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‘20 बार में भी नहीं पका’: मटन लेकर थाने पहुंचा शख्स, अनोखी शिकायत से हैरान हुई पुलिस

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ पुलिस बल्कि पूरे इलाके को हैरान कर दिया। आमतौर पर पुलिस थानों में चोरी, झगड़े या अन्य आपराधिक मामलों की शिकायतें आती हैं, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग ही था। एक व्यक्ति अपने साथ मटन से भरा पतीला लेकर थाने पहुंच गया और शिकायत की कि उसका खरीदा हुआ मांस 20 बार कोशिश करने के बाद भी नहीं पक रहा। यह अनोखी घटना ताडिपत्री टाउन पुलिस स्टेशन की है, जहां पुलिस अधिकारियों को भी पहले तो समझ नहीं आया कि इस शिकायत पर कैसे प्रतिक्रिया दी जाए। लेकिन अंततः उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लिया और समाधान भी निकाला। क्या है पूरा मामला? मिली जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ता सोडाला हाजी, जो ताडिपत्री के पुतलुरु रोड इलाके के निवासी हैं, ने उगादी त्योहार के मौके पर खास पकवान बनाने के लिए भेड़ के सिर का मांस खरीदा था। इस पारंपरिक डिश को स्थानीय भाषा में ‘तलकुरा’ कहा जाता है। हाजी बड़े उत्साह के साथ घर पहुंचे और मटन पकाना शुरू किया। लेकिन उनकी परेशानी तब शुरू हुई, जब बार-बार पकाने के बावजूद मांस नरम नहीं हुआ। उन्होंने एक-दो बार नहीं, बल्कि करीब 20 बार कोशिश की, लेकिन हर बार नतीजा वही रहा—मटन सख्त और अधपका। थाने पहुंचा ‘मटन का पतीला’ लगातार असफल कोशिशों से परेशान होकर हाजी ने एक असामान्य कदम उठाया। वह मटन से भरा पूरा बर्तन लेकर सीधे पुलिस थाने पहुंच गए और विक्रेता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। थाने में मौजूद पुलिस अधिकारी पहले तो इस अजीब शिकायत को सुनकर हैरान रह गए। टाउन सर्कल इंस्पेक्टर आनंद राव के लिए यह एक बिल्कुल अलग तरह का मामला था। लेकिन उन्होंने शिकायत को नजरअंदाज करने के बजाय उसे गंभीरता से लिया। पुलिस की भूमिका: समस्या का समाधान पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए मटन विक्रेता से संपर्क किया। बातचीत के दौरान विक्रेता को स्थिति समझाई गई और उसे समाधान निकालने के लिए कहा गया। आखिरकार विक्रेता इस बात पर सहमत हो गया कि वह खराब मटन के बदले ताजा और खाने योग्य मांस देगा। इस तरह पुलिस के हस्तक्षेप से मामला मौके पर ही सुलझा लिया गया। यह घटना इस बात का उदाहरण