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Review | A vibrant portrait of early-2000s Bengaluru: Good Arguments by Deepika Arwind
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समीक्षा | 2000 के दशक की शुरुआती बेंगलुरु का जीवंत चित्र: दीपिका अरविंद की ‘गुड आर्ग्युमेंट्स’

  बेंगलुरु, एक ऐसा शहर जिसने 2000 के दशक की शुरुआत में युवा, बेचैन और कलात्मक दृष्टिकोण रखने वाले लोगों की भावनाओं को गहराई से महसूस किया, अब एक नॉवल के ज़रिए पुनः जीवित हो उठा है। दीपिका अरविंद की किताब ‘गुड आर्ग्युमेंट्स’ इस युग के जटिल मनोवैज्ञानिक पहलुओं, सामाजिक विरोधाभासों और इतिहास की संजीव तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह उपन्यास न केवल एक कहानी है बल्कि उस दौर की सांस्कृतिक ग़ुलज़ारियों का आभास भी कराता है, जब बेंगलुरु तेजी से एक आधुनिक महानगर के रूप में उभर रहा था। युवा वर्ग के भीतर व्याप्त आंतरिक संघर्ष, नवाचार और कलात्मकता की खोज इस पुस्तक की मुख्य थीम है। लेखिका ने बखूबी उन भावनाओं और परिस्थितियों को शब्दों में पिरोया है जो उस समय के युवाओं की मानसिकता को दर्शाती हैं। व्यक्तित्व, प्रेम, दोस्ती और सामाजिक दबावों के बीच की गुत्थी को इस उपन्यास में परिष्कृत तरीके से उजागर किया गया है। गुड आर्ग्युमेंट्स पाठकों को उस युग की जीवंतता और जटिलताओं से रू-ब-रू कराता है, जहाँ सपनों और वास्तविकताओं के बीच एक निरंतर टकराव चलता रहता था। यह नॉवल उन लोगों के लिए खासकर प्रासंगिक है जो उस समय के सांस्कृतिक और सामाजिक बदलावों को समझना चाहते हैं। दूसरी ओर, पुस्तक में प्रस्तुत संवाद और पात्रों के बीच के संबंध गहराई से इमर्शिव अनुभव प्रदान करते हैं, जो आधुनिक साहित्य में दुर्लभ है। बेंगलुरु के फुसफुसाते सड़कों से लेकर शिक्षण संस्थानों की हलचल तक की तस्वीर इसमें स्पष्ट रूप से मिलती है। इस उपन्यास को पढ़ना युवा पीढ़ी के लिए विगत युग की सांस्कृतिक कहानी से जुड़ने का माध्यम है, जबकि पुराने पाठकों के लिए यह स्मृतियों को पुनः जीवंत करने का साधन भी है। ऐसे में ‘गुड आर्ग्युमेंट्स’ साहित्यिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। फैसले, पसंद, और आत्म-खोज की पृष्ठभूमि में बुनी यह कहानी किसी भी पाठक को अपने समय के संघर्षों और आनंदों की गहराई से समझ पैदा करने में सक्षम है। दीपिका अरविंद का यह उपन्यास बाज़ार में एक नई दिशा प्रस्तुत करता है जो बेंगलुरु के बदलावों को आत्मसात करता है। कुल मिलाकर, ‘गुड आर्ग्युमेंट्स’ एक शानदार साहित्यिक कृति है जो 2000 के दशक की बेंगलुरु की जीवनकथा को प्रभावी ढंग से बयान करती है। यह न केवल एक शहर की कहानी है, बल्कि उस समय के युवा मनों की जटिलताओं तथा कलात्मक संघर्षों की सजीव अभिव्यक्ति भी है।

Joining the dots in Jamshedpur | A Parsi family archive turns into ‘Sparseeing’
लाइफस्टाइल

जमशेदपुर में जुड़ते धागे | एक पारसी परिवार का अभिलेख ‘स्पार्सिंग’ में बदलता नजर

दो प्रतिष्ठित लोकाज़ी फोटूबुक ग्रांट विजेता, जॉयोना मेधी और अभिषेक बसु, पारिवारिक अभिलेख को नए दृष्टिकोण और अभिव्यक्ति के साथ पेश कर रहे हैं। उनके इस अनोखे प्रयास ने पारिवारिक यादों को एक कला और इतिहास के रूप में पुनर्जीवित किया है, जो ‘स्पार्सिंग’ नामक कला परियोजना का हिस्सा है। ‘स्पार्सिंग’ एक ऐसा मौलिक प्रोजेक्ट है जिसमें पारसी परिवार के निजी अभिलेखों, तस्वीरों और दस्तावेजों को एक नये नजरिए से देखा और प्रस्तुत किया गया है। जॉयोना मेधी और अभिषेक बसु ने पारंपरिक पारिवारिक चित्र संग्रह से हटकर ऐसी रचनात्मक विधा अपनाई है, जो दर्शकों को व्यक्तिगत और सामूहिक स्मृतियों को अधिक गहराई से समझने का अवसर देती है। जॉयोना मेधी के अनुसार, “हमारे प्रयासों का मकसद केवल तस्वीरें दिखाना नहीं, बल्कि उनकी पृष्ठभूमि, कहानी और भावनाओं को जीवंत करना है। पारिवारिक अभिलेख हमारे इतिहास का आईना होते हैं, पर अक्सर उन्हें चुनौतीपूर्ण और अनुपयोगी समझ लिया जाता है। हम इसे बदलना चाहते हैं।” इस परियोजना के तहत, अभिषेक बसु ने पारसी परिवारों के सांस्कृतिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उनके दैनंदिन जीवन और परंपराओं को तस्वीरों के माध्यम से उजागर किया है। उन्होंने कहा, “जब हम अपने अतीत को समझते हैं, तो हम अपने वर्तमान और भविष्य को बेहतर रूप से समझ पाते हैं। यह परियोजना उन अनकहे कथाओं को सामने लाने का एक जरिया है जो अक्सर समय के साथ धूल में खो जाती हैं।” लोकाज़ी फोटूबुक ग्रांट जैसे मंच इस तरह के कलाकारों और फोटोग्राफरों को नई संभावनाएं प्रदान करते हैं। यह प्रोत्साहन उन्हें अपनी कला के दम पर सामाजिक, सांस्कृतिक, और पारिवारिक इतिहास को समृद्ध करने के लिए एक अनमोल अवसर देता है। ‘स्पार्सिंग’ परियोजना का प्रदर्शन जल्द ही भारत में कई प्रमुख कला सम्मेलनों और प्रदर्शनी स्थलों पर आयोजित किया जाएगा, जहां पारिवारिक अभिलेखों की इस नई प्रस्तुति को लेकर व्यापक चर्चा और सराहना की उम्मीद है। यह पहल दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक यादों और दस्तावेजों को आधुनिक कला के माध्यम से पुनः जीवित किया जा सकता है, जिससे अगली पीढ़ी तक सांस्कृतिक विरासत सजीव और प्रासंगिक बनी रहे।

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