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मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन ने ‘‘धुरंधर: द रिवेंज’’ फिल्म के खिलाफ चुनावों के दौरान बैन लगाने की मांग वाली दो जनहित याचिकाएँ खारिज कर दी हैं। इन याचिकाओं में दावा किया गया था कि यह फिल्म चुनावी शांति भंग कर सकती है और सामाजिक तनाव बढ़ा सकती है। हालांकि, अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाओं को उचित ठहराया नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि फिल्म में दिखाई गई कुछ दृश्यों से गैर-वास्तविक राजनीतिक टिप्पणियाँ हो सकती हैं, जो कि चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि इसे चुनावों के दौरान जारी नहीं होने दिया जाना चाहिए। लेकिन अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान की मूल भावना है और तब तक किसी भी फिल्म पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है जब तक कि उसमें कोई स्पष्ट और तत्काल खतरा न हो।
चेफ जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शान्तिपूर्ण और निष्पक्ष होनी चाहिए, लेकिन साथ ही कलाकारों और फिल्म निर्माताओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी संरक्षण दिया जाना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि ‘‘धुरंधर: द रिवेंज’’ फिल्म की सामग्री में चुनावी हिंसा या अशांति फैलाने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। इसलिए, इसे प्रतिबंधित करना न्यायसंगत नहीं होगा।
इससे पहले, इस फिल्म को लेकर तमिलनाडु में कई विरोध और समर्थन के स्वर सुनने को मिले थे। कुछ समूहों ने इसे चुनावी माहौल बिगाड़ने वाला बताया था, जबकि फिल्म निर्माता और कलाकारों ने इसे एक सशक्त और संवेदनशील कहानी बताया, जो समाज के कई पहलुओं को उजागर करती है।
इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ है कि सक्षम न्यायालय लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने के लिए संवैधानिक अधिकारों और नियमों का पालन करते हुए फैसला करता है। चुनावी माहौल सुरक्षित बनाए रखना जरूरी है, परंतु वह स्वतंत्र अभिव्यक्ति की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
इस मामले में अदालत का निर्णय फिल्म और लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाकर एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हुआ है। फिलहाल, ‘‘धुरंधर: द रिवेंज’’ को तमिलनाडु में प्रदर्शित किया जाएगा और आम चुनाव के दौरान इसे कोई रोक नहीं मिलेगा।












