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March 2026

In Focus Podcast | Should men get paternity leave in India?
विशेषज्ञों की राय

फोकस पॉडकास्ट | क्या भारत में पुरुषों को पितृ अवकाश मिलना चाहिए?

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पितृ अवकाश को लेकर नई दिशानिर्देशों की मांग की है। यह विषय सामाजिक और पारिवारिक बदलाव के संदर्भ में विशेष अहमियत रखता है, जिसके तहत पुरुषों को भी मातृत्व अवकाश की तरह पितृत्व अवकाश प्रदान किया जाना चाहिए। पितृत्व अवकाश पर इस बहस को लेकर प्रसिध्द पोडकास्ट होस्ट, प्रिसिला जेबराज ने विशेषज्ञ प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे और संजय घोष के साथ इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा की। प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे ने कहा कि भारत में पारंपरिक सोच में पुरुषों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र तक सीमित मानी जाती है, जबकि परिवार में उनकी भूमिका को कम माना जाता है। पितृत्व अवकाश से न केवल पिता और बच्चे के बीच मजबूत बंधन बनेगा, बल्कि महिलाओं के कार्यस्थल पर बने रहने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। उन्होंने यह भी बताया कि सामाजिक संरचना में बदलाव के लिए कानूनी संरक्षण आवश्यक है, जो पितृत्व अवकाश को मान्यता और लागू करवाएगा। वहीं, संजय घोष ने इस पहल को स्वागत योग्य बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में जब भारतीय परिवार तेजी से बदल रहे हैं, तब पितृत्व अवकाश एक ऐसा कदम है जो परिवारों में संतुलन लाने में मदद करेगा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यस्थल प्रशासन एवं नीतियां भी इस बदलाव के अनुकूल होनी चाहिए, जिससे पिता अपनी जिम्मेदारियां आराम से निभा सकें। यह विवादास्पद विषय सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ कानून एवं कार्य संस्कृति में सुधार की मांग करता है। भारत ने मातृत्व अवकाश के क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन पितृत्व अवकाश की कमी ने पुरुषों की पारिवारिक भागीदारी को सीमित रखा है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि वह न केवल पितृत्व अवकाश के लिए मान्यता सुनिश्चित करेगा, बल्कि इससे कार्यस्थल की लिंग समानता को भी बल मिलेगा। हालांकि, पितृत्व अवकाश को लेकर कई दफे बहस हुई है, पर अब इसे कानूनी रूप देने का प्रयास तेज हुआ है। यह बदलाव भारतीय समाज में पिता की भूमिका को नए अर्थ देने का प्रयास है, जो आने वाले समय में कार्य-संतुलन और परिवार की खुशहाली के लिए अहम साबित होगा। समाज विशेषज्ञ और मानवाधिकार समूह भी सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का समर्थन कर रहे हैं और उम्मीद जताते हैं कि जल्द ही पितृत्व अवकाश भारत में औपचारिक तौर पर लागू हो। इससे कार्य क्षेत्र में समानता, पारिवारिक जिम्मेदारियों का पुनर्मूल्यांकन और बच्चों के लिए बेहतर पालन-पोषण के अवसर सुनिश्चित होंगे। इस चर्चा में यह भी सामने आया कि पितृत्व अवकाश न केवल एक कानूनी अधिकार होना चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक स्वीकृति भी मिलनी चाहिए ताकि पारंपरिक सोच में बदलाव आए और परिवार के सभी सदस्य अपनी योग्य भूमिका निभा सकें।

The Indian scientist couple history forgot — and the new study bringing their ‘Jeewanu’ back to life
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भारतीय वैज्ञानिक दंपति जिसे इतिहास ने भुला दिया — और नई अध्ययन जो उनके ‘जीवाणु’ को वापस जीवन दे रहा है

जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में एक पुरानी प्रयोगशाला खोज फिर से चर्चा में आ गई है। हाल ही में हुए अनुसंधान से भारतीय वैज्ञानिक जोड़े कृष्ण बहादुर और एस. रंगनायकी की प्रयोगशाला में किए गए ‘जीवाणु’ प्रयोग को नए सिरे से मान्यता मिली है। यह प्रयोग जीवन की उत्पत्ति की खोज में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है, जिसे कई दशकों तक अनदेखा कर दिया गया। कृष्ण बहादुर और एस. रंगनायकी ने 20वीं सदी के मध्य में ‘जीवाणु’ नामक एक प्रयोग किया था, जिसमें उन्होंने जीवन के मूलभूत अणुओं के सामाजिक संयोजन को समझने का प्रयास किया था। यह प्रयोग बाद में वैज्ञानिक समुदाय में कम चर्चित रहने लगा, लेकिन अब हाल के शोध ने इसे पुनर्जीवित कर इसकी वैज्ञानिक महत्ता को स्थापित किया है। नई जांच में वैज्ञानिकों ने ट्राइप्टिक डाइजेस्ट और अन्य रासायनिक माध्यमों के उपयोग से यह सिद्ध किया है कि ‘जीवाणु’ झिल्लियों वाले अणु हो सकते हैं, जो जीवन के शुरुआती स्वरूपों के अध्ययन में मददगार हैं। इससे न सिर्फ जीवन की उत्पत्ति की गूढ़ता समझने में मदद मिली, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ कि भारतीय शोधकर्ताओं का यह योगदान विश्व विज्ञान में कितना मूल्यवान है। डॉ. रिया शुक्ला, जो इस नए अध्ययन की मुख्य शोधकर्ता हैं, कहती हैं, “हमारा उद्देश्य था कि हम उन वैज्ञानिकों के बारे में ध्यान आकर्षित करें जिन्हें योग्य सम्मान नहीं मिला। कृष्ण बहादुर और रंगनायकी का शोध प्राचीन जीवन के रहस्यों को उजागर करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।” पिछले कुछ वर्षों में भौतिक और जैव रसायन के प्रति विज्ञान के दृष्टिकोण में बदलाव आया है, जिससे इस तरह की पुरानी खोजों का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पुराने प्रयोगों को नई तकनीकों और उपकरणों के साथ दोबारा जांचना विज्ञान के लिए एक नया आयाम खोल सकता है। कृष्ण बहादुर और एस. रंगनायकी की वैज्ञानिक उपलब्धियां और उनके शोध को अब एक विशेष प्रकाश में रखा जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा देगा। इससे न केवल भारतीय विज्ञान के इतिहास को समृद्धि मिली है, बल्कि विश्व स्तर पर भी इस नई खोज की सराहना हो रही है।

Why does water stay cool in a claypot even in peak summers?
लाइफस्टाइल

गर्मियों में मिट्टी के घड़े में पानी ठंडा क्यों रहता है?

गर्मी के मौसम में लोगों को ठंडे पानी की तलाश हमेशा रहती है। परन्तु क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि मिट्टी के घड़े में रखा पानी दूसरों के मुकाबले ज्यादा ठंडा क्यों रहता है? इसका कारण उस मिट्टी की विशेष संरचना है जिससे ये घड़े बनाए जाते हैं। पारंपरिक मिट्टी के घड़े आमतौर पर प्राकृतिक मिट्टी से बनाए जाते हैं जिसमें सिलिका और एलुमिना जैसे सूक्ष्म खनिज कणों की मात्रा अधिक होती है। ये खनिज कण मिट्टी की छिद्रपूर्ण बनावट के साथ मिलकर, पानी के अंदर और बाहर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं। मिट्टी की यह छिद्रपूर्ण प्रकृति पानी के सतह पर संतुलित वाष्पीकरण करती है, जिससे घड़े के बाहर की सतह ठंडी हो जाती है। इस ठंडी सतह के कारण घड़े के अंदर रखा पानी भी ठंडा बना रहता है। इसके अलावा, मिट्टी घड़े की बनावट में ऐसे गुण होते हैं जो गर्मी के संचरण को धीमा करते हैं, जिससे घड़े की बाहरी गर्मी सीधे पानी तक नहीं पहुँच पाती। परिणामस्वरूप, गर्म दिनों में भी घड़े के अंदर पानी ठंडा और ताजा रहता है, जो इसे प्लास्टिक या धातु के बर्तनों से अलग बनाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्राकृतिक ठंडक प्रदान करने वाले घड़ों का उपयोग पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है क्योंकि इनमें बिजली या फ्रिज की आवश्यकता नहीं होती। इसके साथ ही क्ले पॉट्स जैविक और पर्यावरण अनुकूल सामग्री से बने होते हैं, जो उनके उपयोग को और भी सुरक्षित बनाते हैं। इस प्रकार, गर्मी के दौरान मिट्टी के घड़े में पानी ठंडा रहता है क्योंकि मिट्टी का प्राकृतिक खनिज मिश्रण और उसकी छिद्रपूर्ण बनावट पानी के तापमान को नियंत्रित करती है। यह अपनी सादगी और प्राकृतिक गुणों के कारण सदियों से भारतीय घरों में पसंद किया जाता रहा है।

