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राजस्थान में मौसमों का महासंगम: सर्दी, गर्मी, बारिश और पतझड़ एक मंच पर

सिरोही। कभी ग्लोबल वार्मिंग की चिंता, कभी जंगलों की कटाई पर बहस, तो कभी धरती के अंधाधुंध दोहन की खबरें। इन सबके बीच अब एक नया चमत्कार देखने को मिल रहा है। लगता है जैसे प्रकृति ने भी लोकतंत्र अपना लिया हो और सभी ऋतुओं को एक साथ भागीदारी दे दी हो। सुबह-सुबह जब नींद खुलती है तो लगता है मानो सर्दी ने फिर से वापसी कर ली हो। लोग कंबल में दुबके रहते हैं, चाय की चुस्की लेते हुए सोचते हैं कि अभी तो अप्रेल है, ये जनवरी वाला एहसास क्यों? लेकिन जैसे ही घड़ी दोपहर की ओर बढ़ती है, वही सर्दी अचानक छुट्टी पर चली जाती है और गर्मी बिना बुलाए मेहमान की तरह आ धमकती है। धूप इतनी तेज कि लगता है सूरज ने भी ओवरटाइम शुरू कर दिया है। दोपहर में पंखा, कूलर और एसी सब एक साथ चालू हो जाते हैं, और लोग सोचते हैं कि अब तो पूरी तरह गर्मी आ गई। लेकिन शाम होते-होते आसमान का मिजाज बदल जाता है। बादल घिर आते हैं, हवा में नमी बढ़ जाती है और कभी-कभी तो बारिश भी ऐसे होती है जैसे सावन का महीना चल रहा हो। अगर किस्मत ज्यादा मेहरबान हो तो ओले भी गिर जाते हैं। मानो मौसम ने सरप्राइज पैकेज दे दिया हो। सडक़ किनारे पेड़ों को देखें तो वे भी कंफ्यूज नजर आते हैं। कहीं हरे-भरे पत्ते, तो कहीं सूखे पत्तों की चादर बिछी हुई जैसे पतझड़ और बसंत ने समझौता कर लिया हो आखिर ये सब हो क्यों रहा है? विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ग्लोबल वार्मिंग का असर है। यानी पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है। लेकिन आम आदमी की भाषा में कहें तो प्रकृति अब नाराज है। वर्षों से हो रही जंगलों की कटाई, नदियों का सूखना, पहाड़ों का टूटना और जमीन का अंधाधुंध इस्तेमाल इन सबने मिलकर मौसम को भी अस्थिर कर दिया है। पहले जहां हर ऋतु का अपना एक तय समय होता था। सर्दी सर्दियों में, गर्मी गर्मियों में और बारिश अपने मौसम में। अब वो समय-सारणी भी गड़बड़ा गई है। ऐसा लगता है जैसे मौसम विभाग की फाइलें भी मिश्रित हो गई हों और किसी को समझ नहीं आ रहा कि कौनसी ऋतु कब आएगी। इस बदलाव का असर सिर्फ लोगों की दिनचर्या पर ही नहीं, बल्कि खेती-किसानों पर भी पड़ रहा है। किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं। वे तय नहीं कर पा रहे कि कब बोवाई करें और कब कटाई। बारिश समय पर नहीं होती, या फिर इतनी ज्यादा हो जाती है कि फसल खराब हो जाती है। कभी ओले गिर जाते हैं, तो कभी अचानक गर्मी बढ़ जाती है। जिससे फसलें झुलस जाती हैं। इंसान खुद इस स्थिति का जिम्मेदार है और फिर उसी पर चर्चा भी करता है। एक तरफ पेड़ों की कटाई जारी है, दूसरी तरफ पर्यावरण बचाओ के नारे लगाए जा रहे हैं। प्लास्टिक का उपयोग कम करने की बात होती है, लेकिन बाजार में हर चीज प्लास्टिक में ही मिलती है। यानी हम समस्या भी खुद पैदा कर रहे हैं और समाधान भी भाषणों में ढूंढ रहे हैं। सिरोही जैसे छोटे शहरों में भी अब बड़े शहरों जैसी समस्याएं दिखने लगी हैं। पहले यहां का मौसम अपेक्षाकृत संतुलित रहता था, लेकिन अब यहां भी वही मौसमी ड्रामा देखने को मिल रहा है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में शायद हमें मौसम शब्द की परिभाषा ही बदलनी पड़ेगी। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अब भी समय है संभलने का। अगर हमने अब भी ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में हालात और भी बिगड़ सकते हैं। यह सिर्फ तापमान का सवाल नहीं है, बल्कि हमारे अस्तित्व का सवाल है। अगर मौसम ही स्थिर नहीं रहेगा तो जीवन भी अस्थिर हो जाएगा।