बन गई कि पुलिस नागरिकों की हर तरह की समस्या को गंभीरता से लेती है, चाहे वह कितनी भी असामान्य क्यों न हो। आखिर क्यों नहीं पका मटन? इस घटना के बाद स्थानीय लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई कि आखिर मटन क्यों नहीं पका। कई लोगों का मानना है कि अगर बकरे या भेड़ की उम्र अधिक हो, तो उसका मांस सख्त हो जाता है और उसे पकाने में काफी समय लगता है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मांस की गुणवत्ता, उसकी ताजगी और पकाने की विधि भी इस पर असर डालती है। हालांकि, इस मामले में विक्रेता ने यह स्पष्ट नहीं किया कि मटन के न पकने की असली वजह क्या थी। सोशल चर्चा और स्थानीय प्रतिक्रिया यह अनोखी घटना ताडिपत्री और आसपास के इलाकों में चर्चा का विषय बन गई। लोग इस घटना को मजेदार तरीके से भी देख रहे हैं और सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों ने इसे हास्यास्पद बताया, तो कुछ ने इसे उपभोक्ता अधिकारों से जोड़कर देखा। उनका कहना है कि अगर कोई उत्पाद सही नहीं है, तो ग्राहक को शिकायत करने का पूरा अधिकार है—चाहे मामला मटन का ही क्यों न हो। पुलिस का संदेश इस पूरे मामले के बाद सर्कल इंस्पेक्टर आनंद राव ने कहा कि पुलिस का काम केवल बड़े अपराधों को सुलझाना ही नहीं है, बल्कि नागरिकों की हर समस्या को सुनना और उसका समाधान करना भी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस हर शिकायत को गंभीरता से लेती है और कोशिश करती है कि लोगों को तुरंत राहत मिले। उपभोक्ता अधिकारों का सवाल यह घटना भले ही मजेदार लगती हो, लेकिन यह उपभोक्ता अधिकारों की ओर भी इशारा करती है। अगर कोई व्यक्ति बाजार से कोई सामान खरीदता है और वह खराब निकलता है, तो उसे शिकायत करने का पूरा अधिकार है। इस मामले में भी ग्राहक ने अपनी समस्या को सामने रखा और उसे समाधान मिला। यह दिखाता है कि जागरूकता और साहस से छोटी-सी समस्या भी हल हो सकती है। निष्कर्ष आंध्र प्रदेश के अनंतपुर से सामने आई यह अनोखी घटना भले ही हंसी का कारण बन रही हो, लेकिन इसके पीछे एक महत्वपूर्ण संदेश भी छिपा है। यह घटना बताती है कि प्रशासन नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर है और हर शिकायत का महत्व होता है। मटन के न पकने की यह कहानी अब एक मिसाल बन गई है—जहां एक आम आदमी ने अपनी समस्या को अनोखे तरीके से उठाया और पुलिस ने भी उसे गंभीरता से लेते हुए तुरंत समाधान कर दिया।