Miami Open tennis final: Aryna Sabalenka beats Coco Gauff to complete ‘Sunshine Double’
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मियामी ओपन टेनिस फाइनल: अरिना साबालेन्का ने कोको गॉफ को हराकर ‘सनशाइन डबल’ पूरा किया

मियामी ओपन टेनिस प्रतियोगिता में फिर से अपनी बेहतरीन खेल प्रदर्शन का परिचय देते हुए, बेलारूसी टेनिस खिलाड़ी अरिना साबालेन्का ने कोको गॉफ को हराकर टाइटल अपने नाम किया। यह साबालेन्का के लिए मियामी ओपन का लगातार दूसरा खिताब है और साथ ही यह जीत उनके और गॉफ के बीच के हेड-टू-हेड रिकॉर्ड को 7-6 की बढ़त पर ले गई है। कोको गॉफ, जो मियामी की स्थानीय खिलाड़ी हैं, इस टूर्नामेंट को खासा महत्व देती हैं क्योंकि यह उनका गृह नगर टूर्नामेंट है। इसके बावजूद, साबालेन्का ने कड़ी मेहनत करते हुए फाइनल में श्रेष्ठ प्रदर्शन किया और प्रतियोगिता का खिताब जीतकर अपनी मजबूती को साबित किया। इस मुकाबले में दोनों खिलाड़ियों ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन साबालेन्का की निरंतर एकाग्रता और ताकत ने अंततः बाज़ी लगाई। इस जीत ने साबालेन्का के करियर में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जोड़ दी है, जिससे उनकी विश्व रैंकिंग और भी मजबूत हुई है। टेनिस विशेषज्ञों का मानना है कि साबालेन्का का यह प्रदर्शन उनके आत्मविश्वास को और बढ़ाएगा तथा आने वाले टूर्नामेंटों के लिए उन्हें प्रेरित रखेगा। साथ ही, गॉफ के लिए यह हार एक सीख है जो उन्हें और बेहतर बनने के लिए प्रेरित करेगी। इस तरह, मियामी ओपन 2024 ने टेनिस प्रेमियों को एक रोमांचक और यादगार मुकाबला देखने को दिया, जिसमें दो युवा और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों ने अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन किया।

Mann ki Baat: PM Modi urges citizens to jointly face challenges emerging due to West Asia war
राष्ट्रीय

मन्न की बात: पीएम मोदी ने पश्चिम एशिया युद्ध के कारण उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए नागरिकों से संयुक्त प्रयास की अपील की

