सिरोही। इन दिनों हरियाली का मौसम है। सरकारी फाइलों में पौधरोपण का महोत्सव चल रहा है। मंचों से पर्यावरण बचाने की शपथ दिलाई जा रही है। अधिकारी हाथों में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने पौधे रोप रहे हैं। बच्चे सीड्स बॉल फेंक रहे हैं, मानो धरती कल ही जंगल बन जाएगी। लेकिन इसी शहर की सडक़ों पर एक और अभियान भी चुपचाप चल रहा है जहां बरसों से खड़े पेड़ों को शिकायतों की कुल्हाड़ी से नापा जा रहा है। गोयली चौराहे की ओर जाने वाले मार्ग पर वर्षों से खड़े छायादार वृक्ष आखिर प्रशासनिक निर्णय की भेंट चढ़ गए। वजह विकास बताई गई, लेकिन दृश्य कुछ और कहानी कहता है। पेड़ न सडक़ के बीच थे, न किसी वाहन की आवाजाही में बाधा। असली बाधा तो सडक़ पर बेतरतीब खड़े वाहन थे, जिन पर किसी की निगाह नहीं गई। लगता है, वाहनों से ज्यादा अपराध उन पेड़ों का था, जो बिना किसी अनुमति के राहगीरों को छाया दे रहे थे। आजकल विकास का नया गणित यही है जो बोल नहीं सकता, वही सबसे आसान निशाना है। पेड़ न धरना देते हैं, न ज्ञापन सौंपते हैं और न ही अदालत की शरण लेते हैं। इसलिए उनकी किस्मत का फैसला एक शिकायत और एक आदेश से हो जाता है। शिकायत चाहे व्यक्तिगत हो, द्वेषपूर्ण हो या स्वार्थ से प्रेरित यदि फाइल तक पहुंच जाए तो पेड़ की उम्र उतनी ही बचती है, जितनी कुल्हाड़ी आने में देर लगती है। विडंबना देखिए, एक तरफ करोड़ों रुपए पौधरोपण पर खर्च किए जा रहे हैं। अखबारों में विज्ञापन छप रहे हैं कि एक पेड़ सौ पुत्रों के समान है। दूसरी तरफ सौ पुत्रों के बराबर बताए गए उसी पेड़ को कुछ मिनटों में काट दिया जाता है। शायद सरकारी गणित में पौधा लगाने से अंक मिलते हैं और पेड़ काटने से कोई अंक नहीं कटते।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे रोचक पात्र है विकास। हर निर्णय का यही स्थायी बहाना है। सडक़ चौड़ी करनी हो तो विकास, पेड़ काटने हों तो विकास, गरीबों को हटाना हो तो विकास, और यदि कहीं सवाल उठ जाए तो जवाब भी विकास। ऐसा लगता है कि विकास कोई परियोजना नहीं, बल्कि ऐसा सर्वशक्तिमान शब्द है जिसके सामने तर्क, संवेदना और पर्यावरण तीनों स्वत: नतमस्तक हो जाते हैं।
गोयली चौराहे से अनादरा मार्ग पर पैवेलियन के बाहर कुछ गरीब परिवार वर्षों से अस्थाई तौर पर झोपड़ीनुमा आशियाने बनाकर अपनी रोजी-रोटी चला रहे थे। वे किसी आलीशान इमारत के मालिक नहीं थे। उनकी दुकानें एसी और शीशे से नहीं सजी थीं। उनका अपराध केवल इतना था कि वे अपने परिवार का पेट भरने के लिए सडक़ किनारे मेहनत कर रहे थे। प्रशासन आया, योजना का हवाला दिया, झोपडिय़ाँ हटाईं और उसी स्थान पर पौधे लगा दिए। दृश्य बड़ा भावुक था। गरीब हट गए, पौधे आ गए। तस्वीरें भी अच्छी आई होंगी। लेकिन सवाल यह है कि जब यही पौधे कुछ वर्षों बाद बड़े होकर पेड़ बनेंगे, तब क्या होगा? क्या तब कोई नई योजना आएगी? क्या तब फिर कहा जाएगा कि ये विकास में बाधा बन रहे हैं? यदि इतिहास को देखें तो संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हमारे यहां पौधरोपण अक्सर पर्यावरण से ज्यादा आयोजन बनकर रह गया है। गड्ढा खोदो, पौधा लगाओ, फोटो खिंचवाओ और अगले अभियान तक भूल जाओ। पौधे बचें या सूख जाए, इसकी चिंता कम होती है। लेकिन यदि कोई पेड़ दशकों तक जीवित रहकर लोगों को छाया, ऑक्सीजन और पक्षियों को आश्रय देता रहे, तब अचानक किसी शिकायत की फाइल में उसका भविष्य तय हो जाता है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि प्रशासन आखिर शिकायतों की जांच करता है या शिकायतकर्ता की भावना का सम्मान? यदि कोई कह दे कि पेड़ से परेशानी है, तो क्या यह भी देखा जाता है कि वास्तव में परेशानी किससे है पेड़ से या अवैध पार्किंग से? सडक़ रोकने वाले वाहन दिखाई नहीं देते, लेकिन सडक़ के किनारे खड़ा वृक्ष जरूर विकास का दुश्मन घोषित कर दिया जाता है। पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों और पौधरोपण अभियानों से नहीं होगा। इसके लिए पहले उन पेड़ों की रक्षा करनी होगी जो वर्षों की मेहनत से खड़े हुए हैं। एक परिपक्व वृक्ष का महत्व सौ नए पौधों से भी अधिक होता है। उसे काटना आसान है, लेकिन उसकी छाया लौटाने में दशकों लग जाते हैं।
आज जरूरत विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करने की नहीं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाने की है। विकास वह नहीं जो हरियाली निगल जाए, बल्कि वह है जो सडक़ भी बनाए और पेड़ भी बचाए। गरीब की रोजी भी सुरक्षित रखे और शहर का सौंदर्य भी बढ़ाए। यदि हर शिकायत का समाधान कुल्हाड़ी होगी, तो एक दिन शिकायतें तो बच जाएंगी, मगर पेड़ नहीं।
सिरोही की इस घटना ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या हम सचमुच हरियाली बढ़ाना चाहते हैं, या केवल हरियाली के नाम पर अभियान चलाना? क्या विकास का अर्थ संवेदनहीनता है, या विवेकपूर्ण निर्णय? हो सकता है आने वाले दिनों में फिर हजारों पौधे लगाए जाएं। कैमरे चमकें, भाषण हों, तालियां गंूजे और हरियाली का संकल्प दोहराया जाए। लेकिन जब तक वर्षों पुराने पेड़ों को शिकायतों की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा, तब तक हर पौधरोपण अभियान के पीछे एक मौन प्रश्न खड़ा रहेगा।












