
निहंग सिंहों का अनूठा प्रयास: बिना कीटनाशक के 3000 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती
पंजाब युद्ध कला के माहिर निहंग सिंह अपने अनोखे संकल्प के तहत पर्यावरण और धार्मिक पवित्रता दोनों को सहेजने का काम कर रहे हैं। वे बिना किसी कीटनाशकों का प्रयोग किए, 3000 एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं, ताकि गुरुद्वारा साहिब के लंगर के प्रसाद हर प्रकार से शुद्ध और पवित्र बने रहें। यह पहल शिरोमणि पंथ अकाली श्री मिसल शहीदां तरनादल बाबा बकाला साहिब के मुखी जत्थेदार बाबा जोगा सिंह व संत बाबा गुरदेव सिंह जी शहीदी बाग श्री आनंदपुर साहिब के निर्देशानुसार दल द्वारा संचालित की जा रही है।
निहंगों द्वारा अपनाई गई खेती की तकनीक काफी अनूठी है। वे सबसे पहले ढैंचा जैसी फसलें खेत में उगाते हैं, जो मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी को पूरा करती हैं। इसके बाद सड़े हुए गोबर को मिट्टी में मिलाकर उसे उपजाऊ बनाया जाता है। जत्थेदार बाबा जोगा सिंह और बाबा नोध सिंह समाध के प्रबंधन में यह क्रम जारी है। बाबा परमिंदरबीर सिंह के अनुसार, जत्थेदार भगवान सिंह गेहूं की क्वालिटी को सिर्फ बरकरार ही नहीं रख रहे, बल्कि उसे बेहतर भी बना रहे हैं।
गेहूं की बुवाई के बाद 25-30 दिन तक हाथों से या छोटे उपकरणों से निराई-गुड़ाई की जाती है। जैसे ही पौधे निकलते हैं, उनकी जरूरत के अनुरूप स्वाह या नीम के घोल से छिड़काव किया जाता है, ताकि फसल की रक्षा हो सके। यदि फसल में कीड़े व अन्य कीट लगते हैं तो 10 प्रकार की कड़वी पत्तियों से बना अर्क छिड़का जाता है, जो किसानों के लिए प्राकृतिक और प्रभावी सुरक्षा का जरिया है।
यह भी बताया गया कि बारिश न होने पर फसल को 4-5 बार पानी दिया जाता है जिससे उसकी अच्छी पैदावार सुनिश्चित हो सके। निहंग सिंह गेहूं के अतिरिक्त लंगर में प्रयुक्त सभी खाद्य पदार्थ जैसे गन्ना, मूंग, गोभी, आलू, प्याज, सरसों, मक्का, जौ, तेल और तिल जैसी फसलों की भी उन्नत ऑर्गेनिक खेती करते हैं। यह सारी उपज सीधे लंगर में उपयोग की जाती है और इसे बाहर बाजार में नहीं बेचा जाता।
बिना कीटनाशक के फसल बचाना चुनौतीपूर्ण है लेकिन निहंग सिंह ऐसी कठिनाइयों का मुकाबला बड़ी प्रतिबद्धता और समर्पण से कर रहे हैं। कभी-कभी स्वाह को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोना पड़ता है, क्योंकि हर खेत की जरूरत अलग-अलग होती है। स्वाह, जो कि रसोई से निकलने वाला प्राकृतिक पदार्थ है, को बिल्कुल व्यर्थ नहीं जाने दिया जाता। इसके अलावा, बड़ी संख्या में गोशालाएं भी चलायी जा रही हैं जहां से नियमित रूप से गोबर प्राप्त होता है।
यह पहल न केवल धार्मिक भावनाओं को सशक्त कर रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक मिसाल कायम कर रही है। निहंग सिंह अपनी पारंपरिक युद्ध कला की महारत के साथ-साथ कृषि के क्षेत्र में भी नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। उनकी यह सेवा गुरु की श्रद्धा के साथ-साथ प्रकृति के प्रति उनकी जिम्मेदारी को दर्शाती है।
इस प्रकार, निहंग सिंहों का यह अनूठा प्रयोग आधुनिक कृषि पद्धतियों और पारंपरिक संस्कारों का सुंदर संगम है, जो आने वाले समय में अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।











