राज्य की राजनीति भी बड़ी अदभुत चीज है। यहां हर मौसम का अपना अलग सरकारी संस्करण होता है। गर्मी पड़े तो जनसंवाद, बारिश आए तो निरीक्षण, चुनाव नजदीक हों तो विकास यात्रा और जनता सवाल पूछने लगे तो अपणायत। इन दिनों प्रदेश में अपणायत ऋतु चल रही है। मुख्यमंत्री गांव-गांव घूम रहे हैं, किसी चौपाल में चाय पी रहे हैं, कहीं बच्चों के साथ सेल्फी ले रहे हैं, तो कहीं किसी बुजुर्ग के कंधे पर हाथ रखकर कैमरे को यह भरोसा दिला रहे हैं कि सरकार और जनता के बीच दूरी कम हो गईं है। इधर प्रदेश का एक युवा अपने कमरे में बंद बैठा है। टेबल पर नीट की किताबें खुली हैं, लेकिन उसका भरोसा बंद हो चुका है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह डॉक्टर बनने की तैयारी करे या सिस्टम की बीमारी का इलाज ढूंढे। क्योंकि परीक्षा में मेहनत कम और मैनेजमेंट ज्यादा काम आने लगा है। परीक्षा केंद्रों से लेकर रिजल्ट तक ऐसी कहानियां निकल रही हैं कि अब छात्र बायोलॉजी से ज्यादा सेटिंग साइंस को महत्वपूर्ण मानने लगे हैं। लेकिन सरकार चिंतित नहीं है। आखिर युवा का काम ही क्या है? वह या तो परीक्षा दे, या विरोध करे, या फिर अगली भर्ती का इंतजार करे। सरकार को तो फिलहाल गांव में अपणायत की फसल बोनी है। मुख्यमंत्रीजी गांव में घूमते हुए इतने सहज दिख रहे हैं मानो प्रदेश में सब कुछ ठीक चल रहा हो। ऐसा लग रहा है जैसे पूरा प्रशासन किसी पर्यटन विभाग की डॉक्यूमेंट्री शूट कर रहा हो। प्रदेश में इन दिनों सडक़ें भी बड़ी भावुक हो गई हैं। नई सडक़ों की घोषणाएं सुनते ही पुरानी सडक़ें टूटकर बिखर जाती हैं। उन्हें पता है कि अब उनका नंबर खत्म हो चुका है। नेताजी के क्षेत्र में नई सडक़ स्वीकृत हो जाए, इससे बड़ा विकास सूचकांक अब कोई नहीं। चाहे पुरानी सडक़ पर इतने गड्ढ़े हो कि कार चलाते-चलाते आदमी आध्यात्मिक यात्रा पर निकल जाए, लेकिन नई सडक़ का शिलान्यास जरूरी है। क्योंकि राजनीति में सडक़ की मजबूती नहीं, फीते की मजबूती मायने रखती है। प्रदेश का नागरिक भी अब समझदार हो गया है। वह जानता है कि सडक़ बनते समय उसमें डामर कम और फोटो ज्यादा डाले जाते हैं। ठेकेदार सडक़ नहीं बनाता, बल्कि भविष्य के गड्ढों की नींव रखता है। पहली बारिश आते ही सडक़ अपने मूल स्वरूप में लौट आती है। यानी मिट्टी। फिर अधिकारी निरीक्षण करते हैं, नेता नाराजगी जताते हैं और ठेकेदार अगले टेंडर की तैयारी करता है। यह एक पवित्र लोकतांत्रिक चक्र है, जिसे तोडऩा संविधान के खिलाफ माना जा सकता है। सडक़ हादसों की खबरें इतनी आम हो चुकी हैं कि अखबारों में अब उनके लिए भावनाएं भी सीमित हो गई हैं। तेज रफ्तार, अनियंत्रित, मौके पर मौत। ये शब्द अब खबर नहीं, स्थायी कॉलम बन चुके हैं। सडक़ें इतनी टूटी हुई हैं कि वाहन चलाने वाला व्यक्ति ड्राइवर कम और एडवेंचर स्पोट्र्स खिलाड़ी ज्यादा लगता है। कहीं गड्ढे बचाओ, कहीं आवारा पशु बचाओ, कहीं अचानक गायब हो जाने वाले डिवाइडर से बचो। ऊपर से प्रशासन कहता है सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। जनता पूछना चाहती है साहब, सडक़ हटी तो क्या करें? भ्रष्टाचार की हालत तो यह है कि अब वह किसी विभाग में नहीं रहता, बल्कि पूरे सिस्टम का आधिकारिक शुभंकर बन चुका है। पहले लोग चोरी-छिपे रिश्वत लेते थे, अब बड़े आत्मविश्वास से लेते हैं। जैसे यह उनका संवैधानिक अधिकार हो। आम आदमी भी अब रिश्वत देते समय शर्मिंदा नहीं होता, बल्कि डरता केवल इस बात से है कि कहीं कम न पड़ जाए। सरकारी दफ्तरों में फाइलें अब पंखों से नहीं, नोटों की हवा से उड़ती हैं। प्रदेश का युवा सबसे ज्यादा भ्रमित है। उसे बचपन से सिखाया गया कि मेहनत करो, ईमानदारी से पढ़ो, आगे बढ़ोगे। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसे पता चलता है कि आगे वही बढ़ता है जिसकी पहुंच ऊपर तक हो। बाकी लोग केवल कोचिंग सेंटरों के पोस्टर में मुस्कुराने के लिए रह जाते हैं। नीट जैसी परीक्षाओं में धांधली की खबरें आने के बाद अब छात्रों को लगता है कि परीक्षा हॉल में वे प्रश्नपत्र हल नहीं कर रहे, बल्कि अपने भरोसे का पोस्टमार्टम कर रहे हैं। लेकिन सरकार के पास हर सवाल का एक सुंदर उत्तर है जांच होगी। इस देश में जांच एक ऐसी रहस्यमयी प्रक्रिया है, जिसमें समय के साथ जनता का गुस्सा समाप्त हो जाता है और फाइलें स्थायी निद्रा में चली जाती हैं। जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट आती है, कुछ छोटे अधिकारी निलंबित होते हैं और फिर सब सामान्य हो जाता है। जैसे कुछ हुआ ही न हो। आखिर लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां हर घोटाला कुछ दिनों बाद पुरानी खबर बन जाता है।
शीर्ष नेताओं को लोग गांवों में लोग फूल-मालाएं पहना रहे हैं। बच्चे कविताएं सुना रहे हैं। प्रशासन पहले से तय कर रहा है कि किस किसान को क्या बोलना है। ऐसा लगता है जैसे पूरा प्रदेश एक विशाल रियलिटी शो बन गया हो। इंडियाज बेस्ट अपणायत। कैमरे के सामने सब मुस्कुरा रहे हैं, कैमरे के पीछे बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था चाय पी रही है। राजनीति में आजकल संवेदनशीलता भी इवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा बन चुकी है। कोई हादसा हो जाए तो नेता ट्वीट कर देता है दुखद। फिर अगले कार्यक्रम में ढोल-नगाड़ों के साथ मंच पर पहुंच जाता है। जनता भी अब अभ्यस्त हो चुकी है। उसे मालूम है कि उसकी समस्याएं केवल भाषणों में जीवित रहती हैं। जमीन पर वे अक्सर फाइलों में दम तोड़ देती हैं।
प्रदेश की हालत उस छात्र जैसी हो गई है, जो परीक्षा में फेल होने के बाद भी मुस्कुराकर फोटो खिंचवा रहा हो ताकि रिश्तेदारों को शक न हो। ऊपर से विकास के होर्डिंग चमक रहे हैं, नीचे गड्ढों में वाहन फंस रहे हैं। मंचों पर रोजगार की बातें हो रही हैं, कोचिंग सेंटरों में छात्र निराशा की दवाइयां खोज रहे हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि हर समस्या का समाधान अगली घोषणा में खोजा जा रहा है। सडक़ टूटी, नई सडक़ घोषित करो। परीक्षा में गड़बड़ी, नई समिति बना दो। भ्रष्टाचार बढ़ा, हेल्पलाइन जारी कर दो। जनता परेशान, अपणायत यात्रा निकाल दो। ऐसा लगता है कि सरकार प्रशासन नहीं चला रही, बल्कि लगातार ट्रेलर रिलीज कर रही है। पूरी फिल्म कभी आती ही नहीं। इस बीच प्रदेश का आम आदमी भी कम दिलचस्प नहीं है। वह हर पांच साल में उम्मीदों का नया संस्करण डाउनलोड कर लेता है। उसे लगता है कि इस बार शायद कुछ बदलेगा। फिर वही सडक़ें टूटती हैं, वही भर्ती अटकती है, वही घोटाले आते हैं और वही भाषण दोहराए जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र का असली जादू यही है यह जनता को निराश होकर भी उम्मीद करने की कला सिखा देता है। अंत में प्रदेश की तस्वीर बड़ी सिनेमाई लगती है। एक तरफ मुख्यमंत्री गांव की गलियों में मुस्कुराते हुए अपणायत बांट रहे हैं, दूसरी तरफ युवा अपने भविष्य की चिंता में रातभर जाग रहा है। कुल मिलाकर प्रदेश में सब कुछ ठीक है। बस सडक़ें टूट रही हैं, परीक्षाएं संदिग्ध हैं, युवा परेशान हैं, भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है और जनता सवाल पूछ रही है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। मुख्यमंत्री गांव में सैर पर हैं, अपणायत जारी है।