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी हालिया ‘मन्न की बात’ कार्यक्रम में पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि हमारे पड़ोस में लगभग एक महीने से एक ‘भयंकर युद्ध’ जारी है, जिसने क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक शांति दोनों को खतरे में डाल दिया है। पीएम मोदी ने इस मामले में भारत के नागरिकों और देशवासियों से एकजुट होकर आने वाली चुनौतियों का सामना करने की अपील की। उन्होंने कहा, “हम सबको मिलकर इस संकट का सामना करना होगा क्योंकि इससे न केवल क्षेत्रीय देशों, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा प्रभावित हो रही है।” प्रधानमंत्री ने बताया कि भारत इस संकट को गहनता से समझ रहा है और वैश्विक समुदाय के सहयोग से शांति स्थापित करने के लिए प्रयासरत है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत ने प्रभावित देशों में फंसे अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए विशेष प्रयास शुरू कर दिए हैं। पीएम मोदी ने कहा कि इस ज्वलंत स्थिति के बीच भारत अपनी विदेश नीति में संयम और समझदारी बनाए रखेगा, साथ ही देश के विकास को बाधित नहीं होने देगा। उन्होंने नागरिकों को आश्वस्त किया कि सरकार हर संभव स्थिति को ध्यान में रखते हुए रणनीतियाँ तैयार कर रही है। वहीं, प्रधानमंत्री ने नागरिकों से आग्रह किया कि वे इस समय अफवाहों से बचें और आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर ही स्थिति को समझें। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने पर जोर देते हुए लोगों से शांति और संयम बनाए रखने की अपील की। इस पूरे संदर्भ में, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “यह समय है देशवासियों के एकजुट होने का, ताकि हम इन कठिन दौरों को मिलकर पार कर सकें और भारत को विश्व में एक सशक्त और शांतिप्रेमी राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर सकें।” माना जा रहा है कि इस वक्त के जटिल अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच भारत ने अपनी कूटनीति और रणनीतियों से वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका और भी मजबूत कर ली है। प्रधानमंत्री की यह अपील देश के हर नागरिक तक पहुंच रही है जो इस संकट से निपटने में सहयोगी है।

Chennai RWA shines in TN’s solar race
राज्य-शहर

चेन्नई आरडब्ल्यूए ने तमिलनाडु की सौर ऊर्जा प्रतियोगिता में दिखाई धाक

चेन्नई के पेरुम्बक्कम स्थित एक प्रमुख निवासी समुदाय, बोलिनेनी हिलसाइड, तमिलनाडु में सबसे बड़े सौर छत प्रतिष्ठान के लिए सम्मानित किया गया है। यह 1295 इकाइयों वाला गेटेड कम्युनिटी, जो ओल्ड महाबलीपुरम रोड के पास स्थित है, राज्य की सौर ऊर्जा पहल में एक मिसाल बन गया है। बोलिनेनी हिलसाइड को यह पुरस्कार रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस (आरडब्ल्यूए) की श्रेणी में मिला है, जो तमिलनाडु के सौर ऊर्जा विकास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। इसके छत पर लगाए गए सोलर पैनल न केवल पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाते हैं बल्कि ऊर्जा की बचत और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को भी प्रोत्साहित करते हैं। इस परियोजना की शुरुआत कुछ वर्ष पहले हुई थी, जब समुदाय ने मिलकर नवीनीकृत ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया। स्थानीय प्राधिकरणों और सौर ऊर्जा कंपनियों की सहभागिता से इसे सुगम बनाया गया। इस प्रतिष्ठान की क्षमता हजारों घरों को ऊर्जा प्रदान करने के बराबर है, जिससे न केवल बिजली बिलों में कमी आई है, बल्कि बिजली की मांग पर भी सकारात्मक असर पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की पहलें पूरे राज्य में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने में सहायक साबित होंगी। बिलकुल स्पष्ट है कि बोलिनेनी हिलसाइड का यह कदम अन्य आरडब्ल्यूए के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगा, जो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक बचत दोनों को प्राथमिकता देते हैं। समुदाय के सदस्यों ने इस उपलब्धि को साझा करने पर खुशी जताई और भविष्य में भी ऐसे पर्यावरणीय अनुकूल प्रोजेक्ट्स के लिए प्रयास जारी रखने का संकल्प लिया। तमिलनाडु सरकार ने भी इस पहल को सार्वजनिक रूप से सराहा है और कहा है कि राज्य में सौर ऊर्जा क्षेत्र का विकास निरंतर तेजी से हो रहा है। इस सफलता के साथ, बोलिनेनी हिलसाइड ने साबित कर दिया है कि सामूहिक प्रयासों से न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि व्यापक स्तर पर भी स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में प्रभावी परिवर्तन लाया जा सकता है। आने वाले समय में अन्य रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे, जिससे तमिलनाडु में सौर ऊर्जा की उपलब्धता और उपयोग बढ़ेगा।

As parties intensify efforts to woo voters, ‘power art’ takes centre stage in Chennai
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चुनाव को लुभाने के लिए राजनीतिक पार्टियों की बढ़ती कोशिशों के बीच चेन्नई में ‘पावर आर्ट’ की महत्वपूर्ण भूमिका

