Hot News

ना करो सितम पर सितम, मुझे जीने दो

Share News!

शहर की सुबह अब चिडिय़ों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि सरकारी आदेशों की खडख़ड़ाहट से खुलती है। कहीं पेट्रोल पंप पर लंबी कतारें हैं, कहीं गैस एजेंसी के बाहर खाली सिलेंडर लिए खड़े लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। सडक़ पर निकलो तो ट्रैफिक पुलिस ऐसे घूरती है मानो जनता नहीं, कोई भगोड़ा अपराधी घूम रहा हो। और यदि गलती से किसी गरीब ने फुटपाथ के कोने पर अपनी रोजी-रोटी का छोटा सा ठिकाना बना लिया, तो समझो उसने व्यवस्था के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध कर दिया। बेचारी पब्लिक आखिर करे भी तो क्या करे। उसकी आवाज अब नारे नहीं बनती, केवल आह बनकर रह जाती है। उसके हिस्से में विरोध नहीं, सिर्फ गिड़गिड़ाहट बची है। वह हाथ जोडक़र कहती है साहब, जीने दो। लेकिन व्यवस्था के कानों तक उसकी आवाज पहुंचती ही कहां है। वहां तो नोटों की खनखनाहट इतनी तेज है कि गरीब की चीखें दब जाती हैं। आज के दौर में प्रशासन की तलवार बड़ी अदभुत हो गई है। उसका एक सिरा गरीब की झोपड़ी काटता है और दूसरा अमीरों की तिजोरी चमकाता है। कानून की किताबें सबके लिए बराबर होने का दावा करती हैं, लेकिन उनकी स्याही भी शायद जेब देखकर रंग बदल लेती है। निर्धनों के लिए नियम लोहे की जंजीर हैं, जबकि रसूखदारों के लिए वही नियम मोम की तरह पिघल जाते हैं।
आखिर इनका दर्द कौन जानें
मंगलवार की दोपहर शहर ने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। फुटपाथ पर कुछ मजदूर परिवार अपने नन्हें बच्चों के साथ पतले कपड़ों और प्लास्टिक की चादरों से छोटा सा आशियाना बनाकर रह रहे थे। वे कोई महल नहीं खड़ा कर रहे थे, न ही सरकारी जमीन बेच रहे थे। वे तो केवल धूप से बचने की कोशिश कर रहे थे। दिनभर मजदूरी करने वाले इन लोगों की सबसे बड़ी ख्वाहिश सिर्फ इतनी थी कि शाम को बच्चे खुले आसमान के नीचे नहीं, बल्कि किसी कपड़े की ओट में सो जाएं। लेकिन व्यवस्था को यह मंजूर नहीं था। निकाय का अमला पहुंचा। जेसीबी ऐसे आगे बढ़ी मानो किसी आतंकवादी अड्डे को ध्वस्त करने जा रही हो। अधिकारियों के चेहरे पर कठोरता थी और गरीबों की आंखों में डर। मासूम बच्चे अपनी मांओं की उंगलियां पकडक़र सहमे खड़े थे। कुछ महिलाएं हाथ जोडक़र विनती कर रही थीं साहब, शाम तक रहने दो, बच्चे हैं। मगर वहां संवेदना नहीं, केवल आदेश था। और आदेश भी ऐसा, जिसका नाम लेते ही हर सवाल खत्म हो जाए। अधिकारी बोले यह कलेक्टरी आदेश है। यह वाक्य आजकल लोकतंत्र का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र बन चुका है। इसके आगे इंसानियत, संवेदना, करुणा सब बौनी हो जाती हैं। अधिकारी भी इसे ऐसे बोलते हैं जैसे भगवान का फरमान सुना रहे हों। जनता सुनते ही चुप हो जाती है, क्योंकि उसे पता है कि इस आदेश के पीछे सत्ता की पूरी मशीनरी खड़ी है।
क्या आदेश केवल गरीबों के लिए होते हैं?
शहर की सडक़ों पर नजर दौड़ाइए। बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों ने फुटपाथ निगल लिए। कहीं होटल वालों ने पार्किंग बना ली, कहीं दुकानदारों ने सडक़ तक सामान फैला दिया। कई रसूखदारों के भवन तो ऐसे खड़े हैं मानो सरकारी जमीन उनके दादा की विरासत हो। लेकिन वहां न जेसीबी पहुंचती है, न नोटिस चिपकते हैं। वहां कानून आंखों पर पट्टी बांध लेता है। क्योंकि वहां राजनीति की छतरी तनी होती है। वहां नोटों की खनखनाहट होती है। वहां फोन आते हैं अपने आदमी हैं, ध्यान रखना। और प्रशासन तुरंत समझ जाता है कि कौन-सा अतिक्रमण अवैध है और कौनसा सम्माननीय। व्यवस्था का यह दोहरा चरित्र अब छुपा नहीं है। गरीब के लिए नियमों की पूरी सेना उतर आती है, जबकि रसूखदारों के लिए कानून छुट्टी पर चला जाता है। यही कारण है कि शहर में अतिक्रमण की एक समानांतर दुनिया खड़ी हो चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि गरीब का अतिक्रमण तिरपाल का होता है और अमीर का कंक्रीट का। गरीब की झोपड़ी एक घंटे में टूट जाती है, लेकिन रसूखदारों की बहुमंजिला दीवारों को वर्षों तक कोई हाथ नहीं लगाता। आखिर क्यों? क्योंकि गरीब के पास सिफारिश नहीं होती। उसके पास नेता का मोबाइल नंबर नहीं होता। उसके पास कुछ अधिकारियों की मेज तक पहुंचने वाली हरी पत्तियां नहीं होतीं। आज राजनीति और प्रशासन का रिश्ता भी बड़ा दिलचस्प हो गया है। जनता समझती है कि नेता जनता के सेवक हैं और अधिकारी व्यवस्था के रक्षक। लेकिन असल तस्वीर कुछ और ही है। यहां कई बार नेता और अधिकारी मिलकर ऐसा खेल खेलते हैं जिसमें जनता सिर्फ मोहरा बनकर रह जाती है।
