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Author name: Kamlesh Purohit

As parties intensify efforts to woo voters, ‘power art’ takes centre stage in Chennai
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चुनाव को लुभाने के लिए राजनीतिक पार्टियों की बढ़ती कोशिशों के बीच चेन्नई में ‘पावर आर्ट’ की महत्वपूर्ण भूमिका

चुनाव की लगन में जहां राजनीतिक दल जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए नई-नई रणनीतियां अपना रहे हैं, वहीं चेन्नई के चिंतद्रिपेट के कारीगर अपनी पारंपरिक कला को एक नए रूप में उभार रहे हैं। यहाँ के कारीगर जो पारंपरिक लेस माला बनाते हैं, वे इसे चुनावी माहौल के अनुरूप नया स्वरूप देते नजर आ रहे हैं। रेशमी धागों और कड़ी मेहनत से बुनी गई लेस माला अब केवल सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि चुनावी महत्वाकांक्षा के साथ जुड़ी एक कला बन गई है। कारीगर इस कला के माध्यम से राजनीतिक संदेश और चुनावी प्रतीक भी माला में शामिल कर रहे हैं, ताकि यह जनता के बीच प्रभावशाली तरीके से पहुंच सके। स्थानीय कारीगर राघव ने बताया, “पारंपरिक रूप से ये माला शादियों, त्योहारों और धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल होती थी, लेकिन हाल के चुनावों में राजनीतिक दल इसे अपने प्रचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहे हैं। हम लोग अपनी कला में रंग और डिज़ाइन को इस तरह से बदल रहे हैं कि वह विभिन्न पार्टियों के चुनाव चिन्हों और नीतियों को दर्शाए।” राजनीतिक पार्टियों की ओर से इस कला को अपनाने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि जनता के बीच इस तरह की कलात्मक और सांस्कृतिक वस्तुएं आसानी से पहुंचती हैं और उनकी याददाश्त में बने रहती हैं। इसलिए प्रचार सामग्री के रूप में लेस माला का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। चेन्नई के चुनाव विश्लेषक डॉ. सुमित्रा ने कहा, “लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाता को लुभाने के लिए सिर्फ दौड़ और भाषण काफी नहीं होते। लोक-संस्कृति और लोक-कला का समावेश चुनावों को और प्रभावशाली बनाता है। लेस माला जैसी स्थानीय कला चुनाव प्रचार को एक सांस्कृतिक आयाम देती है, जिससे राजनीतिक पार्टियों का जनसमुह के बीच प्रभाव बढ़ता है।” यह बदलाव केवल कारीगरों के लिए रोजगार के नए अवसर ही नहीं प्रदान कर रहा है, बल्कि राजनीतिक संवाद में सांस्कृतिक तत्वों की उपस्थिति भी बढ़ा रहा है। इसके साथ ही, यह स्थानीय समुदाय मे अपनी कला के लिए गर्व की भावना भी जगाता है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, चिंतद्रिपेट के ये कारीगर अपनी कलात्मक क्षमता से सत्ता के खेल को सजाने में लगे हैं। यह एक अनूठा मिश्रण है लोकतंत्र का, कला का और राजनीति का, जो चेन्नई की सड़कों से लेकर मतदाताओं के दिलों तक पहुंच रहा है।

IPL 2026: Dhoni set to miss first two weeks of IPL due to calf strain
खेल जगत

आईपीएल 2026: धोनी पहले दो सप्ताह आईपीएल नहीं खेलने के लिए तैयार, बछड़े में खिंचाव का सामना

