602 वें स्थापना दिवस पर सूना रहा सिरोही, प्रशासन की बेरुखी से आहत हुए शहरवासी
इतिहास का सम्मान होना चाहिए था, वहां पसरी रही खामोशी सिरोही। सिरोही के 602वें स्थापना दिवस जैसे गौरवशाली, पावन और ऐतिहासिक अवसर पर इस बार प्रशासनिक स्तर पर कोई विशेष आयोजन नहीं होना शहरवासियों के लिए गहरी निराशा का कारण बना। जिस दिन पूरे नगर को अपनी समृद्ध विरासत, संस्कृति और इतिहास का उत्सव मनाते हुए एकजुट होना चाहिए था, उसी दिन जिम्मेदार तंत्र की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए। स्थापना दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि शहर की पहचान, उसके गौरवशाली अतीत और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक होता है। ऐसे महत्वपूर्ण अवसर पर प्रशासन की निष्क्रियता ने यह संदेश दिया कि शायद अब परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है। शहर के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, हर वर्ग में इस बात को लेकर नाराजगी और मायूसी साफ तौर पर देखी गई। चौधरी लाइन के नागरिकों ने निभाई परंपरा जब प्रशासनिक तंत्र मौन रहा, तब सिरोही की जागरूक जनता ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। चौधरी लाइन क्षेत्र के परिवारों, व्यापारियों एवं आसपास के नागरिकों ने इस ऐतिहासिक दिन को यूं ही गुजरने नहीं दिया। शाम को शीशाजी मंदिर प्रांगण में एकत्रित होकर उन्होंने आरती का आयोजन किया और शहर की सुख-समृद्धि, शांति और उज्ज्वल भविष्य की कामना की। यह आयोजन इस बात का सशक्त उदाहरण बना कि सिरोही की जनता आज भी अपने संस्कारों, परंपराओं और इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है। लोगों ने कहा कि चाहे प्रशासन साथ दे या न दे, लेकिन शहर की अस्मिता और परंपरा को जीवित रखना हर नागरिक का कर्तव्य है। यही कारण है कि सीमित संसाधनों के बावजूद नागरिकों ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस आयोजन को सफल बनाया। दो वर्ष पहले था उत्साह, अब उदासीनता? स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दो वर्ष पूर्व जब संयम विधायक थे, तब सिरोही स्थापना दिवस बड़े उत्साह, उल्लास और गरिमा के साथ मनाया जाता था। उस समय प्रशासन और जनप्रतिनिधि दोनों मिलकर इस दिन को यादगार बनाते थे। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामाजिक आयोजन और शहर की विरासत को प्रदर्शित करने वाली गतिविधियां आयोजित की जाती थीं, जिससे लोगों में गर्व और उत्साह का माहौल बनता था। लेकिन पिछले दो वर्षों से स्थिति पूरी तरह बदलती नजर आ रही है। अब यह गौरवमयी दिवस उपेक्षा का शिकार होता दिख रहा है। न तो प्रशासन की ओर से कोई पहल दिखाई देती है और न ही जनप्रतिनिधियों की सक्रियता नजर आती है। इस बदलाव ने शहरवासियों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर उनकी भावनाओं और शहर की परंपराओं के प्रति जिम्मेदार लोगों की संवेदनाएं कहां खो गई हैं? आस्था और इतिहास का केंद्र शीशाजी मंदिर सिरोही नगर की स्थापना के इतिहास में शीशाजी मंदिर का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जब सिरोही नगर की स्थापना का संकल्प लिया गया था, तब सर्वप्रथम इसी पवित्र मंदिर की स्थापना की गई थी। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सिरोही की आस्था, संस्कृति, समृद्ध परंपरा और गौरवशाली इतिहास का मूल आधार एवं प्रेरणास्रोत है। स्थापना दिवस जैसे अवसर पर इस मंदिर में आयोजन होना न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह शहर की जड़ों से जुडऩे और अपनी पहचान को सहेजने का भी माध्यम है। शाम 7.30 बजे हुई आरती, गूंजे श्रद्धा के स्वर स्थापना दिवस के अवसर पर शाम साढे सात बजे श्री शीशाजी मंदिर, चौधरी लाइन, सदर बाजार में भव्य आरती का आयोजन किया गया। आरती के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। दीपों की रोशनी, मंत्रोच्चार और श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस आयोजन को अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायक बना दिया। शहरवासियों ने एक स्वर में सिरोही की सुख-शांति, समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना की। यह दृश्य इस बात का प्रतीक था कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, लेकिन सिरोही की जनता अपने शहर के प्रति प्रेम और समर्पण में कभी कमी नहीं आने देगी। इनकी रही मौजूदगी इस आयोजन में क्षेत्र के कई गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही। वरिष्ठजनों में किशोर चौधरी, जयंतीलाल , व्यापारी वर्ग से राजू भाई, नितेश उर्फ लाला , जय, विक्रम हरण, निरंजन भाई सहित क्षेत्र की महिलाएं एवं अनेक नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर न केवल आरती में भाग लिया, बल्कि शहर के विकास और समृद्धि के लिए सामूहिक संकल्प भी लिया।



















