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In Focus Podcast | Has gold lost its safe haven status?
विशेषज्ञों की राय

In Focus Podcast: | क्या बाजार की उथल-पुथल के बीच सोने ने अपना ‘सेफ हेवन’ स्टेटस खो दिया ?

बढ़ती अस्थिरता, ऊंची ब्याज दरें और वैश्विक संघर्षों के बीच सोने की पारंपरिक “सेफ हेवन” भूमिका पर सवाल विश्व भर में जारी वैश्विक तनाव के बीच सोने की कीमतों में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई है। इस नए आर्थिक परिदृश्य में निवेशकों की निगाहें इस बहुमूल्य धातु की स्थिरता पर टिक गई हैं। इस एपीसोड में, कवित चौक और बी. भगवान दास से चर्चा के माध्यम से हम जानेंगे कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई और इससे निवेशकों तथा बाजार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। पिछले कुछ महीनों में सोने ने पारंपरिक सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में अपनी विश्वसनीयता साबित की है। लेकिन, हाल की वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक घटनाओं ने सोने के मूल्य को प्रभावित किया है। वैश्विक मुद्रास्फीति, ब्याज दरों में बदलाव, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अनिश्चितता के कारण निवेशकों ने अपने पोर्टफोलियो में विविधता लानी शुरू कर दी है। कविता चौक ने कहा, “अक्सर आर्थिक संकट या geopolitical तनाव के दौरान निवेशक सोने की ओर रुख करते हैं क्योंकि यह एक सुरक्षित आश्रय माना जाता है। लेकिन इस बार, बाजार में अल्पकालिक और दीर्घकालिक कारकों के मिश्रण के कारण, सोने की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है।” वहीं, बी. भगवान दास ने बताया कि वैश्विक आर्थिक नीतियों में तेजी से बदलाव और कुछ देशों की मुद्रास्फीति नियंत्रण की रणनीतियों का भी सोने की मांग और आपूर्ति पर असर पड़ा है। विश्लेषकों के अनुसार, हालिया गिरावट का एक कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि का संकेत भी है। उच्च ब्याज दरें आम तौर पर सोने जैसे गैर ब्याज आधारित संपत्ति के लिए चुनौतीपूर्ण होती हैं। इसके अलावा, डॉलर की ताकत में बढ़ोतरी भी सोने की कीमतों को दबाव में रखती है क्योंकि सोने की कीमतें अमेरिकी डॉलर में निर्धारित होती हैं। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि इस गिरावट को लंबे समय तक नहीं माना जाना चाहिए। आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्यों में तेजी से बदलाव होने के कारण सोने की मांग पुनः बढ़ सकती है। निवेशकों को सावधानी बरतते हुए बाजार की गतिशीलता और फंडामेंटल संकेतों पर ध्यान देना आवश्यक होगा। इस एपीसोड में, कवित और भगवान दास ने गहराई से इन विषयों पर चर्चा की और बताया कि निवेशक वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में कैसे अपने निवेश विकल्पों का मूल्यांकन करें। सोने की आज की स्थिति को समझने के लिए यह एक महत्वपूर्ण संवाद है जो निवेशकों एवं आम जनता दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

In Focus Podcast | What happens to the FIFA World Cup if Iran were to withdraw?
विशेषज्ञों की राय

अगर ईरान वर्ल्ड कप से हटता है तो क्या होगा?

अमेरिका में आयोजित होने वाले आगामी फीफा विश्व कप से ईरान के संभावित वापसी पर विशेषज्ञों और खेल प्रेमियों के बीच चर्चा तेज हो गई है। इस संबंध में प्रख्यात खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली ने इन फोकस पॉडकास्ट के एक हालिया एपिसोड में कहा कि अगर ईरान इस प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाता है, तो फुटबॉल के लिए यह एक बड़ा आघात साबित होगा। लोकपल्ली के अनुसार, ईरान न केवल एशिया के फुटबॉल जगत में एक मजबूत टीम है, बल्कि विश्व कप जैसी वैश्विक टूर्नामेंट में उसकी भागीदारी पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। ईरान का बाहर होना विश्व कप के मुकाबलों की प्रतिस्पर्धा और विविधता को प्रभावित करेगा। ईरान के फुटबॉल प्रेमी और खिलाड़ी इस टूर्नामेंट के लिए उच्च उम्मीदें लगाए बैठे हैं। टीम ने अपने प्रदर्शन से विश्व कप में अपनी छाप छोड़ रखी है, इसलिए उनका अचानक बाहर होना न केवल खिलाड़ियों के मनोबल पर असर डालेगा, बल्कि प्रशंसकों की निराशा भी बढ़ाएगा। विजय लोकपल्ली ने यह भी उल्लेख किया कि अमेरिका में फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए यह विश्व कप एक महत्वपूर्ण अवसर है, और ईरान जैसे देशों की भागीदारी से टूर्नामेंट की सार्थकता और बढ़ जाती है। यदि ईरान बाहर हुआ तो फीफा और आयोजकों को इसके विकल्प तलाशने होंगे ताकि टूर्नामेंट की प्रतिस्पर्धा और रोमांच बरकरार रहे। विश्लेषकों का मानना है कि राजनीतिक या प्रशासनिक कारणों से यदि ईरान withdrew करता है, तो इसका समग्र प्रभाव फुटबॉल की वैश्विक छवि पर भी पड़ेगा। इस मामले में फीफा के निर्णय और प्रतिक्रिया पर पूरी दुनिया की नज़र होगी। अतः इस संदर्भ में आने वाले दिनों में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। खिलाड़ियों, प्रशंसकों और फुटबॉल जगत की निगाहें इस विषय पर टिकी हैं कि आखिर क्या होगा, और विश्व कप की यह महाकुंभ ईरान के बिना कैसा दिखेगा। जैसे-जैसे टूर्नामेंट की तारीख नजदीक आती है, ऐसी परिस्थितियों में हर एक अपडेट खेल जगत के लिए महत्वपूर्ण होगा। विजय लोकपल्ली के इस पॉडकास्ट एपिसोड को सुनना इसलिए जरूरी है ताकि इस गंभीर मुद्दे की विषद जानकारी प्राप्त की जा सके।

