली घोषणा में खोजा जा रहा है। सडक़ टूटी, नई सडक़ घोषित करो। परीक्षा में गड़बड़ी, नई समिति बना दो। भ्रष्टाचार बढ़ा, हेल्पलाइन जारी कर दो। जनता परेशान, अपणायत यात्रा निकाल दो। ऐसा लगता है कि सरकार प्रशासन नहीं चला

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जांच के नाम पर जांच, दो टेस्ट में करोड़ों का स्वास्थ्य लाभ?

सीएमएचओ पर खरीद अनियमितताओं के आरोप, ज्ञापन पहुंचा कलेक्टर तक सिरोही। जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों दो जांचों में सम्पूर्ण समाधान मॉडल पर चलती दिख रही है। भाजपा जिला मीडिया प्रभारी रोहित खत्री ने जिला कलक्टर रोहिताश्व सिंह तोमर को ज्ञापन सौंपते हुए आरोप लगाया कि सीएमएचओ डॉ. दिनेश खराड़ी और डिप्टी सीएमएचओ डॉ. सत्य प्रकाश शर्मा ने एनएचएम राशि के उपयोग में ऐसे नवाचार किए हैं, जिनसे सरकार को राजस्व हानि और आमजन को जांच से दूरी दोनों का अनुभव एक साथ मिल रहा है। 143 जांचों का बजट, लेकिन फोकस सिर्फ 2 पर ज्ञापन के अनुसार, मुख्यमंत्री निशुल्क जांच योजना के तहत उप स्वास्थ्य केन्द्र से जिला अस्पताल तक 143 प्रकार की जांचों के लिए बजट मिलता है। लेकिन आरोप है कि इस व्यापक व्यवस्था को सरलीकरण की राह पर ले जाते हुए बजट का बड़ा हिस्सा सिर्फ दो जांचों ग्लूकोमीटर और हीमोग्लोबीन पर केंद्रित कर दिया गया। जहां उप स्वास्थ्य केन्द्र स्तर पर 14, पीएचसी पर 66, सीएचसी पर 101 और जिला अस्पताल में 143 जांचों की सुविधा होनी चाहिए, वहां जमीनी हकीकत यह बताई जा रही है कि बाकी जांचें मानो अवकाश पर चली गई हैं। परिणामस्वरूप मरीजों को या तो इंतजार करना पड़ रहा है या फिर पड़ोसी राज्य गुजरात की ओर रुख करना पड़ रहा है। एकल स्रोत निविदा, प्रतिस्पर्धा से परहेज? तीन गुना दाम पर खरीद के आरोप खत्री ने आरोप लगाया कि तीन-चार आइटम की खरीद के लिए बार-बार एकल स्रोत उपापन (सिंगल सोर्स प्रोक्योरमेंट) अपनाया गया। लगभग 150 लाख रुपए का क्रय बाजार दर से तीन गुना अधिक कीमत पर किए जाने की बात कही गई है। जहां आमतौर पर सबसे कम बोली की तलाश होती है, वहां यहां सबसे भरोसेमंद स्रोत की परंपरा इतनी मजबूत दिखी कि खुली निविदा की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। बजट की मांग बनाम बजट का मार्ग राजकीय मेडिकल कॉलेज सिरोही और जिला अस्पताल की ओर से 143 जांचों के संचालन के लिए बार-बार बजट की मांग किए जाने के पत्र भी सामने आए हैं। लेकिन आरोप है कि यह बजट संबंधित संस्थानों तक पहुंचने के बजाय सीमित जांचों की खरीद में ही खप गया। इस बीच अस्पतालों में अन्य जांचों का ठप होना न केवल मरीजों के लिए परेशानी का कारण बना, बल्कि सरकारी योजनाओं की छवि पर भी सवाल खड़े कर रहा है। हब एंड स्पोक मॉडल, खबरों में लॉन्च, जमीन पर इंतजार 17 फरवरी को समाचार पत्रों में यह दावा किया गया था कि 15 दिनों के भीतर जिले में हब एंड स्पोक मॉडल लागू हो जाएगा और 151 तक उन्नत जांचें निशुल्क उपलब्ध होंगी। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि यह मॉडल अभी भी प्रेस विज्ञप्तियों में सक्रिय है, जबकि जमीनी स्तर पर इसकी शुरुआत का इंतजार जारी है। मरीजों का विकल्प, ‘निशुल्क’ से ‘अनिवार्य यात्रा’ तक, गुजरात की ओर बढ़ते कदम जांच सुविधाओं के अभाव में मरीजों का गुजरात जाना अब एक आम दृश्य बनता जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जब योजना का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर मुफ्त जांच उपलब्ध कराना था, तो क्या यह आउटसोर्सिंग मॉडल अनजाने में लागू हो गया है? जिला कलक्टर रोहिताश्व सिंह तोमर ने मामले में कमेटी गठित कर निष्पक्ष जांच कराने का आश्वासन दिया है। —-    

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गैस की पाइप लो या चूल्हा ठंडा रखो!