गुवाहाटी, असम | 30 मार्च 2026 आईपीएल 2026 का आगाज होते ही चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) का सामना राजस्थान रॉयल्स से गुवाहाटी में होगा। यह मुकाबला 30 मार्च को आयोजित किया जाएगा, जिसमें क्रिकेट प्रेमियों की नज़रें एक बार फिर से आईपीएल के इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट पर टिकी होंगी। चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी इस आईपीएल सीजन की शुरुआत से पहले ही एक बड़ी चोट के कारण परेशान हैं। धोनी के बछड़े में खिंचाव आया है, जिसकी वजह से वे टूर्नामेंट के पहले दो सप्ताह के मुकाबलों से बाहर रह सकते हैं। इससे न केवल टीम को बल्कि धोनी के प्रशंसकों को भी चिंता हो रही है, क्योंकि वह टीम के लिए एक अहम खिलाड़ी हैं। धोनी की अनुपस्थिति में CSK को अपनी रणनीतियों और खेल संयोजन में कई बदलाव करने पड़ सकते हैं। उनके चोटिल होने की खबर टीम प्रबंधन के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि धोनी की कप्तानी और विकेटकीपिंग के साथ-साथ बल्लेबाजी की भूमिका भी टीम के लिए काफी महत्वपूर्ण है। मार्च के अंत में शुरू हो रहे आईपीएल के इस सीजन में, CSK की पहली चुनौती राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ होगी। राजस्थान रॉयल्स की टीम भी इस वर्ष मजबूत दिख रही है और दोनों टीमों के बीच मुकाबला बेहद प्रतिस्पर्धात्मक रहने की उम्मीद है। चोट के कारण धोनी के खेल से बाहर रहने की संभावना को देखते हुए, CSK के अन्य खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ जाएगा कि वे टीम के लिए बेहतर प्रदर्शन करें। युवा खिलाड़ियों को मौके मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है। CSK के मुख्य कोच और टीम प्रबंधक ने धोनी की चोट के बारे में कहा है कि वे पूरी देखभाल और आराम करवा रहे हैं ताकि वह जल्द से जल्द फिट होकर टीम में लौट सकें। साथ ही, उन्होंने यह भी माना कि आईपीएल में चोट का होना टीम के लिए एक चुनौती है, लेकिन पूरे सीजन में टीम अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रतिबद्ध है। आईपीएल 2026 के इस रोमांचक सफर के दौरान धोनी की स्थिति और उनकी वापसी की खबरें सभी क्रिकेट प्रेमी उत्सुकता से जानना चाहेंगे। फिलहाल, गुवाहाटी में होने वाले CSK और राजस्थान रॉयल्स के मुकाबले पर सभी की निगाहें टिकी हैं, जो इस सीजन की शुरुआत का एक बेहतरीन उदाहरण साबित हो सकता है। इस बारे में और अपडेट्स के लिए फैंस को टीम की आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया चैनलों पर नज़र बनाए रखनी चाहिए। आईपीएल के इस सीजन में दर्शकों को क्रिकेट के कई रोमांचक पलों का अनुभव होगा, जहाँ टीमों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिलेगी।

IIT Guwahati team develops energy-efficient bricks
तकनीकी

आईआईटी गुवाहाटी की टीम ने विकसित किए ऊर्जा-कुशल ईंट के नए मॉडल

आईआईटी गुवाहाटी की एक शोध टीम ने ऊर्जा कुशल ईंटों का विकास किया है, जो भवनों को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में सक्षम हैं। इस नए आविष्कार को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से स्थायी निर्माण के लिए एक प्रभावी समाधान के रूप में देखा जा रहा है। शोधकर्ताओं ने बताया कि इन ईंटों को विशेष प्रकार की सामग्री और डिजाइन तकनीक के साथ तैयार किया गया है, जिससे यह गर्मी को कम अवशोषित करती हैं और भवन के अंदर तापमान को नियंत्रित कर प्राकृतिक शीतलता प्रदान करती हैं। इस तकनीक से ऊर्जा की खपत में काफी कमी आ सकती है, खासकर एयर कंडीशनिंग जैसी प्रणालियों पर निर्भरता घटती है, जो बिजली बचाने के साथ-साथ पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। टीम के प्रमुख सदस्य ने कहा, “हमने इस परियोजना में पर्यावरण अनुकूल और आर्थिक दृष्टि से सुलभ विकल्पों पर ध्यान दिया है। इन ईंटों का उद्देश्य गर्मी के प्रभाव को कम करना और शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा की बचत करना है।” शोधकर्ताओं ने उम्मीद जताई है कि यह तकनीक लंबी अवधि में निर्माण क्षेत्र में मानक बन जाएगी और नवाचारों को बढ़ावा देगी। स्थानीय निर्माण कंपनियां और सरकार इस पहल को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रही हैं। इस नवाचार को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए सहयोग और निवेश की भी योजना बनाई जा रही है। साथ ही, शोध टीम ने आगे के परीक्षण एवं सुधार के लिए विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में इन ईंटों का उपयोग करने पर काम शुरू कर दिया है। इस पहल से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा कुशल निर्माण सामग्री की आवश्यकता आज के समय में तेजी से बढ़ती जा रही है, क्योंकि बढ़ती गर्मी और ऊर्जा संकट ने नए और टिकाऊ समाधानों की मांग बढ़ा दी है। IIT गुवाहाटी की यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तकनीकी नवाचार देश में ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रयासों को मजबूत करेगा। अंततः, इस तरह के अनुसंधान और विकास से न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि स्वच्छ और स्वस्थ जीवन के लिए भी बेहतर पर्यावरणीय परिस्थितियां उपलब्ध होंगी।

Sathish Gujral: a silence that exploded
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सतीश गुजरल: एक सन्नाटा जिसने छिड़काव किया