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पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा: क्या है सरकार का प्लान?

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। ऐसे समय में भारत सरकार ने तेजी से कदम उठाते हुए देश की ईंधन और गैस आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए व्यापक रणनीति तैयार की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च 2026 को राज्यसभा में इस योजना का विस्तार से उल्लेख किया। सात सशक्त समूहों का गठन: संकट से निपटने की रणनीति प्रधानमंत्री मोदी ने सदन को बताया कि सरकार ने हाल ही में सात सशक्त समूह (Empowered Groups) बनाए हैं। ये समूह कोविड-19 महामारी के दौरान बनाए गए समूहों की तर्ज पर काम करेंगे और तेजी से निर्णय लेने में सक्षम होंगे। इन समूहों में विभिन्न मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेंगे। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऊर्जा आपूर्ति, गैस वितरण और संबंधित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की बाधा न आए। किन-किन क्षेत्रों पर होगा फोकस? सरकार द्वारा गठित इन समूहों का काम केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक स्तर पर काम करेंगे। इनमें शामिल प्रमुख क्षेत्र हैं: पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति एलपीजी और प्राकृतिक गैस वितरण उर्वरकों की उपलब्धता महंगाई नियंत्रण सप्लाई चेन मैनेजमेंट आयात-निर्यात से जुड़े जोखिम सरकार का मानना है कि ऊर्जा संकट का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह कृषि, उद्योग और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ता है। इसलिए समग्र दृष्टिकोण अपनाया गया है। पहले से सक्रिय अंतर-मंत्रालयीय समूह प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि एक अंतर-मंत्रालयीय समूह पहले से ही नियमित रूप से बैठकें कर रहा है। यह समूह वैश्विक हालात पर नजर रखते हुए आयात-निर्यात से जुड़ी चुनौतियों का आकलन करता है और समय-समय पर आवश्यक निर्णय लेता है। यह समूह विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित कर यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी संकट का सामना प्रभावी ढंग से किया जा सके। शॉर्ट, मीडियम और लॉन्ग टर्म प्लान सरकार केवल तात्कालिक समाधान पर ही ध्यान नहीं दे रही है, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति भी तैयार कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सरकार तीन स्तरों पर काम कर रही है: शॉर्ट टर्म: तत्काल आपूर्ति बनाए रखना और कीमतों को नियंत्रित करना मीडियम टर्म: वैकल्पिक स्रोतों और आपूर्ति मार्गों की खोज लॉन्ग टर्म: ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए संरचनात्मक सुधार यह बहु-स्तरीय रणनीति भारत को भविष्य के संकटों से निपटने में सक्षम बनाएगी। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सुरक्षित गुजरे भारतीय जहाज ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से एक सकारात्मक खबर भी सामने आई है। दो भारतीय एलपीजी कैरियर जहाज—‘जग वसंत’ और ‘पाइन गैस’—सुरक्षित रूप से Strait of Hormuz से गुजर चुके हैं। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का परिवहन होता है। इन जहाजों का सुरक्षित गुजरना भारत के लिए राहत की खबर है और इससे गैस आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिलेगी। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी प्राथमिकता ऊर्जा आपूर्ति के साथ-साथ सरकार ने विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, हवाई क्षेत्र बंद होने और उड़ानों पर प्रतिबंध के बावजूद नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के प्रयास जारी हैं। सरकार विभिन्न माध्यमों से यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि कोई भी भारतीय नागरिक संकटग्रस्त क्षेत्र में फंसा न रह जाए। वैश्विक संकट और भारत की अर्थव्यवस्था प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के कारण आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है। हालांकि, उन्होंने भरोसा जताया कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है और इस संकट का सामना करने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि सरकार हर स्थिति पर नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कदम उठाएगी। राज्यों से सहयोग की अपील प्रधानमंत्री ने राज्यों से भी इस संकट के दौरान सहयोग की अपील की। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य मिलकर “टीम इंडिया” के रूप में काम करें, ताकि देश इस चुनौती से प्रभावी तरीके से निपट सके। राज्यों की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊर्जा वितरण और सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा राज्य स्तर पर संचालित होता है। महंगाई और उर्वरक पर भी नजर सरकार का फोकस केवल ईंधन और गैस तक सीमित नहीं है। उर्वरकों की उपलब्धता और महंगाई नियंत्रण को भी प्राथमिकता दी जा रही है। यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि किसानों और आम लोगों पर इस संकट का न्यूनतम असर पड़े। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का सीधा असर खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है, इसलिए सरकार समग्र रणनीति के तहत काम कर रही है। निष्कर्ष: सतर्कता और रणनीति का संतुलन पश्चिम एशिया में जारी संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने समय रहते कदम उठाते हुए एक व्यापक और बहु-स्तरीय रणनीति तैयार की है। सात सशक्त समूहों का गठन, अंतर-मंत्रालयीय समन्वय, वैकल्पिक योजनाएं और नागरिकों की सुरक्षा—इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सरकार इस चुनौती का सामना करने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, भारत इस संकट से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। अब यह देखना होगा कि वैश्विक हालात किस दिशा में जाते हैं और भारत अपनी रणनीति के जरिए इस चुनौती को कितनी प्रभावी ढंग से संभाल पाता है।