जब कार्रवाई करनी होती है तो गरीबों पर डंडा चलता है, ताकि अखबारों में सुर्खियां बनें प्रशासन सख्त। और जब रसूखदारों पर कार्रवाई की बारी आती है, तो फाइलें अचानक गायब हो जाती हैं, नोटिस ठंडे बस्ते में चले जाते हैं और जांच समितियां नींद में चली जाती हैं। यह वही राजनीति है जहां मंचों पर गरीबों के नाम पर आंसू बहाए जाते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे उन्हीं गरीबों की झोपडिय़ां उजाड़ी जाती हैं। चुनाव आते हैं तो नेता गरीब की चौखट पर बैठकर रोटी खाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, बच्चों को गोद में उठाते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही गरीब प्रशासनिक बुलडोजर के नीचे कुचला जाता है। सबसे दुखद बात यह है कि गरीब अब विरोध भी नहीं करता। उसने शायद मान लिया है कि यह व्यवस्था उसके लिए बनी ही नहीं है। वह केवल तमाशा देखता है। उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि हार दिखाई देती है।
मानसिक संवेदनाओं का विध्वंस
फुटपाथ पर रोते वे मासूम बच्चे केवल अपने टूटे आशियाने को नहीं देख रहे थे, वे इस व्यवस्था का असली चेहरा देख रहे थे। वे समझ रहे थे कि इस शहर में गरीब होना सबसे बड़ा अपराध है। उन बच्चों ने देखा कि कैसे कुछ लोग फोन घुमाकर अपने अवैध निर्माण बचा लेते हैं। कैसे कुछ लोग नोटों की गड्डिया खनकाकर नियमों को खरीद लेते हैं। कैसे कुछ नेताओं की मुस्कान के पीछे गरीबों की बेबसी छुपी होती है। यह केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं थी, यह संवेदनाओं का विध्वंस था। विडंबना देखिए, प्रशासन विकास की बातें करता है। शहर को सुंदर बनाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन क्या सुंदरता केवल चौड़ी सडक़ों और चमकती इमारतों से आती है? क्या उस शहर को सुंदर कहा जा सकता है जहां गरीब का बच्चा धूप में रोता रहे और सत्ता वातानुकूलित कमरों में बैठकर प्रेस नोट जारी करती रहे? असल में आज व्यवस्था का चेहरा इंसानी कम और कारोबारी ज्यादा हो गया है। यहां हर चीज का मूल्य तय है। नियमों की कीमत है, राहत की कीमत है, चुप्पी की कीमत है। यहां तक कि कार्रवाई भी कई बार सेटिंग देखकर तय होती है।
जनता अनभिज्ञ नहीं है, सब जानती है
जनता यह सब देख रही है। उसे मालूम है कि कौनसा अतिक्रमण राजनीतिक संरक्षण में पल रहा है। कौनसा अधिकारी किसके इशारे पर काम करता है। कौनसी फाइल नोटों की गर्मी से आगे बढ़ती है। लेकिन वह चुप है, क्योंकि उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है।
आज जरूरत कानून की नहीं, न्याय की है। नियमों की नहीं, संवेदना की है। यदि प्रशासन सच में निष्पक्ष है तो कार्रवाई हर उस अवैध निर्माण पर होनी चाहिए जो शहर को निगल रहा है, चाहे वह किसी गरीब की झोपड़ी हो या किसी रसूखदार की आलीशान इमारत। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यहां बुलडोजर भी पहचान देखकर चलते हैं। गरीब के घर पर पहुंचते समय वे गर्जना करते हैं, और अमीर के दरवाजे पर पहुंचते-पहुंचते उनकी आवाज धीमी पड़ जाती है।
शहर के लोग अब पूछने लगे हैं कि आखिर प्रशासन की नजरें चुनिंदा जगहों पर ही क्यों खुलती हैं? क्यों वर्षों से फैले बड़े अतिक्रमणों पर मौन साध लिया जाता है? क्यों हर बार गरीब ही निशाने पर आता है? और सबसे बड़ा सवाल क्या सत्ता का असली चेहरा अब केवल नोटों की खनखनाहट सुनता है? इन सवालों के जवाब शायद किसी सरकारी फाइल में नहीं मिलेंगे। वे जवाब उन मासूम बच्चों की आंखों में मिलेंगे जो तपती दोपहर में अपना टूटा आशियाना देखते रहे। वे जवाब उन मजदूरों की खामोशी में मिलेंगे जिनके पास विरोध करने की ताकत नहीं बची। और वे जवाब उस जनता की आह में मिलेंगे जो आज भी हाथ जोडक़र कह रही है ना करो सितम पर सितम, मुझे जीने दो

Shopping Cart
Scroll to Top
क्रिकेट के 73 नियम बदले