सतीश गुजरल, एक महान समकालीन कलाकार, जिन्होंने श्रवण क्षति के बावजूद कला की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी, अभी नई दिल्ली में अपनी शताब्दी प्रदर्शनी की वजह से चर्चा में हैं। इस प्रदर्शनी में उनके जीवन और कला के अनगिनत पहलुओं को दर्शाया गया है, जो दर्शकों को उनके अद्भुत और समर्पित काम की गहराई में ले जाता है। सतीश गुजरल की श्रवण क्षमता में कमी ने उन्हें रुकने या हार मानने के बजाय, उन्हें एक नए तरीके से दुनिया को देखने और अभिव्यक्ति करने के लिए प्रेरित किया। उनकी सुनने की सीमा ने उनके आसपास की चीजों को समझने और कला के नए रूपों को खोजने की भूख को बढ़ावा दिया। यह प्रदर्शनी इसी जज्बे की सफलता का प्रतीक है, जहाँ उनके विभिन्न चित्रों, मूर्तियों, और स्केचों के जरिये उनकी कलात्मक ऊर्जा दिखाई देती है। इसं प्रदर्शनी का आयोजन नई दिल्ली की प्रमुख आर्ट गैलरियों में से एक में किया गया है, जो सतीश गुजरल के सौ वर्ष पूरे होने पर आयोजित की गई है। यह अवसर सिर्फ एक उत्सव नहीं है बल्कि भारत की कला और कलाकारों को विश्व पटल पर स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। गुजरल की कला का सार उनके दृढ़ निश्चय, मौलिक दृष्टिकोण, और बिना शब्दों के संवाद से भरा हुआ है। कुंदन, टॉम और अन्य आधुनिक कलाकारों के साथ उनके सहयोग ने उनके कार्य को और अधिक समृद्ध और बहुमुखी बनाया है, लेकिन यह प्रदर्शनी बताती है कि सतीश की प्रतिभा स्वयं में अनुभूत होती है। यहां उनकी पेंटिंग्स के साथ साथ उनके द्वारा बनाए गये सार्वजनिक कला और इन्स्टालेशन भी प्रदर्शित किए गए हैं, जो दर्शकों को उनकी बहुमुखी प्रतिभा से रूबरू कराते हैं। आलोचकों का मानना है कि सतीश गुजरल ने जो असीम ऊर्जा अपनी कला में उड़ेल दी, वह आज भी युवाओं को प्रेरित कर रही है। शारीरिक बाधाओं को पार कर उन्होंने अपनी कला के जरिए एक अनूठी पहचान बनाई। इस प्रदर्शनी के माध्यम से, नई पीढ़ी कलाकारों और सामान्य दर्शकों को यह संदेश मिलता है कि अस्थायी चुनौतियां सफलता की राह में कभी बाधा नहीं बनतीं। अंत में, सतीश गुजरल का यह शताब्दी समारोह न केवल उनके ऐतिहासिक योगदान का सम्मान करता है, बल्कि भारतीय कला की समृद्ध परंपरा को भी वैश्विक मंच तक पहुंचाने में सहायक साबित होता है। नई दिल्ली में इस प्रदर्शनी का दौर लगातार तीन महीने तक चलेगा, जहां कला प्रेमी इसे देख सकते हैं और उस मौन विस्फोट का हिस्सा बन सकते हैं जिसने सतीश गुजरल की दुनिया को आकार दिया।

Joining the dots in Jamshedpur | A Parsi family archive turns into ‘Sparseeing’
लाइफस्टाइल

जमशेदपुर में जुड़ते धागे | एक पारसी परिवार का अभिलेख ‘स्पार्सिंग’ में बदलता नजर

दो प्रतिष्ठित लोकाज़ी फोटूबुक ग्रांट विजेता, जॉयोना मेधी और अभिषेक बसु, पारिवारिक अभिलेख को नए दृष्टिकोण और अभिव्यक्ति के साथ पेश कर रहे हैं। उनके इस अनोखे प्रयास ने पारिवारिक यादों को एक कला और इतिहास के रूप में पुनर्जीवित किया है, जो ‘स्पार्सिंग’ नामक कला परियोजना का हिस्सा है। ‘स्पार्सिंग’ एक ऐसा मौलिक प्रोजेक्ट है जिसमें पारसी परिवार के निजी अभिलेखों, तस्वीरों और दस्तावेजों को एक नये नजरिए से देखा और प्रस्तुत किया गया है। जॉयोना मेधी और अभिषेक बसु ने पारंपरिक पारिवारिक चित्र संग्रह से हटकर ऐसी रचनात्मक विधा अपनाई है, जो दर्शकों को व्यक्तिगत और सामूहिक स्मृतियों को अधिक गहराई से समझने का अवसर देती है। जॉयोना मेधी के अनुसार, “हमारे प्रयासों का मकसद केवल तस्वीरें दिखाना नहीं, बल्कि उनकी पृष्ठभूमि, कहानी और भावनाओं को जीवंत करना है। पारिवारिक अभिलेख हमारे इतिहास का आईना होते हैं, पर अक्सर उन्हें चुनौतीपूर्ण और अनुपयोगी समझ लिया जाता है। हम इसे बदलना चाहते हैं।” इस परियोजना के तहत, अभिषेक बसु ने पारसी परिवारों के सांस्कृतिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उनके दैनंदिन जीवन और परंपराओं को तस्वीरों के माध्यम से उजागर किया है। उन्होंने कहा, “जब हम अपने अतीत को समझते हैं, तो हम अपने वर्तमान और भविष्य को बेहतर रूप से समझ पाते हैं। यह परियोजना उन अनकहे कथाओं को सामने लाने का एक जरिया है जो अक्सर समय के साथ धूल में खो जाती हैं।” लोकाज़ी फोटूबुक ग्रांट जैसे मंच इस तरह के कलाकारों और फोटोग्राफरों को नई संभावनाएं प्रदान करते हैं। यह प्रोत्साहन उन्हें अपनी कला के दम पर सामाजिक, सांस्कृतिक, और पारिवारिक इतिहास को समृद्ध करने के लिए एक अनमोल अवसर देता है। ‘स्पार्सिंग’ परियोजना का प्रदर्शन जल्द ही भारत में कई प्रमुख कला सम्मेलनों और प्रदर्शनी स्थलों पर आयोजित किया जाएगा, जहां पारिवारिक अभिलेखों की इस नई प्रस्तुति को लेकर व्यापक चर्चा और सराहना की उम्मीद है। यह पहल दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक यादों और दस्तावेजों को आधुनिक कला के माध्यम से पुनः जीवित किया जा सकता है, जिससे अगली पीढ़ी तक सांस्कृतिक विरासत सजीव और प्रासंगिक बनी रहे।