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संसद से संसदीय क्षेत्र तक: 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने के लिए सांसदों का एकजुट संकल्प

एमपी’ज फॉर चिल्ड्रेन के तहत साझा प्रयास राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘एमपी’ज फॉर चिल्ड्रेन’ कार्यक्रम के तहत विभिन्न राजनीतिक दलों के 20 से अधिक सांसद 2030 तक भारत को बाल विवाह मुक्त बनाने की रणनीति पर एकजुट हुए। सांसदों ने बाल विवाह के खिलाफ कड़े कदम उठाने, निजी विधेयक लाने और संसदीय क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। बाल विवाह और सोशल मीडिया खतरों पर चर्चा संसद में बाल संरक्षण के लिए गठित इस मंच ने बाल विवाह और बच्चों के लिए सोशल मीडिया के खतरे को एक बड़ी चुनौती करार दिया। सांसदों ने शून्य काल का उपयोग, निजी विधेयक और संसदीय क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से बाल विवाह के खिलाफ सक्रिय प्रयास करने पर सहमति जताई। एमपी’ज फॉर चिल्ड्रेन की शुरुआत ‘एमपी’ज फॉर चिल्ड्रेन’ की शुरुआत 17 नवंबर 2024 को हुई थी, जिसमें बाल विवाह और बाल यौन शोषण पर चिंता जताते हुए 38 सांसदों ने इसका समर्थन किया। इस पहल को ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन’ का समर्थन प्राप्त है, जो बाल अधिकारों के संरक्षण का देश का सबसे बड़ा नागरिक समाज नेटवर्क है। इसके 250 से अधिक सहयोगी संगठन देश के 450 से अधिक जिलों में काम कर रहे हैं। सांसदों का संदेश ‘डायलॉग विद पार्लियामेंटेरियंस ऑन अचीविंग चाइल्ड फुल पोटेंशल’ में बोलते हुए तेलुगु देशम पार्टी के नेता और एमपी’ज फ़र चिल्ड्रेन के संयोजक लावू श्रीकृष्ण देवरायलु ने कहा, “बाल विवाह किसी एक पार्टी या धर्म का मुद्दा नहीं है। इसे खत्म करने पर सभी दलों में आम सहमति है। जब भारत ने सामूहिक संकल्प के साथ काम किया, हमने पोलियो खत्म किया और बच्चों को स्कूल तक पहुँचाया। उसी संकल्प के साथ 2030 तक बाल विवाह का खात्मा संभव है।” बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम को मजबूत बनाने की पहल संसदीय नेता देवरायलु ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 को मजबूत करने के लिए हाल ही में लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश किया। इस विधेयक में शामिल हैं: सख्त सजा का प्रावधान विशेष बाल विवाह निषेध अधिकारी विशेष अदालतें डिजिटल रिपोर्टिंग पोर्टल इस पहल का उद्देश्य बाल विवाह मुक्त भारत के लक्ष्य को तेजी से हासिल करना है। सांसदों का व्यापक समर्थन सांसदों में विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य शामिल थे, जिनमें भीम सिंह (भाजपा), डॉ. धर्मवीर गांधी (कांग्रेस), राजा राम सिंह कुशवाहा (सीपीआई एमएल), लुंबा राम चौधरी (भाजपा), पुष्पेंद्र सरोज (सपा), जुगल किशोर शर्मा (भाजपा), महुआ माजी (जेएमएम) और कई अन्य शामिल थे। सभी सांसदों ने बाल विवाह के खिलाफ रणनीति और जागरूकता कार्यक्रमों में सहयोग देने का संकल्प लिया। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का योगदान जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, “बाल संरक्षण केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता है। बच्चों को ऑनलाइन और ऑफलाइन खतरों से सुरक्षित रखना राष्ट्र निर्माण की बुनियादी शर्त है। सांसदों ने इस दिशा में कदम उठाया है और ‘बाल विवाह मुक्त भारत दिवस’ घोषित करने पर सहमति जताई है।” बाल विवाह मुक्ति रथ अभियान संगठन ने बाल विवाह के खिलाफ 100 दिन के जागरूकता अभियान के तहत देशभर में 500 से अधिक रथ चलाए। ये रथ गांवों और जनसमुदाय तक बाल विवाह के खिलाफ संदेश पहुंचाने का माध्यम बने। देश के 28 राज्यों और 439 जिलों में ये रथ गए, और 104 से ज्यादा सांसदों ने अपने क्षेत्रों में रथ यात्रा का नेतृत्व किया। राज्य और जिला प्रशासन का सहयोग अभियान में दो मुख्यमंत्रियों, तीन उपमुख्यमंत्रियों, तीन विधानसभा अध्यक्षों, तीन उपाध्यक्षों, 49 राज्य मंत्रियों, 154 विधायकों और 99 जिला कलेक्टरों ने बाल विवाह मुक्ति रथ को हरी झंडी दिखाई। इस कदम ने बच्चों के अधिकारों के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया। निष्कर्ष संसद से संसदीय क्षेत्र तक इस पहल ने यह संदेश दिया कि बाल विवाह का खात्मा सामूहिक और राजनीतिक संकल्प से ही संभव है। 2030 तक बाल विवाह मुक्त भारत का लक्ष्य केवल कानून और प्रशासन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक चेतना, शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से इसे हर स्तर पर लागू किया जाएगा। सांसदों और नागरिक समाज के एकजुट प्रयास ने इस दिशा में नई उम्मीद जगाई है।

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पंजाब के रंधावा सुसाइड केस में गृह मंत्री शाह ने दिए CBI जांच के साफ संकेत

