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जहां कभी पसरा रहता था डर, वहां साथ-साथ दौड़ रहे पुलिस और पुनर्वासित माओवादी

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बस्तर, जो पिछले चार दशकों तक माओवादी हिंसा और भय के लिए जाना जाता था, रविवार को नई उम्मीद और उत्साह का केंद्र बन गया। वही सड़कें, जहाँ कभी गोलियों की आवाजें गूंजती थीं, अब धावकों की धमक, जयकारों और उत्साह से गूँज रही थीं। इस बदलाव का प्रतीक बना बस्तर हेरिटेज मैराथन-2026, जिसने न केवल खेल का उत्सव बल्कि सामाजिक समरसता और बदलाव की कहानी पेश की।

लगभग 10,000 प्रतिभागी इसमें शामिल हुए, जिनमें पुनर्वासित माओवादी, पुलिसकर्मी, आदिवासी युवा, महिलाएं और विदेशी खिलाड़ी शामिल थे। यह दृश्य उस सामाजिक बदलाव का प्रतीक था, जो कुछ साल पहले तक किसी की कल्पना में मुश्किल था।


मैराथन का मार्ग और सांस्कृतिक उत्सव

मैराथन की शुरुआत लालबाग मैदान से हुई और यह शहर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों से होकर चित्रकोट जलप्रपात तक पहुंची। लगभग 42 किलोमीटर के इस फुल मैराथन में दंतेश्वरी मंदिर, बस्तर दशहरा रथ और दलपत सागर जैसे स्थल शामिल थे।

रास्ते में जनजातीय लोक कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य और संगीत के साथ धावकों का उत्साह बढ़ाते रहे। कहीं धुरवा नृत्य, कहीं गौर सिंग, तो कहीं मुंडाबाजा और गेड़ी नृत्य ने भाग लेने वालों को सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ा।

देश के विभिन्न राज्यों से आए धावकों के साथ 100 से अधिक विदेशी खिलाड़ी भी इस उत्सव का हिस्सा बने।


पुनर्वासित माओवादी और पुलिसकर्मी की भागीदारी

सबसे प्रेरक क्षण तब आया, जब पुनर्वासित माओवादी सुकमन ने कहा:
“कल तक मैं इन रास्तों में एंबुश लगाता था, आज मैं रनिंग शूज पहनकर पदक जीतने के लिए दौड़ रहा हूँ।”

सुकमन की साथी संमति ने बताया कि वही पुलिस जवान जो कभी उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ते थे, आज पानी पिलाकर उनका हौसला बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव दिखाता है कि पुरानी दुश्मनी सहयोग और समझदारी में बदल सकती है।


प्रेरक कहानियाँ: हौसले की कोई उम्र नहीं

मैराथन ने सिर्फ प्रतिस्पर्धा ही नहीं, बल्कि प्रेरक कहानियाँ भी गढ़ीं।

  • पीयूष कुमार, कृषि महाविद्यालय के प्राचार्य, जिनका एक पैर नहीं था, उन्होंने 5 किलोमीटर की दौड़ पूरी की।
  • उम्र की कोई सीमा नहीं, यह साबित करते हुए 5 साल के वंश और 72 वर्षीय गुरमील सिंह ने भी दौड़ में भाग लिया।

इन कहानियों ने यह संदेश दिया कि शारीरिक बाधाएँ और उम्र किसी को हिम्मत हारने नहीं देती।


विजेता और पुरस्कार

फुल मैराथन (42 किमी)

  • पुरुष वर्ग: टेडेजे किनेटो वाशे (इथियोपिया)
  • महिला वर्ग: मेसेरेट मेंगिस्तु
  • बस्तर से पुरुष: संजय कोर्राम, महिला: कुसुम शार्दुल

हाफ मैराथन (21 किमी)

  • पुरुष ओपन: मोनू कुमार, महिला ओपन: त्सेहे देसाले
  • बस्तर से पुरुष: भावेष कुमार, महिला: कुमली पोयाम

10 किलोमीटर ओपन

  • पुरुष: बबलू, महिला: पूनम

जूनियर वर्ग

  • पुरुष: सागर, महिला: लावण्या

सब-जूनियर वर्ग

  • पुरुष: मोहित धोंडू, महिला: अंजलि गुप्ता

इन विजेताओं ने न केवल खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, बल्कि शांति और सहयोग का संदेश भी दिया।


मैराथन का सामाजिक संदेश

बस्तर हेरिटेज मैराथन-2026 केवल एक खेल आयोजन नहीं रहा। यह शांति, बदलाव और सामाजिक समरसता का प्रतीक बन गया।

  • माओवादी हिंसा से प्रभावित लोगों ने अब खेल के माध्यम से समाज में अपनी जगह बनाई
  • पुलिस और पुनर्वासित माओवादी की दोस्ती और सहयोग ने दिखाया कि कभी दुश्मन भी सहयोगी बन सकते हैं।
  • स्थानीय युवाओं, महिलाओं और आदिवासियों ने भागीदारी दिखाकर सकारात्मक सामाजिक संदेश दिया।

निष्कर्ष

बस्तर हेरिटेज मैराथन ने यह साबित किया कि भूतकाल का डर और हिंसा भी बदलाव और सहयोग में बदल सकते हैं।

  • खेल ने सामाजिक समरसता, शांति और उत्साह का संदेश दिया।
  • प्रतिभागियों की कहानियाँ यह दिखाती हैं कि हौसला, धैर्य और आत्मविश्वास किसी भी चुनौती को पार कर सकते हैं।
  • पुनर्वासित माओवादी और पुलिसकर्मी की भागीदारी यह दर्शाती है कि पुरानी दुश्मनी भी दोस्ती और सहयोग में बदल सकती है।

यह आयोजन अब बस्तर में शांति और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बन गया है, जो आने वाले वर्षों में भी युवाओं और समाज को प्रेरित करता रहेगा।

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