Puducherry CM Rangasamy kicks off poll campaign, highlights crisis in INDIA bloc
राज्य-शहर

पुडुचेरी के मुख्यमंत्री रंगासामी ने चुनाव अभियान शुरू किया, INDIA ब्लॉक की संकटों पर दिया जोर

पुडुचेरी के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेश में एनडीए के प्रमुख श्री रंगासामी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत बड़ी जोरशोर से की है। उन्होंने POLL CAMPAIGN के दौरान INDIA ब्लॉक में चल रहे कई संकटों को केंद्र में रखा और जनता को इसके प्रति जागरूक करने का प्रयास किया। मुख्यमंत्री रंगासामी ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में भारत के प्रति केंद्र सरकार की नीतियां और उनका क्रियान्वयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विशेष रूप से INDIA ब्लॉक में हो रहे संकटों को उजागर किया और जनता से आह्वान किया कि वे अपने भविष्य के लिए सही विकल्प चुने। एनडीए के प्रमुख होने के नाते, रंगासामी ने खासतौर पर अपने प्रतिद्वंद्वी, पुडुचेरी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष एवं सांसद वी. वैथिलिंगम के विरुद्ध सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करने का फैसला किया है। उन्होंने जनता से अपील की कि वे विकास कार्यों और क्षेत्र की समृद्धि को ध्यान में रखते हुए मतदान करें। रंगासामी ने बताया कि उन्होंने प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं, जो जनता के जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि विपक्ष ने विकास के प्रयासों में बाधा डालने का काम किया है और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते प्रदेश की भलाई को नजरअंदाज किया है। उन्होंने आगे कहा कि एनडीए के नेतृत्व में पुडुचेरी की तस्वीर बदली है और इसका श्रेय जनता की सहभागिता और सही दिशा में उठाए गए कदमों को जाता है। रंगासामी ने जोर देकर कहा कि इस बार के चुनाव में जनता का चुनाव प्रदेश के विकास को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा। इस चुनावी दौर में मुख्यमंत्री रंगासामी ने विभिन्न जनसभाओं और रोड शो के माध्यम से सीधे जनता से संवाद किया, जहां उन्होंने मतदान के महत्व पर चर्चा की और लोगों को जागरूक किया। विपक्ष की रणनीतियों का सामना करते हुए, रंगासामी ने अपनी बात साफ की कि उनका मकसद केवल चुनाव जीतना नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के लिए स्थायी विकास सुनिश्चित करना है। पुडुचेरी में इस चुनाव का माहौल गर्माता जा रहा है, जहां दोनों प्रमुख पार्टियां अपने-अपने प्रयासों को दोगुना कर चुकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस मुकाबले पर है, जो न केवल क्षेत्रीय महत्व का है बल्कि इसके परिणाम केंद्र सरकार की सत्ता पर भी असर डाल सकते हैं।

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फगड़ा–घुड़ला भौलावणी गणगौर: लोक आस्था, परंपरा और उत्सव का अनुपम संगम