देश में अब विकास पाइपलाइन से होकर गुजर रहा है और अगर आपके घर तक वो पाइप नहीं, तो समझिए आपकी रसोई की किस्मत भी नोटिस के भरोसे है। सरकार का नया फरमान कुछ ऐसा है कि अब एलपीजी सिलेंडर भी पूछेगा भाई पीएनजी लिया कि नहीं? अगर जवाब ‘ना’ हुआ, तो 90 दिन बाद वो भी कहेगा अब मैं चलता हूं, तुम पाइप संभालो! जनता पहले महंगाई से परेशान है, अब कनेक्शन से परेशान है। पहले रिश्ते जोडऩा मुश्किल था, अब गैस कनेक्शन जोडऩा अनिवार्य हो गया है। फर्क बस इतना है कि रिश्तों में नोटिस नहीं आता, यहां 90 दिन का अल्टीमेटम भी है। सरकार का तर्क भी कम दिलचस्प नहीं है जहां पीएनजी नहीं है, वहां एलपीजी बचानी है। यानी जिनके पास विकल्प है, वो मजबूरी बन जाए, और जिनके पास मजबूरी है, वो विकल्प का इंतजार करें। इधर बेचारी जनता हिसाब लगा रही है कि 1090 में कनेक्शन या 1000 में सिलेंडर? फर्क सिर्फ इतना कि एक में आग तुरंत मिलेगी, दूसरे में नियमों की गर्मी! अब रसोई में खाना कम, और नियम ज्यादा पक रहे हैं। क्योंकि नए भारत में गैस सिर्फ जलती नहीं नीति भी बनती है। बेचारी पब्लिक के पास अब रसोई में दो ही रास्ते हैं या तो पाइपलाइन अपनाओ, या सिलेंडर को अलविदा कहने की तैयारी करो। सरकारी फरमान गैस चाहिए तो लाइन में आओ वरना लाइन बंद!

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सडक़ वही, सफर वही,टोल का मूड अपग्रेड!

सडक़ों पर अब गाडिय़ां ही नहीं, जेबें भी सफर करेंगी और वो भी पेड मोड में। नेशनल हाइवे ऑथोरिटी ऑफ इंडिया ने एक बार फिर साबित कर दिया कि देश की सडक़ें भले धीरे-धीरे बनें, लेकिन टोल रेट हर साल समय पर विकास कर लेते हैं। एक अप्रेल से टोल दरों में बढ़ोतरी लागू होगी और तारीख भी ऐसी कि जनता को लगे कहीं ये अप्रेल फूल स्पेशल ऑफर तो नहीं! लेकिन नहीं, ये मज़ाक नहीं है। ये वही गंभीर मजाक है जो हर साल दोहराया जाता है। हालांकि कार वालों को राहत दी गई है। मतलब आम आदमी को मनोवैज्ञानिक सुकून मिल गया। लेकिन असली चोट कॉमर्शियल और भारी वाहनों पर पड़ी है और जैसा कि परंपरा है, वो खर्च आखिरकार आम जनता की जेब से ही वसूला जाएगा बस रास्ता थोड़ा घुमा हुआ होगा। थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर रेट तय होते हैं। यानी अगर महंगाई बढ़े तो टोल बढ़ेगा, और अगर महंगाई कम भी हो जाए तो भी टोल संभावनाओं के आधार पर बढ़ सकता है! कारों के सालाना पास की बात करेें तो पहले 3000 रुपए में 200 बार टोल पार करने का मौका मिलता था, अब 3075 रुपए में वही सुविधा मिलेगी। यानी 75 रुपए ज्यादा देकर आपको वही पुराना रास्ता, वही ट्रैफिक और वही गडढे, बस अनुभव थोड़ा महंगा हो जाएगा। कुल मिलाकर, सडक़ें अब सिर्फ दूरी कम नहीं कर रहीं बल्कि धीरे-धीरे बैंक बैलेंस भी कम कर रही हैं। हम सब इस विकास यात्रा में शामिल हैं क्योंकि रास्ता चाहे कोई भी हो, टोल तो देना ही पड़ेगा!