पंजाब के वेयरहाउस डिस्ट्रिक्ट मैनेजर (DM) गगनदीप सिंह रंधावा की आत्महत्या का मामला अब लोकसभा तक पहुँच गया है। पंजाब सरकार के मंत्री लालजीत भुल्लर पर प्रताड़ना के गंभीर आरोपों के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस मामले में CBI जांच के साफ संकेत दिए हैं। संसद में गूँजा मुद्दा, शाह बोले सोमवार को कांग्रेस सांसद गुरजीत औजला ने लोकसभा में रंधावा की मौत का मुद्दा उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा- “यह पंजाब राज्य का विषय है लेकिन अगर पंजाब के सभी सांसद मुझे इस मामले में लिखित अनुरोध देते हैं, तो मैं तुरंत यह केस CBI को ट्रांसफर करने के निर्देश दे दूंगा।” पंजाब के कांग्रेस सांसदों ने अमित शाह को लिखा पत्र  मिली जानकारी के मुताबिक पंजाब से कांग्रेस सांसदों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर गगनदीप सिंह रंधावा के मामले में इंसाफ की मांग की है। इस पत्र के जरिए सांसदों ने पूरे मामले की CBI जांच की ज़ोरदार मांग की है। इस चिट्ठी पर पंजाब के जाने-माने कांग्रेस सांसद जिनमें गुरजीत सिंह औजला, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, धर्मबीर गांधी और सुखजिंदर सिंह रंधावा शामिल हैं, ने साइन किए हैं। इस दौरान उन्होंने वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन के मैनेजर जी.एस. रंधावा की आत्महत्या के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग उठाई। सांसदों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष और गहन जांच के लिए CBI जांच जरूरी है। प्रतिनिधिमंडल ने पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि केवल सीबीआई जांच ही किसी भी स्थानीय प्रभाव या दबाव से मुक्त निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कर सकती है। उन्होंने पीड़ित परिवार और आम जनता की भावनाओं को भी व्यक्त किया, जो इस मामले में न्याय और स्पष्टता की मांग कर रहे हैं।

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अब बिना क्लेम के मिलेगा PF का पैसा: EPFO ला रहा ऑटो-सेटलमेंट सुविधा, करोड़ों खाताधारकों को राहत

बड़ी पहल: बिना आवेदन सीधे खाते में पैसा देश के करोड़ों कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत की खबर है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) अब एक नई ऑटो-सेटलमेंट सुविधा शुरू करने जा रहा है, जिसके तहत निष्क्रिय खातों में पड़ा पीएफ का पैसा सीधे बैंक खातों में ट्रांसफर किया जाएगा। इस सुविधा के लागू होने के बाद खाताधारकों को किसी तरह का क्लेम करने या कागजी प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत नहीं होगी। क्या है ऑटो-सेटलमेंट सुविधा? ऑटो-सेटलमेंट सुविधा एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था है, जिसके जरिए ईपीएफओ आधार से सत्यापित खातों की पहचान कर उनमें पड़ी लावारिस राशि को सीधे संबंधित व्यक्ति के बैंक खाते में भेज देगा। इससे वर्षों से अटके करोड़ों रुपये लोगों तक आसानी से पहुंच सकेंगे। कितनी राशि और कितने खाते? ईपीएफओ के आंकड़ों के अनुसार, करीब 81 लाख निष्क्रिय खातों में लगभग 5,200 करोड़ रुपये की राशि पड़ी हुई है। इनमें से कई खाते ऐसे हैं जिनमें लाखों रुपये जमा हैं, लेकिन खाताधारकों ने अब तक क्लेम नहीं किया है। लावारिस धन का बड़ा आंकड़ा फरवरी 2026 तक ईपीएफओ के पास 31.8 लाख निष्क्रिय खातों में कुल 10,181 करोड़ रुपये की राशि पड़ी हुई है। यह राशि लंबे समय से बिना दावे के पड़ी है, जिसे अब ऑटो-सेटलमेंट के जरिए निपटाने की योजना बनाई जा रही है। किसे मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा? इस सुविधा का सबसे ज्यादा लाभ उन लोगों को मिलेगा जो रिटायर हो चुके हैं या जिन्होंने नौकरी बदलने के बाद अपना पीएफ ट्रांसफर नहीं कराया। इसके अलावा, ऐसे खाताधारक जिनके खाते आधार से लिंक हैं लेकिन लंबे समय से निष्क्रिय हैं, उन्हें भी इसका फायदा मिलेगा। कैसे काम करेगा सिस्टम? नई प्रणाली के तहत ईपीएफओ पहले आधार और बैंक खाते की जानकारी का मिलान करेगा। इसके बाद सत्यापन पूरा होने पर राशि सीधे संबंधित व्यक्ति के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी। निष्क्रिय खाता किसे माना जाता है? ईपीएफओ उन खातों को निष्क्रिय मानता है, जिनमें लंबे समय तक कोई योगदान नहीं किया गया हो। आमतौर पर, 55 वर्ष की आयु के बाद यदि तीन वर्षों तक कोई योगदान नहीं होता, तो खाता निष्क्रिय हो जाता है। सरकार की बड़ी पहल यह कदम सरकार की डिजिटल इंडिया और वित्तीय समावेशन की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और लोगों को उनके हक का पैसा समय पर मिलेगा।

