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नगरीय निकाय चुनाव 2026: वार्ड आरक्षण की लॉटरी से बदले सियासी समीकरण

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सिरोही। नगरीय निकाय चुनाव 2026 की तैयारियों के बीच सोमवार को सिरोही जिले में वार्ड आरक्षण की लॉटरी निकाली गई। जिला निर्वाचन अधिकारी रोहिताश्व सिंह तोमर की अध्यक्षता में कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित आरक्षण प्रक्रिया के बाद जिले के नगरीय निकायों में चुनावी तस्वीर काफी हद तक बदल गई है। वार्डों के आरक्षण में बदलाव का सबसे ज्यादा असर उन नेताओं पर पड़ा है, जिन्होंने पिछले चुनाव में अपने-अपने वार्ड से जीत दर्ज कर राजनीतिक जमीन मजबूत की थी। सिरोही नगर परिषद में वार्ड आरक्षण की स्थिति बदलने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के सामने अब टिकट वितरण को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। कई मौजूदा पार्षदों और प्रमुख राजनीतिक चेहरों के वार्ड इस बार अलग-अलग आरक्षित श्रेणियों में चले गए हैं। ऐसे में कुछ नेताओं को नए वार्ड से चुनाव लड़ने की रणनीति बनानी होगी, जबकि कुछ अपने परिवार के सदस्यों को चुनाव मैदान में उतार सकते हैं।

सभापति पद सामान्य महिला, महेंद्र मेवाड़ा के सामने नई चुनौती

सिरोही नगर परिषद के सभापति पद को इस बार सामान्य महिला के लिए आरक्षित किया गया है। इससे नगर परिषद की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पिछले चुनाव में वार्ड नंबर 2 से कांग्रेस के महेंद्र मेवाड़ा चुनाव जीतकर सभापति बने थे। उनका वार्ड पिछली बार ओबीसी श्रेणी में था, लेकिन इस बार लॉटरी में वार्ड नंबर 2 एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हो गया है।

वार्ड आरक्षण बदलने के बाद महेंद्र मेवाड़ा के सामने अब अपने लिए नया वार्ड तलाशने की चुनौती है। वहीं सभापति पद महिला के लिए आरक्षित होने के कारण यह संभावना भी जताई जा रही है कि वे अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतार सकते हैं। राजनीतिक हलकों में वार्ड नंबर 8 और 35 को लेकर भी संभावित रणनीति पर चर्चा शुरू हो गई है।

इस बदलाव ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति को भी प्रभावित किया है। पार्टी को अब यह तय करना होगा कि मौजूदा नेतृत्व को किस वार्ड से मैदान में उतारा जाए और सभापति पद के लिए किस महिला चेहरे पर दांव खेला जाए।

कांग्रेस के कई चेहरों के सामने वार्ड बदलने की मजबूरी

आरक्षण की लॉटरी का असर कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं पर भी पड़ा है। कांग्रेस के नवनियुक्त नगर अध्यक्ष पुनीत जैन की राजनीतिक सक्रियता के बीच अब उनके परिवार की चुनावी रणनीति पर भी नजर रहेगी। माना जा रहा है कि वे अपनी पत्नी को वार्ड नंबर 25 से चुनाव मैदान में उतार सकते हैं।

इसी तरह कांग्रेस के मनोज पुरोहित ने पिछली बार वार्ड नंबर 19 से चुनाव जीता था। इस बार वार्ड 19 सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने और सभापति पद भी महिला के लिए आरक्षित होने से उनके सामने भी नया विकल्प तलाशने की स्थिति बन गई है। ऐसे में उनकी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारने की संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।

वार्ड नंबर 3 से कांग्रेस के जितेंद्र ऐरन ने पिछली बार सामान्य सीट से जीत दर्ज की थी। इस बार वार्ड नंबर 3 अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित हो गया है। आरक्षण में इस बदलाव से उनके लिए भी पुराने वार्ड से चुनाव लड़ने की स्थिति नहीं रही।

भाजपा के दिग्गजों के सामने भी नई चुनौती

आरक्षण की लॉटरी का असर भाजपा के कई मौजूदा पार्षदों पर भी पड़ा है। भाजपा की गीता पुरोहित ने पिछली बार वार्ड नंबर 17 से सामान्य महिला सीट पर चुनाव जीत दर्ज की थी। इस बार वार्ड नंबर 17 ओबीसी के लिए आरक्षित हो गया है। ऐसे में उन्हें अब दूसरे वार्ड की तलाश करनी पड़ सकती है। राजनीतिक चर्चाओं में वार्ड नंबर 12 और 20 जैसे विकल्पों पर भी नजर बनी हुई है।

