
तेहरान, ईरान | 27 अप्रैल 2024
ईरान के विदेश मंत्री ने हाल ही में घोषणा की है कि भारत, चीन, रूस, इराक और पाकिस्तान के जहाज अब होर्मुज जलसन्धि से सुरक्षित होकर गुजर सकेंगे। इस निर्णय से क्षेत्रीय सहयोग और समुद्री सुरक्षा को काफी मजबूती मिलेगी। उन्होंने इस अवसर पर भारत और श्रीलंका को उनके महत्वपूर्ण सहयोग के लिए धन्यवाद भी दिया।
ईरान के विदेश मंत्री ने बताया कि होर्मुज जलसन्धि पर ईरान की संप्रभुता पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। उन्होंने कहा, “यह जलसन्धि न केवल ईरान के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जिसके माध्यम से तेल और अन्य वस्तुओं का महत्वपूर्ण व्यापार होता है।”
जलसन्धि में पारगमन की आज्ञा प्रदान कर ईरान ने एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वह क्षेत्रीय शांति और सहयोग को प्राथमिकता देता है। विदेश मंत्री ने कहा कि यह कदम क्षेत्रीय देशों के बीच विश्वास बढ़ाने एवं समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक था।
इस मौके पर विदेश मंत्री ने विशेष रूप से भारत और श्रीलंका का धन्यवाद किया, जिनके सहयोग से ईरान को इस क्षेत्र में पर्याप्त सहयोग और समर्थन मिला है। उन्होंने कहा, “भारत और श्रीलंका के योगदान के बिना इस प्रक्रिया को इतनी सफलता से पूरा करना संभव नहीं था।”
विशेषज्ञों के अनुसार, होर्मुज जलसन्धि से पारगमन की अनुमति मिलने से भारत सहित अन्य मित्र देशों को रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से लाभ होगा। यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देगा और समुद्र मार्ग के सुरक्षा मानकों को बढ़ाएगा।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस घोषणा का स्वागत किया है और कहा है कि भारत ईरान के इस कदम को सकारात्मक मानता है। मंत्रालय ने कहा कि भारत हमेशा ही क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए काम करता रहेगा।
होर्मुज जलसन्धि विश्व के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल का लगभग एक तिहाई भाग गुजरता है। ऐसे में इस मार्ग के सुरक्षा और पारगमन की अनुमति का बढ़ना वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया जा रहा है।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस पहल से ईरान और क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग के नए अवसर खुलेंगे, जो क्षेत्रीय विवादों को कम कर भविष्य में बेहतर साझेदारी का उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।
आगे देखते हुए यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इस निर्णय से भारत को मध्यपूर्व में अपने आर्थिक और सामरिक हितों को और मजबूत करने में मदद मिलेगी, विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में।
अंत में, यह कदम एक सकारात्मक संकेत है कि कैसे क्षेत्रीय सहयोग से जटिल समुद्री एवं भू-राजनीतिक चुनौतियों का समाधान संभव है।












