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Before refrigeration, how did seafarers preserve food on long voyages?
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समंदर की चुनौती: बिना रेफ्रिजरेशन नाविक कैसे बचाते थे अपना राशन?

समुद्र यात्रा के इतिहास में भोजन संरक्षण की समस्या सदैव महत्वपूर्ण रही है। रेफ्रिजरेशन यंत्रों के आविष्कार से पहले, समुद्री यात्रियों को लंबी यात्राओं के दौरान अपने भोजन को सुरक्षित रखने के लिए पारंपरिक तरीकों का सहारा लेना पड़ता था। इस तकनीक ने उन्हें जहाज पर लंबे समय तक भोजन खराब होने से बचाने में मदद की। सबसे पहले, समुद्री यात्रियों ने नमक के माध्यम से मांस और मछली को संरक्षित करने का प्रमुख तरीका अपनाया। नमकीन करना, यानी मांस को मोटी परत में नमक लगाकर सूरज और हवा में सुखाना, एक प्राचीन और प्रभावी तरीका था। यह प्रक्रिया खाद्य पदार्थ में मौजूद जल को कम कर देती थी, जिससे बैक्टीरिया की वृद्धि रुक जाती थी। इसके अलावा, सूखे फल और अनाज जैसे चने, दालें और चावल जहाज पर सुरक्षित रूप से रखे जाते थे। इनमें नमी की मात्रा बहुत कम होती है, जिससे इन्हें लंबी अवधि तक बिना खराब हुए रखा जा सकता था। जहाज की डिब्बियों या कंटेनरों में भोजन को हवा और नमी से दूर रखा जाता था। समुद्री यात्रियों ने खाद्य पदार्थ संरक्षित करने के लिए धूम्रपान (स्मोकिंग) की भी विधि अपनाई। मांस या मछली को आग के धुएं में सुखाना और धूम्रपान करना जीवाणुओं को मारने में मदद करता था और स्वाद में भी सुधार करता था। इसके अलावा, सिरका या शराब का उपयोग खाद्य सुरक्षा के लिए किया जाता था, क्योंकि इसका एसिडिक गुण खाद्य पदार्थों को खराब होने से रोकता था। कुछ नाविक जड़ों, मसालों और विशेष प्रकार के जड़ी-बूटियों का भी इस्तेमाल करते थे, जो प्राकृतिक रूप से खाद्य संरक्षण में सहायक होते थे। इसके साथ ही, भोजन को लकड़ी के डिब्बों में या मोम लगाकर लपेटा जाता था ताकि उसे बाहरी नमी और कीटों से बचाया जा सके। इन पारंपरिक तकनीकों के कारण, जहाज पर लंबे समुद्री सफर के दौरान यात्रियों को पोषण मिलता रहा और उनकी भूख शांत रहती थी। वक्त के साथ नई तकनीकों और उपकरणों के कारण भोजन संरक्षण के तरीके और भी अधिक उन्नत हुए हैं, लेकिन इन पुराने तरीकों ने समुद्री इतिहास में अमूल्य योगदान दिया है।

IIT Guwahati team develops energy-efficient bricks
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आईआईटी गुवाहाटी की टीम ने विकसित किए ऊर्जा-कुशल ईंट के नए मॉडल

आईआईटी गुवाहाटी की एक शोध टीम ने ऊर्जा कुशल ईंटों का विकास किया है, जो भवनों को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में सक्षम हैं। इस नए आविष्कार को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से स्थायी निर्माण के लिए एक प्रभावी समाधान के रूप में देखा जा रहा है। शोधकर्ताओं ने बताया कि इन ईंटों को विशेष प्रकार की सामग्री और डिजाइन तकनीक के साथ तैयार किया गया है, जिससे यह गर्मी को कम अवशोषित करती हैं और भवन के अंदर तापमान को नियंत्रित कर प्राकृतिक शीतलता प्रदान करती हैं। इस तकनीक से ऊर्जा की खपत में काफी कमी आ सकती है, खासकर एयर कंडीशनिंग जैसी प्रणालियों पर निर्भरता घटती है, जो बिजली बचाने के साथ-साथ पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। टीम के प्रमुख सदस्य ने कहा, “हमने इस परियोजना में पर्यावरण अनुकूल और आर्थिक दृष्टि से सुलभ विकल्पों पर ध्यान दिया है। इन ईंटों का उद्देश्य गर्मी के प्रभाव को कम करना और शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा की बचत करना है।” शोधकर्ताओं ने उम्मीद जताई है कि यह तकनीक लंबी अवधि में निर्माण क्षेत्र में मानक बन जाएगी और नवाचारों को बढ़ावा देगी। स्थानीय निर्माण कंपनियां और सरकार इस पहल को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रही हैं। इस नवाचार को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए सहयोग और निवेश की भी योजना बनाई जा रही है। साथ ही, शोध टीम ने आगे के परीक्षण एवं सुधार के लिए विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में इन ईंटों का उपयोग करने पर काम शुरू कर दिया है। इस पहल से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा कुशल निर्माण सामग्री की आवश्यकता आज के समय में तेजी से बढ़ती जा रही है, क्योंकि बढ़ती गर्मी और ऊर्जा संकट ने नए और टिकाऊ समाधानों की मांग बढ़ा दी है। IIT गुवाहाटी की यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तकनीकी नवाचार देश में ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रयासों को मजबूत करेगा। अंततः, इस तरह के अनुसंधान और विकास से न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि स्वच्छ और स्वस्थ जीवन के लिए भी बेहतर पर्यावरणीय परिस्थितियां उपलब्ध होंगी।

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