चुनाव की लगन में जहां राजनीतिक दल जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए नई-नई रणनीतियां अपना रहे हैं, वहीं चेन्नई के चिंतद्रिपेट के कारीगर अपनी पारंपरिक कला को एक नए रूप में उभार रहे हैं। यहाँ के कारीगर जो पारंपरिक लेस माला बनाते हैं, वे इसे चुनावी माहौल के अनुरूप नया स्वरूप देते नजर आ रहे हैं। रेशमी धागों और कड़ी मेहनत से बुनी गई लेस माला अब केवल सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि चुनावी महत्वाकांक्षा के साथ जुड़ी एक कला बन गई है। कारीगर इस कला के माध्यम से राजनीतिक संदेश और चुनावी प्रतीक भी माला में शामिल कर रहे हैं, ताकि यह जनता के बीच प्रभावशाली तरीके से पहुंच सके। स्थानीय कारीगर राघव ने बताया, “पारंपरिक रूप से ये माला शादियों, त्योहारों और धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल होती थी, लेकिन हाल के चुनावों में राजनीतिक दल इसे अपने प्रचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहे हैं। हम लोग अपनी कला में रंग और डिज़ाइन को इस तरह से बदल रहे हैं कि वह विभिन्न पार्टियों के चुनाव चिन्हों और नीतियों को दर्शाए।” राजनीतिक पार्टियों की ओर से इस कला को अपनाने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि जनता के बीच इस तरह की कलात्मक और सांस्कृतिक वस्तुएं आसानी से पहुंचती हैं और उनकी याददाश्त में बने रहती हैं। इसलिए प्रचार सामग्री के रूप में लेस माला का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। चेन्नई के चुनाव विश्लेषक डॉ. सुमित्रा ने कहा, “लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाता को लुभाने के लिए सिर्फ दौड़ और भाषण काफी नहीं होते। लोक-संस्कृति और लोक-कला का समावेश चुनावों को और प्रभावशाली बनाता है। लेस माला जैसी स्थानीय कला चुनाव प्रचार को एक सांस्कृतिक आयाम देती है, जिससे राजनीतिक पार्टियों का जनसमुह के बीच प्रभाव बढ़ता है।” यह बदलाव केवल कारीगरों के लिए रोजगार के नए अवसर ही नहीं प्रदान कर रहा है, बल्कि राजनीतिक संवाद में सांस्कृतिक तत्वों की उपस्थिति भी बढ़ा रहा है। इसके साथ ही, यह स्थानीय समुदाय मे अपनी कला के लिए गर्व की भावना भी जगाता है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, चिंतद्रिपेट के ये कारीगर अपनी कलात्मक क्षमता से सत्ता के खेल को सजाने में लगे हैं। यह एक अनूठा मिश्रण है लोकतंत्र का, कला का और राजनीति का, जो चेन्नई की सड़कों से लेकर मतदाताओं के दिलों तक पहुंच रहा है।

IPL 2026: Dhoni set to miss first two weeks of IPL due to calf strain
खेल जगत

आईपीएल 2026: धोनी पहले दो सप्ताह आईपीएल नहीं खेलने के लिए तैयार, बछड़े में खिंचाव का सामना