जोधपुर। मरुधरा की सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत और आकर्षक अध्याय—फगड़ा-घुड़ला भौलावणी गणगौर—आज शाम 6:30 बजे से पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा उदाहरण है, जो शहर की गलियों को रंग, संगीत और भक्ति के माहौल से भर देता है। इस अवसर पर निकलने वाली गणगौर की सवारियों का भव्य जुलूस ओलम्पिक सिनेमा से प्रारंभ होकर गांधी स्कूल, जालोरी गेट, बालवाड़ी स्कूल, खाण्डाफलसा, आड़ा बाजार और सिरे बाजार होते हुए ऐतिहासिक घण्टाघर व नई सड़क तक पहुंचेगा, जहां मध्य रात्रि के आसपास इसका समापन होगा। जुलूस में सजी-धजी झांकियां, पारंपरिक वेशभूषा में कलाकार, लोक वाद्य यंत्रों की धुन और सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन को विशेष बना देंगे। गणगौर और घुड़ला: इतिहास और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि राजस्थान में गणगौर पर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व मुख्य रूप से माता गौरी (पार्वती) और भगवान शिव की पूजा को समर्पित होता है। अविवाहित युवतियां मनचाहा वर पाने के लिए और विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। घुड़ला परंपरा का इतिहास घुड़ला की परंपरा का संबंध एक ऐतिहासिक कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि मध्यकाल में एक मुस्लिम शासक या सेनापति घुड़ला खान ने गांव की महिलाओं पर अत्याचार किया था। इसके विरोध में ग्रामीणों ने उसका वध कर दिया। उसकी स्मृति में एक छेद वाला मिट्टी का घड़ा (घुड़ला) बनाकर उसमें दीप जलाकर घुमाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस परंपरा के माध्यम से समाज में यह संदेश दिया जाता है कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए। फगड़ा: रंग, संगीत और उल्लास का प्रतीक फगड़ा, होली के बाद मनाया जाने वाला एक लोक उत्सव है, जिसमें महिलाएं और पुरुष पारंपरिक गीत गाते हुए, नृत्य करते हुए जुलूस का हिस्सा बनते हैं। इसमें लोकगीतों के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। फगड़ा-घुड़ला का यह संगम राजस्थान की लोक संस्कृति का अद्भुत उदाहरण है, जहां धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता का सुंदर मेल देखने को मिलता है। जुलूस का मार्ग और विशेष आकर्षण आज शाम निकलने वाला जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरेगा। प्रमुख मार्ग इस प्रकार हैं: ओलम्पिक सिनेमा से शुरुआत गांधी स्कूल जालोरी गेट बालवाड़ी स्कूल खाण्डाफलसा आड़ा बाजार सिरे बाजार घण्टाघर नई सड़क (समापन स्थल) जुलूस में ट्रैक्टर-ट्रॉली, ठेले, तांगे और अन्य वाहनों पर विभिन्न प्रकार की झांकियां सजाई जाएंगी। इन झांकियों में पौराणिक कथाएं, सामाजिक संदेश और स्थानीय लोक जीवन की झलक देखने को मिलेगी। यातायात व्यवस्था: शहर में रहेगा विशेष प्रबंधन जुलूस के दौरान शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए हैं: 1. पूर्ण प्रतिबंधित मार्ग ओलम्पिक तिराहा से जालोरी गेट के बीच सभी प्रकार के वाहनों का आवागमन पूरी तरह बंद रहेगा। 2. डायवर्जन व्यवस्था जुलूस का अगला सिरा जालोरी गेट पहुंचने पर शनिश्चरजी का थान और पांचवीं रोड की ओर से आने वाले यातायात को सरदारपुरा की ओर मोड़ा जाएगा। नई सड़क से जालोरी गेट की ओर जाने वाले वाहनों को पुरी तिराहा, रेलवे स्टेशन, ओलम्पिक तिराहा, तारघर मोड़, मेहता भवन और जलजोग होते हुए 12वीं रोड की ओर डायवर्ट किया जाएगा। विशेष छूट: मरीजों के अस्पताल आने-जाने पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। 3. प्रमुख बाजारों में प्रतिबंध जालोरी गेट से आड़ा बाजार, सिरे बाजार, घण्टाघर और नई सड़क तक सभी प्रकार के वाहनों का प्रवेश बंद रहेगा। 4. आंशिक सामान्य यातायातजुलूस का पिछला हिस्सा जालोरी गेट पार करने के बाद शनिश्चरजी का थान से नई सड़क चौराहा और विपरीत दिशा में यातायात सामान्य रूप से चालू रहेगा। 5. घण्टाघर क्षेत्र में प्रतिबंध जुलूस के घण्टाघर पहुंचने पर जवाहर खाना मोड़, पन्ना निवास और द्वितीय पोल पुलिस चौकी से घण्टाघर तक वाहनों का आवागमन पूरी तरह बंद रहेगा। प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था इस आयोजन को देखते हुए पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। शहर के प्रमुख चौराहों और जुलूस मार्ग पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था से तुरंत निपटा जा सके। लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण फगड़ा-घुड़ला भौलावणी गणगौर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह आयोजन पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है, जिसमें हर वर्ग और हर आयु के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह संदेश देता है कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजकर रखना कितना महत्वपूर्ण है।