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जैसलमेर में दिखा दुर्लभ कैरेकल का कुनबा, रेडियो कॉलर से खुल रहे रहस्य

जैसलमेर। भारत की जैव विविधता दुनिया में सबसे समृद्ध मानी जाती है, लेकिन इसी विविधता के बीच कुछ ऐसी प्रजातियां भी हैं जो धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही हैं। ऐसी ही एक रहस्यमयी और दुर्लभ प्रजाति है कैरेकल बिल्ली, जिसे आमतौर पर रेगिस्तानी लिंक्स भी कहा जाता है। इसकी तेज रफ्तार, अद्भुत छलांग लगाने की क्षमता और विशिष्ट काले कानों की लटें इसे अन्य जंगली बिल्लियों से अलग बनाती हैं। राजस्थान के जैसलमेर जिले में दुर्लभ वन्यजीव कैरेकल को लेकर बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और वन विभाग की संयुक्त पहल के तहत इस रहस्यमयी बिल्ली पर लगातार रिसर्च की जा रही है। हाल ही में घोटारू क्षेत्र में रेडियो कॉलर और मोशन सेंसिंग कैमरे की मदद से कैरेकल का पूरा कुनबा कैमरे में कैद हुआ है। यह न केवल वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से बड़ी सफलता है, बल्कि इससे इस विलुप्तप्राय प्रजाति के व्यवहार और अस्तित्व को समझने में भी मदद मिलेगी। कैरेकल एक बेहद दुर्लभ और शर्मीली जंगली बिल्ली है, जो मुख्य रूप से अफ्रीका, मध्य एशिया और भारत के कुछ सीमित क्षेत्रों में पाई जाती है। भारत में इसकी मौजूदगी बेहद कम हो चुकी है और यह अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है। इसकी पहचान इसके लंबे काले बालों वाले कान, फुर्तीले शरीर और तेज शिकार करने की क्षमता से होती है। हालांकि यह असली लिंक्स प्रजाति से अलग है। जैसलमेर के घोटारू इलाके में लगाए गए मोशन सेंसिंग कैमरे ने एक बेहद खास पल को कैद किया कैरेकल का पूरा कुनबा एक साथ नजर आया। यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कैरेकल आमतौर पर अकेले रहने वाला जीव माना जाता है। वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरों और रेडियो कॉलर से यह पहली बार स्पष्ट रूप से सामने आया है कि इस क्षेत्र में कम से कम तीन कैरेकल मौजूद हैं। इससे पहले इनकी संख्या को लेकर केवल अनुमान ही लगाए जाते थे। वन विभाग ने करीब 7 दिन पहले एक कैरेकल पर रेडियो कॉलर लगाया था। इस कॉलर की मदद से वैज्ञानिक और वन अधिकारी उसके मूवमेंट, व्यवहार और शिकार के पैटर्न पर नजर रख पा रहे हैं। हाल के वर्षों में भारत के कुछ हिस्सों, विशेषकर राजस्थान और गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में इसके देखे जाने की खबरें सामने आई हैं, जिससे वन्यजीव प्रेमियों और वैज्ञानिकों में उत्साह तो है, लेकिन इसकी घटती संख्या चिंता का विषय भी बन गई है।कैरेकल एक मध्यम आकार की जंगली बिल्ली है जो अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। भारत में यह बेहद दुर्लभ है और मुख्यत: पश्चिमी भारत के सूखे और अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में ही देखी जाती है। वह किस प्रकार के शिकार को प्राथमिकता देता है। रेगिस्तानी परिस्थितियों में वह कैसे जीवित रहता है वन विभाग अब इस दुर्लभ जीव को बचाने के लिए पूरी तरह सक्रिय हो गया है। मुख्य वन संरक्षक जोधपुर, अनूप के. आर. के अनुसार, जैसलमेर वन विभाग की टीम लगातार कैमरा ट्रैप के जरिए कैरेकल की निगरानी कर रही है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें लोगों को बताया जा रहा है कि कैरेकल का शिकार करना कानूनन अपराध है। यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सख्त दंडनीय है।  

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