गुवाहाटी, असम | 30 मार्च 2026 आईपीएल 2026 का आगाज होते ही चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) का सामना राजस्थान रॉयल्स से गुवाहाटी में होगा। यह मुकाबला 30 मार्च को आयोजित किया जाएगा, जिसमें क्रिकेट प्रेमियों की नज़रें एक बार फिर से आईपीएल के इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट पर टिकी होंगी। चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी इस आईपीएल सीजन की शुरुआत से पहले ही एक बड़ी चोट के कारण परेशान हैं। धोनी के बछड़े में खिंचाव आया है, जिसकी वजह से वे टूर्नामेंट के पहले दो सप्ताह के मुकाबलों से बाहर रह सकते हैं। इससे न केवल टीम को बल्कि धोनी के प्रशंसकों को भी चिंता हो रही है, क्योंकि वह टीम के लिए एक अहम खिलाड़ी हैं। धोनी की अनुपस्थिति में CSK को अपनी रणनीतियों और खेल संयोजन में कई बदलाव करने पड़ सकते हैं। उनके चोटिल होने की खबर टीम प्रबंधन के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि धोनी की कप्तानी और विकेटकीपिंग के साथ-साथ बल्लेबाजी की भूमिका भी टीम के लिए काफी महत्वपूर्ण है। मार्च के अंत में शुरू हो रहे आईपीएल के इस सीजन में, CSK की पहली चुनौती राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ होगी। राजस्थान रॉयल्स की टीम भी इस वर्ष मजबूत दिख रही है और दोनों टीमों के बीच मुकाबला बेहद प्रतिस्पर्धात्मक रहने की उम्मीद है। चोट के कारण धोनी के खेल से बाहर रहने की संभावना को देखते हुए, CSK के अन्य खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ जाएगा कि वे टीम के लिए बेहतर प्रदर्शन करें। युवा खिलाड़ियों को मौके मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है। CSK के मुख्य कोच और टीम प्रबंधक ने धोनी की चोट के बारे में कहा है कि वे पूरी देखभाल और आराम करवा रहे हैं ताकि वह जल्द से जल्द फिट होकर टीम में लौट सकें। साथ ही, उन्होंने यह भी माना कि आईपीएल में चोट का होना टीम के लिए एक चुनौती है, लेकिन पूरे सीजन में टीम अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रतिबद्ध है। आईपीएल 2026 के इस रोमांचक सफर के दौरान धोनी की स्थिति और उनकी वापसी की खबरें सभी क्रिकेट प्रेमी उत्सुकता से जानना चाहेंगे। फिलहाल, गुवाहाटी में होने वाले CSK और राजस्थान रॉयल्स के मुकाबले पर सभी की निगाहें टिकी हैं, जो इस सीजन की शुरुआत का एक बेहतरीन उदाहरण साबित हो सकता है। इस बारे में और अपडेट्स के लिए फैंस को टीम की आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया चैनलों पर नज़र बनाए रखनी चाहिए। आईपीएल के इस सीजन में दर्शकों को क्रिकेट के कई रोमांचक पलों का अनुभव होगा, जहाँ टीमों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिलेगी।

IIT Guwahati team develops energy-efficient bricks
तकनीकी

आईआईटी गुवाहाटी की टीम ने विकसित किए ऊर्जा-कुशल ईंट के नए मॉडल

आईआईटी गुवाहाटी की एक शोध टीम ने ऊर्जा कुशल ईंटों का विकास किया है, जो भवनों को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में सक्षम हैं। इस नए आविष्कार को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से स्थायी निर्माण के लिए एक प्रभावी समाधान के रूप में देखा जा रहा है। शोधकर्ताओं ने बताया कि इन ईंटों को विशेष प्रकार की सामग्री और डिजाइन तकनीक के साथ तैयार किया गया है, जिससे यह गर्मी को कम अवशोषित करती हैं और भवन के अंदर तापमान को नियंत्रित कर प्राकृतिक शीतलता प्रदान करती हैं। इस तकनीक से ऊर्जा की खपत में काफी कमी आ सकती है, खासकर एयर कंडीशनिंग जैसी प्रणालियों पर निर्भरता घटती है, जो बिजली बचाने के साथ-साथ पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। टीम के प्रमुख सदस्य ने कहा, “हमने इस परियोजना में पर्यावरण अनुकूल और आर्थिक दृष्टि से सुलभ विकल्पों पर ध्यान दिया है। इन ईंटों का उद्देश्य गर्मी के प्रभाव को कम करना और शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा की बचत करना है।” शोधकर्ताओं ने उम्मीद जताई है कि यह तकनीक लंबी अवधि में निर्माण क्षेत्र में मानक बन जाएगी और नवाचारों को बढ़ावा देगी। स्थानीय निर्माण कंपनियां और सरकार इस पहल को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रही हैं। इस नवाचार को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए सहयोग और निवेश की भी योजना बनाई जा रही है। साथ ही, शोध टीम ने आगे के परीक्षण एवं सुधार के लिए विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में इन ईंटों का उपयोग करने पर काम शुरू कर दिया है। इस पहल से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा कुशल निर्माण सामग्री की आवश्यकता आज के समय में तेजी से बढ़ती जा रही है, क्योंकि बढ़ती गर्मी और ऊर्जा संकट ने नए और टिकाऊ समाधानों की मांग बढ़ा दी है। IIT गुवाहाटी की यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तकनीकी नवाचार देश में ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रयासों को मजबूत करेगा। अंततः, इस तरह के अनुसंधान और विकास से न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि स्वच्छ और स्वस्थ जीवन के लिए भी बेहतर पर्यावरणीय परिस्थितियां उपलब्ध होंगी।

