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दादा आदिनाथ के मस्तक पर स्वर्ण आभूषण एवं डायमंड तिलक चढ़ाया

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माउंट आबू (महावीर जैन)। विश्वविख्यात आबू देलवाड़ा जैन तीर्थ एक बार फिर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह से सराबोर नजर आया, जब प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के मस्तक पर स्वर्ण आभूषण एवं डायमंड जडि़त तिलक चढ़ाने का आयोजन संपन्न हुआ। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि इसने हजारों वर्षों पुरानी परंपराओं को जीवंत करते हुए जैन समाज की अटूट आस्था को भी प्रदर्शित किया। यह पावन कार्यक्रम मंगलवार को शुभ मुहूर्त में आचार्य भगवंत भाग्येशसूरि महाराज की निश्रा में आयोजित किया गया। इस अवसर पर चतुर्विद संघ की उपस्थिति, गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा, और मंदिर परिसर में गूंजते जय-जय श्री आदिनाथ के जयकारों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
प्राचीनता और गौरव का प्रतीक है देलवाड़ा जैन तीर्थ
आबू देलवाड़ा जैन तीर्थ जैन धर्म के पांच प्रमुख प्राचीन तीर्थों में से एक माना जाता है। लगभग 1000 वर्षों का इतिहास समेटे यह तीर्थ अपनी अद्भुत शिल्पकला, धार्मिक महत्व और आध्यात्मिक वातावरण के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। वर्ष 2031 में इस ऐतिहासिक तीर्थ की 1000वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी, जिसके लिए अभी से तैयारियां और उत्साह देखने को मिल रहा है। इस तीर्थ का निर्माण प्राचीन काल में महान दानवीरों और श्रावकों—भामाशाह तेजपाल एवं वस्तुपाल धन्नासेठ द्वारा करवाया गया था। उनकी भक्ति और समर्पण का यह अद्वितीय उदाहरण आज भी स्थापत्य कला के रूप में जीवंत है। संगमरमर पर की गई बारीक नक्काशी, मंदिर की कलात्मक संरचना और सूक्ष्म शिल्पकला इसे विश्व के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान दिलाती है। करीब 995 वर्षों के इतिहास में करोड़ों श्रद्धालु इस तीर्थ के दर्शन कर चुके हैं और यहां की दिव्यता का अनुभव कर चुके हैं।
स्वर्ण आभूषण और डायमंड तिलक अर्पण
हाल ही में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में भक्तजनों ने भगवान आदिनाथ की प्रतिमा के मस्तक पर लगभग दो किलो स्वर्ण से निर्मित आभूषण, डायमंड जडि़त तिलक, चक्षु एवं कपाली अर्पित किए। यह अर्पण केवल भौतिक भेंट नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और आस्था का प्रतीक है।
कार्यक्रम के दौरान विधिविधान से पूजा-अर्चना के पश्चात जब भगवान की प्रतिमा को इन स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित किया गया, तो मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा। भगवान की प्रतिमा अत्यंत मनोहारी और दिव्य प्रतीत होने लगी, जिसे देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी और हर कोई इस अलौकिक दृश्य को अपने नेत्रों में बसाना चाहता था।
आयोजन की भव्यता और धार्मिक उत्साह
इस आयोजन की भव्यता देखते ही बनती थी। मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया था। भक्ति संगीत, शंखनाद और मंत्रोच्चार के बीच जब शोभायात्रा निकली, तो पूरा वातावरण आध्यात्मिक उल्लास से भर गया। चतुर्विद संघ—साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका—की उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक पवित्रता प्रदान की। भक्तजन पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए और पूरे श्रद्धाभाव के साथ कार्यक्रम में भाग लिया।
इनकी रही उपस्थिति
इस अवसर पर सिरोही जैन संघ और देलवाड़ा तीर्थ से जुड़े कई प्रमुख गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। इनमें मुख्य रूप से टिलायत परिवार के कमलेश चौधरी, राकेश बोबावत, दिलीप कुमार वहितरा, पेढ़ी के अध्यक्ष पंकज गांधी, उपाध्यक्ष सुनील सिंघी, ट्रस्टी अनुभव सिंघी और प्रतीक शाह शामिल रहे। इसके अलावा पावापुरी तीर्थ जीव मैत्री धाम के चेयरमैन किशोर एच. संघवी, 35 वर्षों से वर्षीतप की तपस्या में लीन तपस्वी रत्न श्रीमती रतन बेन संघवी, श्रीमती सुधा बेन के. संघवी, मारोल जैन संघ के अध्यक्ष एवं ट्रस्टी नवलमल तातेड़, पारस तातेड़, संस्कार एन तातेड़, किरण कांकरिया और देलवाड़ा पेढ़ी के मुख्य प्रबंधक गोरधन सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। नवपद ओली के आराधकों की उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक धार्मिक गरिमा प्रदान की।
आचार्य भगवंत का प्रेरणादायक संदेश
इस अवसर पर आचार्य भगवंत भाग्येशसूरि ने अपने प्रवचन में जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में परमात्मा को अर्पण करने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है और यह आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। उन्होंने कहा कि केवल भौतिक अर्पण ही नहीं, बल्कि आत्मिक साधना, त्याग, तप, जप और आराधना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए। जैन धर्म का मूल संदेश—अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्य—मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग दिखाता है। आचार्य ने आगे कहा कि जो व्यक्ति इन सिद्धांतों का पालन करता है, वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने भक्तों को प्रेरित किया कि वे अपने जीवन में इन मूल्यों को अपनाएं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाएं।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
यह आयोजन इस बात का प्रतीक है कि कैसे प्राचीन परंपराएं आज भी आधुनिक समाज में जीवित हैं। जहां एक ओर हजारों वर्ष पुरानी धार्मिक मान्यताओं का पालन किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी भी इन परंपराओं से जुड़ रही है। देलवाड़ा जैन तीर्थ न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह संस्कृति, कला और आध्यात्मिकता का संगम भी है। यहां आने वाला हर व्यक्ति केवल दर्शन ही नहीं करता, बल्कि आत्मिक शांति और सुकून का अनुभव भी करता है।
1000वीं वर्षगांठ की तैयारियां
आगामी वर्ष 2031 में इस ऐतिहासिक तीर्थ की 1000वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी। यह अवसर न केवल जैन समाज के लिए, बल्कि पूरे देश और विश्व के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव होगा। इस भव्य आयोजन के लिए विभिन्न स्तरों पर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। मंदिर परिसर के विकास, सुविधाओं के विस्तार और आयोजन की रूपरेखा पर काम किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस ऐतिहासिक अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचेंगे और इस गौरवशाली परंपरा के साक्षी बनेंगे।

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