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सुस्त गलियारों में गूंजता सिंहनाद, सिरोही की राजनीति का परिदृश्य

सिरोही की राजनीति इन दिनों किसी पुराने रेडियो की तरह हो गई है कभी-कभार खडख़ड़ाती है, कुछ क्षणों के लिए आवाज साफ आती है, फिर अचानक खामोशी छा जाती है। ऐसा लगता है मानो राजनीति ने खुद ही ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया हो, लेकिन यह मौन भी बड़ा बोलता हुआ मौन है। गलियारों में चहल-पहल है, बयानबाजी की हल्की-फुल्की आहटें हैं, पर वह धार, वह ताप, वह जीवंतता कहीं गायब सी दिखती है, जिसके लिए सिरोही जिला प्रदेश भर में अपनी अलग पहचान रखता आया है। यह वही सिरोही है, जहां राजनीति कभी सिर्फ कुर्सी का खेल नहीं रही, बल्कि जनभावनाओं का उफान रही है। यहां चुनाव सिर्फ वोटों का जोड़-घटाव नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों, जातीय संतुलनों और व्यक्तिगत करिश्मे का अनूठा संगम होता रहा है। यहां के नेता सिर्फ नेता नहीं, बल्कि अपने-अपने समर्थकों के लिए ‘आवाज’ होते थे। लेकिन आज वही आवाजें जैसे किसी ‘वीआईपी मूवमेंट’ की गाडिय़ों के सायरन में दबती जा रही हैं। इन दिनों सिरोही की राजनीति में जो सबसे ज्यादा दिखता है, वह है—‘सुस्ती’। यह सुस्ती आलस्य वाली नहीं, बल्कि एक तरह की रणनीतिक चुप्पी है। सत्तारूढ़ पक्ष के नेता व्यस्त हैं लेकिन जनता के बीच नहीं, बल्कि कार्यक्रमों, उदघाटनों और वीआईपी दौरों में। उनके लिए राजनीति अब जनता के बीच पसीना बहाने का काम नहीं, बल्कि एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर योजनाओं की ‘फाइलिंग’ करने का माध्यम बनती जा रही है। दूसरी ओर प्रतिपक्ष है, जो अपने विरोध को भी बुनाई की तरह धीरे-धीरे गढ़ रहा है। वह जोरदार प्रहार नहीं करता, बल्कि ‘सुई-धागे’ से विरोध के पैटर्न तैयार करता है। कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस, कभी सोशल मीडिया पोस्ट, तो कभी छोटे-छोटे धरनों के जरिए वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन यह विरोध भी उतना ही ‘संयमित’ है, जितनी सत्तापक्ष की सक्रियता ‘संयमित’ है। बाण तरकश में ही क्यों हैं? राजनीति में बाण चलाने का समय और तरीका दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन सिरोही में इन दिनों बाण तरकश में ही आराम फरमा रहे हैं। नेता तैयार हैं, मुद्दे भी हैं, मंच भी हैं, लेकिन तीर चलाने का साहस या कहें इच्छा, दोनों ही कम दिखाई देते हैं। यह स्थिति वैसी ही है जैसे कोई योद्धा युद्धभूमि में खड़ा हो, लेकिन तलवार म्यान से बाहर निकालने से पहले ही सोचने लगे कि क्या जरूरत है? राजनीति में यह ‘क्या जरूरत है’ वाला भाव सबसे खतरनाक होता है, क्योंकि यहीं से जनहित पीछे छूट जाता है और व्यक्तिगत सुविधा आगे आ जाती है। कुछ समय पहले तक सिरोही की राजनीति में जमीनों के कथित खुर्द-बुर्द का मामला गरम था। आरोप-प्रत्यारोप के तीर चल रहे थे, बयानबाजी चरम पर थी और ऐसा लग रहा था कि यह मुद्दा राजनीतिक भूचाल ला देगा। लेकिन अचानक यह मामला भी ‘ठंडा’ पड़ गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या समस्या हल हो गई, या फिर समस्या को ही ‘ठंडे बस्ते’ में डाल