क्रिकेट के नियम बदले
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क्रिकेट के बदले नियम – क्रिकेट के 73 नियम बदले, एक अक्टूबर से होंगे लागू

क्रिकेट के बदले नियम – क्रिकेट के 73 नियम बदले, एक अक्टूबर से होंगे लागूमेलबोर्न। क्रिकेट के नियमों में बदलाव हुए है। कुल 73 नियम बदल दिए हैं। इनमें टेस्ट मैच में दिन के आखिरी ओवर में विकेट गिरने पर पूरा ओवर खेलना अनिवार्य कर दिया गया है। डेड बॉल, ओवरथ्रो, बाउंड्री पर लिए जाने वाले कैच, विकेटकीपर की पोजीशन जैसे कई नियम बदले गए हैं। लेमिनेटेड बैट को सशर्त मंजूरी दी गई है। नए नियम 1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगे। मुख्य नियम के तहत टेस्ट मैचों में दिन का आखिरी ओवर अब हर हाल में पूरा कराया जाएगा। ऐसा न होने से खेल का रोमांच कम हो जाता है। वहीं यह भी बयान में कहा गया कि, इससे समय की बचत भी नहीं होती, क्योंकि बची हुई गेंदें अगले दिन पूरी करनी ही पड़ती हैं। साथ ही इससे खेल का रोमांच कम हो जाता है। नया बल्लेबाज मुश्किल परिस्थितियों से बच जाता है। क्योंकि आमतौर पर उस समय गेंदबाजों के लिए हालात अनुकूल होते हैं। क्रिकेट के बदले नियम के तहत अगर परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो अंतिम पूरा किया जाएगा, भले ही उस दौरान विकेट गिर जाए। इसी प्रकार ओवरथ्रो और मिसफील्ड के बीच के अंतर को स्पष्ट कर दिया है। अब ओवरथ्रो सिर्फ तभी माना जाएगा, जब कोई फील्डर विकेट पर गेंद फेंकता है और वह गेंद आगे निकल जाती है। अगर फील्डर बाउंड्री के पास गेंद रोकने की कोशिश करता है और गेंद हाथ से फिसलकर निकल जाती है, तो उसे ओवरथ्रो नहीं, बल्कि मिसफील्ड कहा जाएगा। वहीं अब ‘डेड बॉल’ के लिए यह जरूरी नहीं है कि गेंद गेंदबाज या विकेटकीपर के हाथ में ही हो। अगर गेंद किसी भी फील्डर के पास आ गई हो या मैदान पर रुक गई हो और अंपायर को लगे कि अब बल्लेबाज रन नहीं ले सकता, तो वह गेंद को डेड बॉल घोषित कर सकता है। लेमिनेटेड बैट या टाइप-डी बैट वह क्रिकेट बैट होता है, जिसे लकड़ी के दो या तीन टुकड़ों को आपस में जोडक़र तैयार किया जाता है। ये बल्ले पारंपरिक सिंगल-पीस बल्लों की तुलना में सस्ते होते हैं। इन्हें ओपन एज क्लब क्रिकेट में इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है। वहीं क्रिकेट के बदले नियम के तहत, ओपन एज क्रिकेट उस फॉर्मेट को कहा जाता है जिसमें खिलाडिय़ों की उम्र की कोई सीमा निर्धारित नहीं होती और इस स्तर पर सभी उम्र के खिलाड़ी एकसाथ खेल सकते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट की यूजीसी नए नियमों पर फिलहाल रोक

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने कहा कि इसके प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर की है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। यूजीसी ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था। इनका देशभर में विरोध हो रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही नियमों का ड्राफ्ट फिर से तैयार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अगली सुनवाई अब 19 मार्च को होगी।यूजीसी के नए कानून का नाम है प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026। इसके तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई निर्देश दिए गए थे। नए नियमों के तहत, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने का निर्देश दिया गया। सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं। हालांकि, सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि यूजीसी ने जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और इससे कॉलेजों में अराजकता पैदा होगी। सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि नए नियमों में सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ बना दिए गए हैं। इनसे उनके खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा।

लोकसभा में महंगाई पर बहस
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लोकसभा में महंगाई पर बहस