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सुस्त गलियारों में गूंजता सिंहनाद, सिरोही की राजनीति का परिदृश्य

सिरोही की राजनीति इन दिनों किसी पुराने रेडियो की तरह हो गई है कभी-कभार खडख़ड़ाती है, कुछ क्षणों के लिए आवाज साफ आती है, फिर अचानक खामोशी छा जाती है। ऐसा लगता है मानो राजनीति ने खुद ही ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया हो, लेकिन यह मौन भी बड़ा बोलता हुआ मौन है। गलियारों में चहल-पहल है, बयानबाजी की हल्की-फुल्की आहटें हैं, पर वह धार, वह ताप, वह जीवंतता कहीं गायब सी दिखती है, जिसके लिए सिरोही जिला प्रदेश भर में अपनी अलग पहचान रखता आया है। यह वही सिरोही है, जहां राजनीति कभी सिर्फ कुर्सी का खेल नहीं रही, बल्कि जनभावनाओं का उफान रही है। यहां चुनाव सिर्फ वोटों का जोड़-घटाव नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों, जातीय संतुलनों और व्यक्तिगत करिश्मे का अनूठा संगम होता रहा है। यहां के नेता सिर्फ नेता नहीं, बल्कि अपने-अपने समर्थकों के लिए ‘आवाज’ होते थे। लेकिन आज वही आवाजें जैसे किसी ‘वीआईपी मूवमेंट’ की गाडिय़ों के सायरन में दबती जा रही हैं। इन दिनों सिरोही की राजनीति में जो सबसे ज्यादा दिखता है, वह है—‘सुस्ती’। यह सुस्ती आलस्य वाली नहीं, बल्कि एक तरह की रणनीतिक चुप्पी है। सत्तारूढ़ पक्ष के नेता व्यस्त हैं लेकिन जनता के बीच नहीं, बल्कि कार्यक्रमों, उदघाटनों और वीआईपी दौरों में। उनके लिए राजनीति अब जनता के बीच पसीना बहाने का काम नहीं, बल्कि एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर योजनाओं की ‘फाइलिंग’ करने का माध्यम बनती जा रही है। दूसरी ओर प्रतिपक्ष है, जो अपने विरोध को भी बुनाई की तरह धीरे-धीरे गढ़ रहा है। वह जोरदार प्रहार नहीं करता, बल्कि ‘सुई-धागे’ से विरोध के पैटर्न तैयार करता है। कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस, कभी सोशल मीडिया पोस्ट, तो कभी छोटे-छोटे धरनों के जरिए वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन यह विरोध भी उतना ही ‘संयमित’ है, जितनी सत्तापक्ष की सक्रियता ‘संयमित’ है। बाण तरकश में ही क्यों हैं? राजनीति में बाण चलाने का समय और तरीका दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन सिरोही में इन दिनों बाण तरकश में ही आराम फरमा रहे हैं। नेता तैयार हैं, मुद्दे भी हैं, मंच भी हैं, लेकिन तीर चलाने का साहस या कहें इच्छा, दोनों ही कम दिखाई देते हैं। यह स्थिति वैसी ही है जैसे कोई योद्धा युद्धभूमि में खड़ा हो, लेकिन तलवार म्यान से बाहर निकालने से पहले ही सोचने लगे कि क्या जरूरत है? राजनीति में यह ‘क्या जरूरत है’ वाला भाव सबसे खतरनाक होता है, क्योंकि यहीं से जनहित पीछे छूट जाता है और व्यक्तिगत सुविधा आगे आ जाती है। कुछ समय पहले तक सिरोही की राजनीति में जमीनों के कथित खुर्द-बुर्द का मामला गरम था। आरोप-प्रत्यारोप के तीर चल रहे थे, बयानबाजी चरम पर थी और ऐसा लग रहा था कि यह मुद्दा राजनीतिक भूचाल ला देगा। लेकिन अचानक यह मामला भी ‘ठंडा’ पड़ गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या समस्या हल हो गई, या फिर समस्या को ही ‘ठंडे बस्ते’ में डाल