दिया गया? हमारे यहां समस्याएं खत्म नहीं होतीं, बल्कि उन्हें ‘मैनेज’ कर लिया जाता है। राजनीति में समाधान से ज्यादा ‘संतुलन’ जरूरी हो गया है और यह संतुलन अक्सर सच्चाई के खिलाफ खड़ा नजर आता है। वीआइपी मूवमेंट, जनता से दूरी का नया बहाना सत्ताधारी नेताओं के लिए इन दिनों ‘वीआइपी मूवमेंट’ एक नया कवच बन गया है। जहां जाना है, वहां प्रोटोकॉल है, सुरक्षा है, स्वागत है, मालाएं हैं, फोटो सेशन है। सब कुछ है, बस जनता के असली सवालों के जवाब नहीं हैं। जनता भी अब समझने लगी है कि वीआइपी मूवमेंट का मतलब है नेता आएंगे, हाथ हिलाएंगे, मुस्कुराएंगे और चले जाएंगे। उनके जाने के बाद रह जाती है धूल, कुछ बैनर और सोशल मीडिया पर अपलोड होने वाली तस्वीरें। यह स्थिति किसी फिल्म के उस सीन जैसी है, जहां हीरो आता है, स्टाइल में एंट्री करता है, डायलॉग बोलता है और बिना किसी समस्या का समाधान किए आगे बढ़ जाता है। प्रतिपक्ष की बुनाई, धीमी लेकिन योजनाबद्ध प्रतिपक्ष इन दिनों खुलकर आक्रमण नहीं कर रहा, लेकिन वह चुप भी नहीं है। वह अपने विरोध को ‘बुन’ रहा है। जैसे कोई कारीगर धैर्यपूर्वक कपड़ा तैयार करता है, वैसे ही प्रतिपक्ष मुद्दों को जोड़ रहा है। उसकी रणनीति स्पष्ट है अभी शोर नहीं, बल्कि समय आने पर ‘धमाका’। लेकिन राजनीति में ज्यादा देर तक चुप रहना भी खतरनाक होता है, क्योंकि जनता को लगता है कि दोनों पक्षों में कोई खास फर्क नहीं है। सिंहनाद बनाम शंखनाद सिरोही की राजनीति में एक नाम ऐसा है, जिसकी आवाज अक्सर ‘सिंहनाद’ के रूप में गूंजती रही है। जहां बाकी नेता शंख बजाकर औपचारिक शुरुआत करते हैं, वहां यह आवाज सीधे दहाड़ के रूप में सामने आती है। लेकिन इन दिनों यह सिंहनाद भी कुछ सीमित सा लग रहा है। मुद्दे हैं, मौके हैं, लेकिन आवाज उतनी व्यापक नहीं हो पा रही, जितनी पहले हुआ करती थी। शायद यह समय का प्रभाव है, या फिर राजनीति की बदलती प्रकृति का परिणाम। अब राजनीति में दहाड़ से ज्यादा ‘डिजिटल पोस्ट’ का महत्व बढ़ गया है। जो जितना ज्यादा ट्रेंड करता है, वही उतना बड़ा नेता माना जाता है। आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर सिरोही में इन दिनों स्थानीय मुद्दों से ज्यादा प्रदेश और देश की राजनीति पर बहस हो रही है। नेता अपने-अपने दलों की लाइन को आगे बढ़ा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है, लेकिन यह बहस अक्सर ‘टीवी डिबेट’ जैसी लगती है। जहां शोर ज्यादा होता है, समाधान कम। यह स्थिति भी बड़ी दिलचस्प है। स्थानीय समस्याएं जैसे सडक़, पानी, बिजली, रोजगार—इन पर चर्चा कम होती है, जबकि राष्ट्रीय मुद्दों पर बयानबाजी ज्यादा। जैसे किसी घर में छत टपक रही हो, लेकिन लोग पड़ोसी के घर की दीवार पर चर्चा कर रहे हो। जिंदा राजनीति की पहचान कहां गई? सिरोही को हमेशा ‘जिंदा राजनीति’ का जिला कहा जाता रहा है। यहां जनता जागरूक रही है, नेताओं को जवाब देना पड़ता रहा है और हर मुद्दे पर बहस होती रही है। लेकिन आज वही जीवंतता कहीं खोती हुई नजर आती है। यह नहीं कि राजनीति खत्म हो गई है। बल्कि राजनीति का स्वरूप बदल गया है। अब यह जमीन से ज्यादा ‘इमेज’ पर आधारित हो गई है। काम से ज्यादा ‘प्रेजेंटेशन’ महत्वपूर्ण हो गया है।