लोकसभा में महंगाई पर बहस एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। संसद के हालिया सत्र में विपक्षी दलों ने बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला और आम जनता पर बढ़ते आर्थिक बोझ का मुद्दा उठाया। लोकसभा में महंगाई का मुद्दा क्यों अहम लोकसभा में महंगाई पर बहस इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि खाद्य पदार्थों, ईंधन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार की नीतियाँ आम नागरिकों को राहत देने में विफल रही हैं। विपक्ष के आरोप लोकसभा में महंगाई पर बहस के दौरान विपक्षी सांसदों ने कहा कि मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। कई सांसदों ने अपने-अपने क्षेत्रों के उदाहरण देते हुए बताया कि घरेलू बजट बिगड़ चुका है। सरकार का जवाब सरकार की ओर से वित्त मंत्री ने लोकसभा में महंगाई पर बहस के दौरान कहा कि वैश्विक परिस्थितियाँ इसकी मुख्य वजह हैं। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। सरकार द्वारा उठाए गए कदम सरकार ने बताया कि महंगाई नियंत्रण के लिए करों में कटौती, आयात नीति में बदलाव और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया गया है। लोकसभा में महंगाई पर बहस के दौरान सरकार ने भविष्य में स्थिति सुधरने का भरोसा भी दिलाया। आर्थिक विशेषज्ञों की राय विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अल्पकालिक उपायों से महंगाई पर नियंत्रण संभव नहीं है। दीर्घकालिक रणनीति, उत्पादन वृद्धि और रोजगार सृजन आवश्यक हैं। निष्कर्ष लोकसभा में महंगाई पर बहस यह दर्शाती है कि यह मुद्दा आने वाले समय में भी राजनीतिक एजेंडे में प्रमुख रहेगा। जनता सरकार के ठोस कदमों की प्रतीक्षा कर रही है।

NEP-2026
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सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत स्कूल पाठ्यक्रम में किए बड़े बदलाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 के तहत केंद्र सरकार ने स्कूल शिक्षा प्रणाली में व्यापक और दूरगामी सुधार लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इस नीति का मुख्य उद्देश्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, कौशल आधारित और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन सुधारों से छात्रों को केवल परीक्षा केंद्रित पढ़ाई से बाहर निकालकर व्यावहारिक ज्ञान और जीवन कौशल से जोड़ा जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 का उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 का लक्ष्य छात्रों में रचनात्मक सोच, समस्या समाधान क्षमता और आत्मनिर्भरता विकसित करना है। सरकार का मानना है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में पारंपरिक शिक्षा प्रणाली छात्रों को भविष्य की आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं कर पा रही थी। स्कूल पाठ्यक्रम में संरचनात्मक बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 के अंतर्गत 10+2 की पुरानी प्रणाली को हटाकर 5+3+3+4 का नया शैक्षणिक ढांचा लागू किया गया है। इससे बच्चों की मानसिक विकास प्रक्रिया के अनुसार शिक्षा दी जा सकेगी। प्रारंभिक कक्षाओं में खेल, गतिविधि और अनुभव आधारित शिक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी। विषय चयन में लचीलापन नई नीति के अनुसार छात्र अब विज्ञान, कला और वाणिज्य के बीच कठोर विभाजन से मुक्त होंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 छात्रों को बहुविषयक शिक्षा का अवसर देती है, जिससे वे अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार विषय चुन सकेंगे। कौशल विकास पर विशेष जोर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 में कक्षा 6 से ही कौशल विकास को अनिवार्य बनाया गया है। कोडिंग, डिजिटल साक्षरता, कृषि कौशल, हस्तशिल्प और तकनीकी प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है। इससे छात्रों को प्रारंभिक स्तर पर ही रोजगारोन्मुख शिक्षा मिलेगी। शिक्षकों की भूमिका और प्रशिक्षण नीति में शिक्षकों के प्रशिक्षण और मूल्यांकन को भी मजबूत किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 के तहत डिजिटल ट्रेनिंग, सतत व्यावसायिक विकास और प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन प्रणाली लागू की जा रही है। चुनौतियाँ और समाधान हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 को लागू करने में संसाधनों की कमी, डिजिटल डिवाइड और राज्यों के बीच समन्वय जैसी चुनौतियाँ सामने आई हैं। सरकार का कहना है कि नीति को चरणबद्ध तरीके से लागू कर इन समस्याओं का समाधान किया जाएगा। निष्कर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2026 भारत की शिक्षा प्रणाली में ऐतिहासिक बदलाव लाने की क्षमता रखती है। यदि इसे प्रभावी रूप से लागू किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत का छात्र वर्ग वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।

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