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जनहित में फिर पूर्व विधायक की सिंहनाद, बायपास पर पुनर्विचार करें

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प्रस्तावित बायपास परियोजना को लेकर जनहित में उठाई आवाज, सरकार से मांगा ठोस निर्णय

सिरोही। पूर्व विधायक संयम लोढा का जनहित में फिर सिरोही-मंडार फोरलेन हाईवे पर प्रस्तावित बाइपास परियोजना को लेकर तार्किक सिंहनाद गूंजा है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने इस मामले को गंभीरता से उठाते हुए मुख्यमंत्री और केंद्रीय सडक़ परिवहन मंत्री को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि सर्वे में न केवल मास्टर प्लान बल्कि तकनीकी मानकों की भी अनदेखी की गई है। उनका आरोप है कि यह एलाइनमेंट शहर और सरकार दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। लोढ़ा ने यह भी सवाल उठाया कि यदि वैकल्पिक विकल्प उपलब्ध हैं, जो कम लागत और कम सामाजिक प्रभाव वाले हैं, तो फिर विवादित एलाइनमेंट पर ही जोर क्यों दिया जा रहा है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
सिरोही-मंडार फोरलेन हाईवे पर प्रस्तावित बाइपास को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मौजूदा सर्वे और वर्ष 2011 के मास्टर प्लान (2031 तक लागू) के बीच बड़े अंतर ने पूरे प्रोजेक्ट को अटका दिया है। अब तक हाईवे का अंतिम नक्शा तय नहीं हो पाया है, जिससे प्रशासनिक स्तर पर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा सर्वे किसके निर्देश पर और किन परिस्थितियों में किया गया, जो शहर और सरकार दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसी को लेकर जांच की मांग भी तेज हो गई है।
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने मुख्यमंत्री और केंद्रीय सडक परिवहन मंत्री को पत्र लिखकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि सर्वे में भारतीय सडक कांग्रेस के नियमों और मास्टर प्लान की अनदेखी की गई है। जहां मास्टर प्लान के अनुसार बाइपास को शहर की सीमा से बाहर रखा जाना था, वहीं मौजूदा सर्वे में इसे आबादी के भीतर से निकाला जा रहा है। प्रस्तावित एंट्री पॉइंट शिवगंज रोड के पास मात्र 200 मीटर दूरी पर है, जहां आदर्श नगर, बालाजी रेजीडेंसी, कृष्णा विहार और महादेव कॉलोनी जैसी घनी आबादी मौजूद है। इतना ही नहीं, नया बाइपास मास्टर प्लान से करीब 2.25 किलोमीटर शहर के अंदर की ओर शिफ्ट कर दिया गया है। एनएच पीडब्ल्यूडी के एक्सईएन राहुल पंवार ने भी उच्च अधिकारियों को भेजी रिपोर्ट में बताया कि मौजूदा प्लान में लंबाई कम होने के बावजूद लागत करीब 54 करोड़ रुपए ज्यादा आ रही है। इससे परियोजना की पारदर्शिता और तकनीकी मानकों पर सवाल खड़े हो गए हैं। इधर, गोयली गांव के किसानों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका कहना है कि हाईवे उपजाऊ और सिंचित जमीन से गुजर रहा है, जिससे 17 कुएं बेकार हो जाएंगे और करीब 160 परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी। फिलहाल, प्रशासन आपत्तियों के निस्तारण और सुझावों के आधार पर नए नक्शे को मंजूरी देने की प्रक्रिया में जुटा है। अब देखना होगा कि सरकार इस विवाद को कैसे सुलझाती है और बाइपास का अंतिम स्वरूप क्या होता है।
दो एलाइनमेंट विकल्पों पर तकनीकी रिपोर्ट से उठे सवाल
सिरोही जिले में प्रस्तावित बाईपास परियोजना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। लोक निर्माण विभाग की राष्ट्रीय राजमार्ग शाखा, पाली की ओर से जारी एक आधिकारिक पत्र में सिरोही बाईपास के एलाइनमेंट को लेकर विस्तृत तकनीकी तुलना पेश की गई है। इस रिपोर्ट में दो विकल्प—ऑप्शन-4 (स्वीकृत एलाइनमेंट) और ऑप्शन-5 (वैकल्पिक एलाइनमेंट)—के बीच लागत, भूमि अधिग्रहण, कनेक्टिविटी और प्रभाव जैसे कई पहलुओं का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। यह पूरा मामला उस समय और महत्वपूर्ण हो गया जब संयम लोढ़ा (पूर्व विधायक, सिरोही) ने 9 मार्च 2026 को इस एलाइनमेंट पर आपत्ति दर्ज कराते हुए पुनर्विचार की मांग की थी। इसके बाद विभाग ने तकनीकी तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर संबंधित अधिकारियों को भेजी है।
क्या है सिरोही बाईपास परियोजना