TVK chief Vijay accuses Chennai police, officials of denying permission for his Perambur campaign
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टीवीके प्रमुख विजय ने चेन्नई पुलिस और अधिकारियों पर पेरम्बूर अभियान की अनुमति न देने का आरोप लगाया

चेन्नई, तमिलनाडु | 27 अप्रैल 2024 टीवीके के प्रमुख विजय ने हाल ही में चेन्नई पुलिस और संबंधित अधिकारियों पर आरोप लगाया है कि वे उनके पेरम्बूर में चुनावी अभियान की अनुमति देने में लगातार बाधाएं उत्पन्न कर रहे हैं। विजय ने कहा कि डीएमके सरकार चुनावी अभियानों की अनुमति देने के मामले में बार-बार देरी करती है या उसे विभिन्न कारणों से अस्वीकार कर देती है। उन्होंने एक बयान में कहा, “जब भी मैं किसी चुनावी अभियान की योजना बनाता हूं, डीएमके सरकार विभिन्न बहानों के तहत अनुमति देने में विलंब या outright मना कर देती है। इससे हमारे कार्यकर्ताओं और समर्थकों को काफी परेशानी होती है और चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होती है।” विजय ने यह भी कहा कि यह व्यवहार चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने अधिकारियों से आग्रह किया कि वे बिना किसी पक्षपात के और निष्पक्ष रूप से सभी राजनीतिक दलों को उनके अभियान के लिए आवश्यक अनुमति प्रदान करें। चेन्नई पुलिस ने अभी तक इस आरोप पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं, डीएमके सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सभी अनुमति प्रक्रियाएं नियमों और प्रोटोकॉल के अनुसार होती हैं और सभी पार्टियों को समान अवसर मिलते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई पक्ष महसूस करता है कि उसे अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है, तो वे संबंधित विभागों से शिकायत कर सकते हैं। पेरम्बूर क्षेत्र में आगामी चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं, और यह आरोप-प्रत्यारोप राजनीतिक तापमान और भी बढ़ा सकते हैं। चुनाव आयोग ने इस मामले में सभी संबंधित पक्षों से संयम बरतने और नियमों का पालन करने को कहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव के दौरान स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार के आरोप मतदाता और राजनीतिक दलों के बीच विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए उनकी त्वरित और न्यायसंगत जांच आवश्यक है। इस मामले की आगे की जांच जारी है और संबंधित पक्षों की ओर से भी बयान आना बाकी है।

A ‘ballerina’ from Eurosiberia finds a new stage in India
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यूरोसिबेरिया की एक बैलेरिना ने भारत में पाया नया मंच

चेन्नई, तमिलनाडु | 28 फरवरी 2026 भारत में सर्दियों के मौसम में आमतौर पर डेमोइसल क्रेन (Demoiselle Crane) के दर्शन गुजरात और राजस्थान में होते हैं, लेकिन इस वर्ष 28 फरवरी को चेन्नई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र से पहली बार डेमोइसल क्रेन के दर्शन की सूचना मिली है। यह रिकॉर्ड तमिलनाडु में अब तक सिर्फ फिरुनलवेली के विजय नारायणम टैंक से ही मिलता था। नमन बोरा और अमोघ चैट्टी ने नम्मेली सॉल्ट पैंस के पास डेमोइसल क्रेन को बलूत के बीच भोजन करते हुए पाया। नमन बोरा अगले तीन दिनों तक हर दिन उसी स्थान पर वापस जाकर इस पक्षी को उसी जगह पर भोजन करते हुए देखते रहे, जिससे पता चलता है कि यह पक्षी इस स्थान से मजबूती से जुड़ा हुआ है। डेमोइसल क्रेन की इस नई उपस्थिति से पक्षी प्रेमियों और पक्षी वैज्ञानिकों में उत्साह की लहर दौड़ गई है। यह प्रजाति अपने लंबी दूरी के प्रवास के लिए प्रसिद्ध है, और ऐसे दुर्लभ दृश्य भारत के जैव विविधता के महत्व को रेखांकित करते हैं। तामिलनाडु में इस पक्षी का यह संभावित स्थायी प्रवास स्थल बनना पर्यावरणीय दृष्टि से भी खास माना जा रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र मैंग्रोव लैगून और नमक के खेतों से घिरा हुआ है, जो पक्षियों के लिए आदर्श आवास प्रदान करता है। पक्षी संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएं स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायक होंगी और पक्षी संरक्षण के लिए सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका और प्रबल करेगी। वे यह भी सुझाव दे रहे हैं कि इस क्षेत्र में और अधिक व्यापक अध्ययन और संरक्षण प्रयास आवश्यक हैं ताकि डेमोइसल क्रेन समेत अन्य प्रवासी पक्षियों की संख्या और सुरक्षित रखी जा सके। यह घटना इस बात का संकेत भी है कि बदलते पर्यावरणीय और जलवायु कारकों के कारण पक्षी अपनी प्रवास पथों और अवास स्थानों में बदलाव कर रहे हैं। चेन्नई के इस नए स्थान पर डेमोइसल क्रेन की उपस्थिति, जन-सामान्य के लिए प्रकृति के नज़दीक आने का एक अनोखा अवसर प्रस्तुत करती है और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता पर बल देती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय समुदाय, पर्यावरणविद् और प्रशासन मिलकर इन प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित करने की दिशा में सक्रिय कदम उठा सकते हैं। यह न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगा, बल्कि पर्यटन और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों के लिए भी फायदेमंद होगा। डेमोइसल क्रेन की इस दुर्लभ और महत्वपूर्ण उपस्थिति के प्रमाण ने पक्षी प्रेमियों में उत्सुकता बढ़ा दी है और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में चेन्नई में अधिक पक्षी प्रजातियों के आने की खबरें सुनने को मिलेंगी।

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