Sathish Gujral: a silence that exploded
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सतीश गुजरल: एक सन्नाटा जिसने छिड़काव किया

सतीश गुजरल, एक महान समकालीन कलाकार, जिन्होंने श्रवण क्षति के बावजूद कला की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी, अभी नई दिल्ली में अपनी शताब्दी प्रदर्शनी की वजह से चर्चा में हैं। इस प्रदर्शनी में उनके जीवन और कला के अनगिनत पहलुओं को दर्शाया गया है, जो दर्शकों को उनके अद्भुत और समर्पित काम की गहराई में ले जाता है। सतीश गुजरल की श्रवण क्षमता में कमी ने उन्हें रुकने या हार मानने के बजाय, उन्हें एक नए तरीके से दुनिया को देखने और अभिव्यक्ति करने के लिए प्रेरित किया। उनकी सुनने की सीमा ने उनके आसपास की चीजों को समझने और कला के नए रूपों को खोजने की भूख को बढ़ावा दिया। यह प्रदर्शनी इसी जज्बे की सफलता का प्रतीक है, जहाँ उनके विभिन्न चित्रों, मूर्तियों, और स्केचों के जरिये उनकी कलात्मक ऊर्जा दिखाई देती है। इसं प्रदर्शनी का आयोजन नई दिल्ली की प्रमुख आर्ट गैलरियों में से एक में किया गया है, जो सतीश गुजरल के सौ वर्ष पूरे होने पर आयोजित की गई है। यह अवसर सिर्फ एक उत्सव नहीं है बल्कि भारत की कला और कलाकारों को विश्व पटल पर स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। गुजरल की कला का सार उनके दृढ़ निश्चय, मौलिक दृष्टिकोण, और बिना शब्दों के संवाद से भरा हुआ है। कुंदन, टॉम और अन्य आधुनिक कलाकारों के साथ उनके सहयोग ने उनके कार्य को और अधिक समृद्ध और बहुमुखी बनाया है, लेकिन यह प्रदर्शनी बताती है कि सतीश की प्रतिभा स्वयं में अनुभूत होती है। यहां उनकी पेंटिंग्स के साथ साथ उनके द्वारा बनाए गये सार्वजनिक कला और इन्स्टालेशन भी प्रदर्शित किए गए हैं, जो दर्शकों को उनकी बहुमुखी प्रतिभा से रूबरू कराते हैं। आलोचकों का मानना है कि सतीश गुजरल ने जो असीम ऊर्जा अपनी कला में उड़ेल दी, वह आज भी युवाओं को प्रेरित कर रही है। शारीरिक बाधाओं को पार कर उन्होंने अपनी कला के जरिए एक अनूठी पहचान बनाई। इस प्रदर्शनी के माध्यम से, नई पीढ़ी कलाकारों और सामान्य दर्शकों को यह संदेश मिलता है कि अस्थायी चुनौतियां सफलता की राह में कभी बाधा नहीं बनतीं। अंत में, सतीश गुजरल का यह शताब्दी समारोह न केवल उनके ऐतिहासिक योगदान का सम्मान करता है, बल्कि भारतीय कला की समृद्ध परंपरा को भी वैश्विक मंच तक पहुंचाने में सहायक साबित होता है। नई दिल्ली में इस प्रदर्शनी का दौर लगातार तीन महीने तक चलेगा, जहां कला प्रेमी इसे देख सकते हैं और उस मौन विस्फोट का हिस्सा बन सकते हैं जिसने सतीश गुजरल की दुनिया को आकार दिया।

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