सिरोही शहर में बढ़ते यातायात दबाव और शहरी भीड़भाड़ को कम करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग-168 (एनएच-168) पर बाईपास का निर्माण प्रस्तावित है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भारी वाहनों और लंबी दूरी के ट्रैफिक को शहर के बाहर से डायवर्ट करना है, ताकि शहर के अंदर यातायात सुगम हो सके और दुर्घटनाओं में कमी आए।
विभाग ने दिया यह तर्क
पीडब्ल्यूडी का कहना है कि बाईपास का एलाइनमेंट तय करते समय कई तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखा गया है, जैसे कि सडक की ज्यामितीय डिजाइन, यातायात का दबाव, भूमि की उपलब्धता, पर्यावरणीय प्रभाव और लागत। विभाग की रिपोर्ट में दो प्रमुख विकल्पों का उल्लेख किया गया है। ऑप्शन-4 और ऑप्शन-5। इन दोनों विकल्पों के मुख्य बिंदु को देखें तो डिजाइन ऑप्शन 4 की कुल लंबाई 7.916 किमी है, जबकि ऑप्शन-5 की लंबाई 11.020 किमी है।
दोनों विकल्पों में डिजाइन स्पीड 100 किमी/घंटा निर्धारित की गई है। कम लंबाई के कारण ऑप्शन-4 को अधिक व्यावहारिक और समय की बचत करने वाला माना जा रहा है। ऑप्शन-4 की निर्माण लागत 145.13 करोड़ है, जबकि ऑप्शन-5 की 166.60 करोड़ है।
लेकिन भूमि अधिग्रहण लागत ऑप्शन-4 में 158.58 करोड़ है, जबकि ऑप्शन-5 में यह केवल 83.32 करोड़ है। यानी जहां ऑप्शन-4 में निर्माण सस्ता है, वहीं जमीन खरीदना महंगा पड़ रहा है। इसके विपरीत ऑप्शन-5 में निर्माण महंगा है लेकिन भूमि अधिग्रहण सस्ता है। कुल परियोजना लागत की बात करें तो ऑप्शन-4 की कुल लागत 303.71 करोड़ आंकी गई है।
ऑप्शन पांच 54 करोड़ रुपए सस्ता
ऑप्शन-5 की कुल लागत 249.92 करोड़ है। स्पष्ट है कि ऑप्शन-5 कुल मिलाकर लगभग 54 करोड़ सस्ता है। जहां तक भूमि की संरचना का सवाल है
ऑप्शन-4 में 59.38 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है। ऑप्शन-5 में 65.92 हेक्टेयर भूमि लगेगी। संरचनाओं की बात करें तो ऑप्शन-4 में तीन पीयूपी और तीन एलवीयूपी हैं। ऑप्शन-5 में 2 वीयूपी और 4 एलवीयूपी प्रस्तावित हैं। इसी प्रकार ब्रिज और कनेक्टिविटी पर गौर करें तो
ऑप्शन-4 में 2 बड़े पुल हैं। ऑप्शन-5 में केवल 1 बड़ा पुल है। कनेक्टिविटी देखें तो ऑप्शन-4 सीधे एनएच-168 से जुड़ता है। ऑप्शन-5 का कनेक्शन एनएच-62 से प्रस्तावित है। शहरी क्षेत्र पर प्रभाव तुलनात्मक यह रहेगा कि ऑप्शन-4 विकसित क्षेत्र के पास से गुजरता है, जिससे आबादी प्रभावित हो सकती है। ऑप्शन-5 घनी आबादी से दूर है, जिससे सामाजिक प्रभाव कम होगा।
मास्टर प्लान के अनुसार एलाइनमेंट
रिपोर्ट के अनुसार, ऑप्शन-4 सिरोही के मास्टर प्लान के अनुरूप है। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है, क्योंकि शहरी विकास योजनाओं के अनुरूप परियोजना का होना भविष्य में विस्तार और विकास के लिए जरूरी होता है।
संयम लोढ़ा ने अपने प्रतिनिधित्व में मुख्य रूप से उठाए गए मुद्दों में स्वीकृत एलाइनमेंट (ऑप्शन-4) से अधिक भूमि अधिग्रहण होगा, जिससे किसानों और स्थानीय लोगों को नुकसान होगा।
यह एलाइनमेंट विकसित क्षेत्रों के पास से गुजरता है, जिससे विस्थापन की समस्या बढ़ सकती है।
वैकल्पिक एलाइनमेंट (ऑप्शन-5) सस्ता है और सामाजिक प्रभाव भी कम है। लोढ़ा का कहना है कि सरकार को केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। इधर विभाग के कार्यकारी अभियंता ने स्पष्ट किया है कि एलाइनमेंट का चयन एक उच्च स्तरीय समिति एलाइमेंट एप्रूवल कमेटी की ओर से किया गया है। इस समिति ने निम्नलिखित आधारों पर निर्णय लिया जिसमें ज्यामितीय डिजाइन, यातायात की आवश्यकता,
निर्माण की व्यवहार्यता, भविष्य की ट्रैफिक वृद्धि
विभाग का मानना है कि ऑप्शन-4 तकनीकी रूप से अधिक उपयुक्त है और लंबी अवधि में बेहतर परिणाम देगा।
किसानों और जमीन मालिकों की चिंता भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया उनके लिए आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
प्रशासन का कहना है कि सभी पहलुओं का अध्ययन कर ही निर्णय लिया गया है और यह परियोजना क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
अब यह मामला उच्च अधिकारियों के पास है, जिसमें जोधपुर स्थित पीडब्ल्यूडी सर्किल और जयपुर मुख्यालय शामिल हैं। संभावना है कि तकनीकी रिपोर्ट की पुन: समीक्षा हो सकती है
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जनता से सुझाव लिए जा सकते हैं। यदि आवश्यक हुआ तो एलाइनमेंट में संशोधन भी किया जा सकता है

Kamlesh Purohit
Kamlesh Purohit
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