दिया गया? हमारे यहां समस्याएं खत्म नहीं होतीं, बल्कि उन्हें ‘मैनेज’ कर लिया जाता है। राजनीति में समाधान से ज्यादा ‘संतुलन’ जरूरी हो गया है और यह संतुलन अक्सर सच्चाई के खिलाफ खड़ा नजर आता है। वीआइपी मूवमेंट, जनता से दूरी का नया बहाना सत्ताधारी नेताओं के लिए इन दिनों ‘वीआइपी मूवमेंट’ एक नया कवच बन गया है। जहां जाना है, वहां प्रोटोकॉल है, सुरक्षा है, स्वागत है, मालाएं हैं, फोटो सेशन है। सब कुछ है, बस जनता के असली सवालों के जवाब नहीं हैं। जनता भी अब समझने लगी है कि वीआइपी मूवमेंट का मतलब है नेता आएंगे, हाथ हिलाएंगे, मुस्कुराएंगे और चले जाएंगे। उनके जाने के बाद रह जाती है धूल, कुछ बैनर और सोशल मीडिया पर अपलोड होने वाली तस्वीरें। यह स्थिति किसी फिल्म के उस सीन जैसी है, जहां हीरो आता है, स्टाइल में एंट्री करता है, डायलॉग बोलता है और बिना किसी समस्या का समाधान किए आगे बढ़ जाता है। प्रतिपक्ष की बुनाई, धीमी लेकिन योजनाबद्ध प्रतिपक्ष इन दिनों खुलकर आक्रमण नहीं कर रहा, लेकिन वह चुप भी नहीं है। वह अपने विरोध को ‘बुन’ रहा है। जैसे कोई कारीगर धैर्यपूर्वक कपड़ा तैयार करता है, वैसे ही प्रतिपक्ष मुद्दों को जोड़ रहा है। उसकी रणनीति स्पष्ट है अभी शोर नहीं, बल्कि समय आने पर ‘धमाका’। लेकिन राजनीति में ज्यादा देर तक चुप रहना भी खतरनाक होता है, क्योंकि जनता को लगता है कि दोनों पक्षों में कोई खास फर्क नहीं है। सिंहनाद बनाम शंखनाद सिरोही की राजनीति में एक नाम ऐसा है, जिसकी आवाज अक्सर ‘सिंहनाद’ के रूप में गूंजती रही है। जहां बाकी नेता शंख बजाकर औपचारिक शुरुआत करते हैं, वहां यह आवाज सीधे दहाड़ के रूप में सामने आती है। लेकिन इन दिनों यह सिंहनाद भी कुछ सीमित सा लग रहा है। मुद्दे हैं, मौके हैं, लेकिन आवाज उतनी व्यापक नहीं हो पा रही, जितनी पहले हुआ करती थी। शायद यह समय का प्रभाव है, या फिर राजनीति की बदलती प्रकृति का परिणाम। अब राजनीति में दहाड़ से ज्यादा ‘डिजिटल पोस्ट’ का महत्व बढ़ गया है। जो जितना ज्यादा ट्रेंड करता है, वही उतना बड़ा नेता माना जाता है। आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर सिरोही में इन दिनों स्थानीय मुद्दों से ज्यादा प्रदेश और देश की राजनीति पर बहस हो रही है। नेता अपने-अपने दलों की लाइन को आगे बढ़ा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है, लेकिन यह बहस अक्सर ‘टीवी डिबेट’ जैसी लगती है। जहां शोर ज्यादा होता है, समाधान कम। यह स्थिति भी बड़ी दिलचस्प है। स्थानीय समस्याएं जैसे सडक़, पानी, बिजली, रोजगार—इन पर चर्चा कम होती है, जबकि राष्ट्रीय मुद्दों पर बयानबाजी ज्यादा। जैसे किसी घर में छत टपक रही हो, लेकिन लोग पड़ोसी के घर की दीवार पर चर्चा कर रहे हो। जिंदा राजनीति की पहचान कहां गई? सिरोही को हमेशा ‘जिंदा राजनीति’ का जिला कहा जाता रहा है। यहां जनता जागरूक रही है, नेताओं को जवाब देना पड़ता रहा है और हर मुद्दे पर बहस होती रही है। लेकिन आज वही जीवंतता कहीं खोती हुई नजर आती है। यह नहीं कि राजनीति खत्म हो गई है। बल्कि राजनीति का स्वरूप बदल गया है। अब यह जमीन से ज्यादा ‘इमेज’ पर आधारित हो गई है। काम से ज्यादा ‘प्रेजेंटेशन’ महत्वपूर्ण हो गया है।