भाजपा के सुरेश सगरवंशी ने पिछली बार वार्ड नंबर 11 से सामान्य सीट पर जीत हासिल की थी। इस बार वार्ड नंबर 11 सामान्य महिला के लिए आरक्षित हो गया है। ऐसे में उनके लिए भी पुराने वार्ड से चुनाव लड़ना संभव नहीं होगा और पार्टी को उनके लिए नए वार्ड की रणनीति बनानी होगी। ऐसी स्थिति में उनके परिवार की महिला सदस्य को चुनाव मैदान में उतारने की संभावना भी बन सकती है।

भाजपा के गोपाल माली ने पिछली बार वार्ड नंबर 10 से चुनाव जीता था। इस बार सभापति पद महिला के लिए आरक्षित होने के कारण उनके परिवार से महिला प्रत्याशी को मैदान में उतारने की रणनीति पर भी चर्चा हो सकती है।

सुरक्षित वार्डों से बाहर हुए दिग्गज

वार्ड आरक्षण की लॉटरी ने कई ऐसे राजनीतिक चेहरों को उनके पारंपरिक वार्ड से बाहर कर दिया है, जिनकी वहां लंबे समय से मजबूत पकड़ मानी जाती रही है। अब इन नेताओं को दूसरे वार्डों में जाकर संगठन और मतदाताओं के बीच अपनी जमीन तैयार करनी होगी।

नया वार्ड चुनना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं होगा। स्थानीय स्तर पर मतदाता समीकरण, जातीय गणित, पुराने कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और पार्टी संगठन की स्थिति जैसे कई पहलू टिकट वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यही कारण है कि आरक्षण की घोषणा के तुरंत बाद संभावित प्रत्याशियों ने अपने-अपने स्तर पर नए वार्डों में संपर्क बढ़ाना शुरू कर दिया है।

नए चेहरों की एंट्री की संभावना

वार्डों के आरक्षण में बड़े बदलाव के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के लिए नए चेहरों को मौका देने का रास्ता भी खुल गया है। जिन वार्डों में पुराने दावेदार आरक्षण के कारण चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, वहां युवा नेताओं, पार्टी कार्यकर्ताओं और नए सामाजिक चेहरों को टिकट मिलने की संभावना बढ़ गई है।

दोनों प्रमुख दल अब बदले हुए समीकरणों के हिसाब से संभावित प्रत्याशियों की सूची तैयार करने में जुटेंगे। खासतौर पर महिला सभापति पद आरक्षित होने से महिला नेताओं और महिला कार्यकर्ताओं की राजनीतिक सक्रियता बढ़ने की संभावना है।

टिकट कटे तो निर्दलीय बढ़ा सकते हैं चुनौती

आरक्षण के कारण सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा उन दावेदारों से हो सकता है, जो लंबे समय से किसी वार्ड से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। यदि उन्हें आरक्षण या पार्टी टिकट के कारण मौका नहीं मिला तो उनके निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

ऐसे असंतुष्ट दावेदार कई वार्डों में भाजपा और कांग्रेस दोनों के अधिकृत प्रत्याशियों के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं। स्थानीय चुनावों में व्यक्तिगत संपर्क और वार्ड स्तर की पकड़ काफी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए टिकट वितरण में छोटी-सी नाराजगी भी दोनों दलों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।

इन वार्डों में बदला समीकरण

वार्ड नंबर 2: कांग्रेस के महेंद्र मेवाड़ा पिछली बार ओबीसी सीट से चुनाव जीतकर सभापति बने थे। इस बार वार्ड एसटी के लिए आरक्षित होने से उन्हें नया वार्ड तलाशना होगा।

वार्ड नंबर 3: कांग्रेस के जितेंद्र ऐरन ने सामान्य सीट से जीत दर्ज की थी। इस बार वार्ड एससी के लिए आरक्षित होने से चुनावी समीकरण बदल गया है।

वार्ड नंबर 11: भाजपा के सुरेश सगरवंशी पिछली बार सामान्य सीट से जीते थे। इस बार यह वार्ड सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने से उन्हें नया विकल्प तलाशना होगा।

वार्ड नंबर 17: भाजपा की गीता पुरोहित ने पिछली बार सामान्य महिला सीट से जीत दर्ज की थी। इस बार वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित होने से उन्हें दूसरे वार्ड का रुख करना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर वार्ड आरक्षण की लॉटरी ने सिरोही नगर परिषद की राजनीति में चुनाव से पहले ही हलचल बढ़ा दी है। अब असली नजर भाजपा और कांग्रेस के टिकट वितरण पर रहेगी। कौन सा नेता किस वार्ड से मैदान में उतरता है, किसे टिकट मिलता है और कौन बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ता है—इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सिरोही की चुनावी तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे। सभापति पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने के कारण इस बार नगर परिषद की चुनावी जंग में महिला चेहरों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है।

Kamlesh Purohit
Kamlesh Purohit
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