In Focus Podcast | Should men get paternity leave in India?
विशेषज्ञों की राय

फोकस पॉडकास्ट | क्या भारत में पुरुषों को पितृ अवकाश मिलना चाहिए?

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पितृ अवकाश को लेकर नई दिशानिर्देशों की मांग की है। यह विषय सामाजिक और पारिवारिक बदलाव के संदर्भ में विशेष अहमियत रखता है, जिसके तहत पुरुषों को भी मातृत्व अवकाश की तरह पितृत्व अवकाश प्रदान किया जाना चाहिए। पितृत्व अवकाश पर इस बहस को लेकर प्रसिध्द पोडकास्ट होस्ट, प्रिसिला जेबराज ने विशेषज्ञ प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे और संजय घोष के साथ इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा की। प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे ने कहा कि भारत में पारंपरिक सोच में पुरुषों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र तक सीमित मानी जाती है, जबकि परिवार में उनकी भूमिका को कम माना जाता है। पितृत्व अवकाश से न केवल पिता और बच्चे के बीच मजबूत बंधन बनेगा, बल्कि महिलाओं के कार्यस्थल पर बने रहने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। उन्होंने यह भी बताया कि सामाजिक संरचना में बदलाव के लिए कानूनी संरक्षण आवश्यक है, जो पितृत्व अवकाश को मान्यता और लागू करवाएगा। वहीं, संजय घोष ने इस पहल को स्वागत योग्य बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में जब भारतीय परिवार तेजी से बदल रहे हैं, तब पितृत्व अवकाश एक ऐसा कदम है जो परिवारों में संतुलन लाने में मदद करेगा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यस्थल प्रशासन एवं नीतियां भी इस बदलाव के अनुकूल होनी चाहिए, जिससे पिता अपनी जिम्मेदारियां आराम से निभा सकें। यह विवादास्पद विषय सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ कानून एवं कार्य संस्कृति में सुधार की मांग करता है। भारत ने मातृत्व अवकाश के क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन पितृत्व अवकाश की कमी ने पुरुषों की पारिवारिक भागीदारी को सीमित रखा है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि वह न केवल पितृत्व अवकाश के लिए मान्यता सुनिश्चित करेगा, बल्कि इससे कार्यस्थल की लिंग समानता को भी बल मिलेगा। हालांकि, पितृत्व अवकाश को लेकर कई दफे बहस हुई है, पर अब इसे कानूनी रूप देने का प्रयास तेज हुआ है। यह बदलाव भारतीय समाज में पिता की भूमिका को नए अर्थ देने का प्रयास है, जो आने वाले समय में कार्य-संतुलन और परिवार की खुशहाली के लिए अहम साबित होगा। समाज विशेषज्ञ और मानवाधिकार समूह भी सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का समर्थन कर रहे हैं और उम्मीद जताते हैं कि जल्द ही पितृत्व अवकाश भारत में औपचारिक तौर पर लागू हो। इससे कार्य क्षेत्र में समानता, पारिवारिक जिम्मेदारियों का पुनर्मूल्यांकन और बच्चों के लिए बेहतर पालन-पोषण के अवसर सुनिश्चित होंगे। इस चर्चा में यह भी सामने आया कि पितृत्व अवकाश न केवल एक कानूनी अधिकार होना चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक स्वीकृति भी मिलनी चाहिए ताकि पारंपरिक सोच में बदलाव आए और परिवार के सभी सदस्य अपनी योग्य भूमिका निभा सकें।

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