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अंगूठा छाप भी बन सकेंगे गांवों के सियासी मुखिया – पंचायत चुनाव Rajasthan

राज्य सरकार हो चाहे केंद्र सरकार साक्षरता मिशन को लेकर डींगे हांक रही है,लेकिन अबकी बार होने वाले पंचायत चुनाव Rajasthan में निरक्षरता भी उम्मीदवार की पात्रता में आड़े नहीं आएगी। सरकार के पास फिलहाल नियमों में संशोधन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है, जिसका मतलब साफ़ है कि अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग भी पूर्व की भांति चुनाव लड़ सकेंगे। राजस्थान में एक बार फिर गांवों की सरकार चुनने का समय आ रहा है। इस बार के पंचायत चुनाव पिछले एक दशक के सबसे अलग चुनाव होने जा रहे हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदान की प्रक्रिया से लेकर उम्मीदवारों की योग्यता तक कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि 1 जनवरी 2026 को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा भी इस बार अपनी ग्राम सरकार चुनने के लिए मतदान कर सकेंगे। खास तौर से चर्चा थी कि राज्य सरकार दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवारों को चुनाव लडऩे की अनुमति दे सकती है और शैक्षणिक योग्यता को भी अनिवार्य बना सकती है। हालांकि, राज्य सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर साफ कर दिया है कि निकट भविष्य में पात्रता नियमों में किसी बड़े बदलाव की कोई योजना नहीं है। राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदान की प्रक्रिया से लेकर उम्मीदवारों की योग्यता तक कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। आयोग को 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव की संपूर्ण प्रक्रिया पूरी करनी है। 1 जनवरी 2026 की योग्यता तिथि के आधार पर नई वोटर लिस्ट तैयार की जा रही है। प्रदेश की 14,000 से अधिक ग्राम पंचायतों में चुनाव चरणबद्ध तरीके से मार्च और अप्रैल 2026 के बीच संपन्न होने की संभावना है। अब इवीएम नहीं, बैलेट पेपर से होगा चुनाव इस बार के चुनावों में जो सबसे चौंकाने वाला बदलाव हुआ है, वह है हाइब्रिड मॉडल। पंच और सरपंच इन दोनों पदों के लिए मतदान पारंपरिक तरीके से बैलेट पेपर (मतपत्र) और मतपेटी के जरिए होगा। यानी अब आपको बटन नहीं दबाना होगा, बल्कि मुहर लगानी होगी।जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य के लिए मतदान इवीएम के जरिए ही किया जाएगा। इधर उम्मीदवार की आयु कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए। फिलहाल राजस्थान में पंचायती राज चुनाव के लिए शैक्षिक योग्यता (जैसे 8वीं या 10वीं पास) की अनिवार्यता को लेकर पिछली सरकार ने ढील दी थी, लेकिन चुनाव लडऩे के लिए उम्मीदवार का नाम उस पंचायत की मतदाता सूची में होना अनिवार्य है। वे लोग जिनके दो से अधिक बच्चे हैं, उन्हें राहत के लिए अभी और इंतजार करना होगा। दो संतान नीति को हटाने पर विचार-विमर्श लंबे समय से चल रहा है। यह मामला अभी प्रक्रिया में है। कैबिनेट ने अभी तक इस संबंध में कोई बिल पास नहीं किया है और न ही कोई नया नियम लागू हुआ है। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से चर्चा थी कि सरकार 27 नवंबर 1995 के बाद तीसरी संतान होने पर चुनाव लडऩे की पाबंदी को हटा सकती है। वहीं उम्मीदवारी के लिए घर में कार्यात्मक शौचालय होना और परिवार के सदस्यों का खुले में शौच न जाना एक अनिवार्य शर्त है।

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आखिरी चाय

रवि रोज सुबह उसी छोटे से चाय वाले ठेले पर चाय पीने जाता था।चाय वाला बूढ़ा अंकल हमेशा मुस्कुराकर पूछते — “बेटा, आज भी बिना चीनी वाली?” एक दिन रवि जल्दी में था, उसने चाय नहीं पी और चला गया।शाम को पता चला — वो ठेला हमेशा के लिए बंद हो गया। अगले दिन रवि उसी जगह खड़ा था…और पहली बार उसे समझ आया —कुछ चीजें आदत नहीं होतीं,वो जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं।

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