सिरोही। स्वायत्त शासन विभाग की ओर से गुरुवार को प्रदेश की 41 जिला परिषदों के प्रमुख पदों के लिए आरक्षण की लॉटरी निकाली गई। इस लॉटरी में सिरोही जिला परिषद के जिला प्रमुख पद के लिए एक बार फिर अनारक्षित सीट सामने आई है। लगातार चौथी बार अनारक्षित सीट रहने से जिले की राजनीति में हलचल तेज होना तय माना जा रहा है। आरक्षण की तस्वीर साफ होने के साथ ही अब भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में जिला प्रमुख पद के दावेदारों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढऩे की संभावना है। सिरोही जिला प्रमुख का पद इस बार भी अनारक्षित रहने से सामान्य वर्ग के साथ-साथ अन्य वर्गों के संभावित दावेदारों के लिए भी चुनावी मैदान में उतरने का रास्ता खुल गया है। यही कारण है कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में टिकट की दावेदारी को लेकर अंदरूनी स्तर पर जोड़-तोड़, संपर्क और समीकरण बनाने का दौर तेज हो सकता है। पंचायत चुनावों से पहले जिला प्रमुख पद का आरक्षण राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।
2015 में थी अनारक्षित महिला सीट
सिरोही जिला परिषद के जिला प्रमुख पद के आरक्षण का इतिहास देखें तो वर्ष 2015 में यहां अनारक्षित महिला सीट रही थी। इसके बाद भी अनारक्षित श्रेणी से जुड़ा आरक्षण सामने आता रहा है। अब लगातार चौथी बार अनारक्षित सीट खुलने से जिले के राजनीतिक गलियारों में इसे काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आरक्षण की घोषणा के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि भाजपा और कांग्रेस किस चेहरे को जिला प्रमुख पद के लिए मैदान में उतारती हैं। दोनों दलों के सामने मजबूत, सक्रिय और अपने-अपने क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले जिला परिषद सदस्यों को साथ लेकर चलने वाले चेहरे का चयन करना चुनौतीपूर्ण रहेगा।
जिला प्रमुख का पद केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जिला परिषद के भीतर राजनीतिक नेतृत्व और संगठनात्मक प्रभाव का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। ऐसे में टिकट के इच्छुक नेताओं ने अपने राजनीतिक संपर्कों को मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है।
21 से बढक़र 27 हुए जिला परिषद वार्ड
इस बार सिरोही जिला परिषद चुनाव में परिसीमन के कारण वार्डों की संख्या में भी बड़ा बदलाव हुआ है। पिछले जिला परिषद चुनावों तक जिले में कुल 21 वार्ड थे, जबकि नए परिसीमन के बाद इनकी संख्या बढक़र 27 हो गई है। यानी जिला परिषद में इस बार छह नए वार्ड जुड़ गए हैं। वार्डों की संख्या बढऩे का सीधा असर चुनावी समीकरणों पर पडऩा तय माना जा रहा है। नए वार्डों के गठन से कई क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाओं और राजनीतिक समीकरणों में बदलाव आया है। इससे पुराने नेताओं के सामने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों को बनाए रखने की चुनौती होगी, वहीं नए क्षेत्रों से नए राजनीतिक चेहरों को भी आगे आने का अवसर मिलेगा। परिसीमन के बाद कई संभावित उम्मीदवारों को अपने पुराने चुनावी क्षेत्र से अलग क्षेत्र में राजनीतिक जमीन तैयार करनी पड़ सकती है। वहीं कुछ ऐसे नेता भी सामने आ सकते हैं, जो नए वार्डों के गठन के बाद पहली बार जिला परिषद चुनाव में अपनी किस्मत आजमाएंगे।
टिकट के लिए दोनों दलों में बढ़ेगी दावेदारी
जिला प्रमुख पद के लिए सीट अनारक्षित होने के बाद भाजपा और कांग्रेस में टिकट के दावेदारों की संख्या बढऩा स्वाभाविक है। दोनों दलों में ऐसे कई नेता हैं, जो लंबे समय से स्थानीय राजनीति में सक्रिय हैं और जिला परिषद स्तर पर अपनी राजनीतिक पकड़ बनाने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा के लिए जिला परिषद चुनाव संगठनात्मक मजबूती और ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का अवसर होगा। वहीं कांग्रेस भी अपने परंपरागत प्रभाव वाले क्षेत्रों में मजबूत उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को कड़ा बनाने की रणनीति पर काम कर सकती है। जिला प्रमुख पद के लिए उम्मीदवार तय करते समय दोनों दलों को केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि संबंधित उम्मीदवार के क्षेत्रीय समीकरण, संगठन में पकड़, स्थानीय नेताओं से संबंध और चुनाव के बाद जिला परिषद में बहुमत जुटाने की क्षमता जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।
नए परिसीमन से बदलेगा चुनावी गणित
27 वार्ड होने के बाद जिला परिषद चुनाव का दायरा भी बढ़ गया है। नए परिसीमन से राजनीतिक दलों के सामने नए क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करने की जरूरत होगी। जिन नेताओं का प्रभाव पहले सीमित वार्ड तक था, उन्हें अब नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के साथ तालमेल बैठाना पड़ सकता है। जिला परिषद के चुनाव में वार्ड स्तर के समीकरण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। किसी एक क्षेत्र में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे और पंचायत स्तर के संबंध चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं नए वार्डों में स्थानीय स्तर पर उभर रहे नेताओं को अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने का मौका मिलेगा। इससे आने वाले समय में सिरोही जिले की ग्रामीण राजनीति में नए चेहरों का प्रभाव भी बढ़ सकता है।
चुनाव से पहले शुरू होगी रणनीतिक तैयारी
आरक्षण की लॉटरी और नए परिसीमन के बाद अब राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज होने की उम्मीद है। संभावित उम्मीदवार क्षेत्र में जनसंपर्क बढ़ा सकते हैं और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क साधने का प्रयास कर सकते हैं। वहीं पार्टी संगठन भी संभावित उम्मीदवारों की जमीनी स्थिति का आकलन करने में जुटेंगे। जिला प्रमुख पद के लिए सीधे जनता के बजाय जिला परिषद सदस्यों के बीच बनने वाला राजनीतिक समर्थन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसलिए संभावित उम्मीदवारों के लिए चुनाव से पहले ही विभिन्न वार्डों में अपने समर्थकों और राजनीतिक संपर्कों को मजबूत करना अहम होगा। अब निगाहें भाजपा और कांग्रेस के टिकट वितरण पर रहेंगी। जैसे-जैसे चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, दावेदारों के नाम और स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी अधिक स्पष्ट होते जाएंगे।












