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सुस्त गलियारों में गूंजता सिंहनाद, सिरोही की राजनीति का परिदृश्य

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सिरोही की राजनीति इन दिनों किसी पुराने रेडियो की तरह हो गई है कभी-कभार खडख़ड़ाती है, कुछ क्षणों के लिए आवाज साफ आती है, फिर अचानक खामोशी छा जाती है। ऐसा लगता है मानो राजनीति ने खुद ही ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया हो, लेकिन यह मौन भी बड़ा बोलता हुआ मौन है। गलियारों में चहल-पहल है, बयानबाजी की हल्की-फुल्की आहटें हैं, पर वह धार, वह ताप, वह जीवंतता कहीं गायब सी दिखती है, जिसके लिए सिरोही जिला प्रदेश भर में अपनी अलग पहचान रखता आया है। यह वही सिरोही है, जहां राजनीति कभी सिर्फ कुर्सी का खेल नहीं रही, बल्कि जनभावनाओं का उफान रही है। यहां चुनाव सिर्फ वोटों का जोड़-घटाव नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों, जातीय संतुलनों और व्यक्तिगत करिश्मे का अनूठा संगम होता रहा है। यहां के नेता सिर्फ नेता नहीं, बल्कि अपने-अपने समर्थकों के लिए ‘आवाज’ होते थे। लेकिन आज वही आवाजें जैसे किसी ‘वीआईपी मूवमेंट’ की गाडिय़ों के सायरन में दबती जा रही हैं। इन दिनों सिरोही की राजनीति में जो सबसे ज्यादा दिखता है, वह है—‘सुस्ती’। यह सुस्ती आलस्य वाली नहीं, बल्कि एक तरह की रणनीतिक चुप्पी है। सत्तारूढ़ पक्ष के नेता व्यस्त हैं लेकिन जनता के बीच नहीं, बल्कि कार्यक्रमों, उदघाटनों और वीआईपी दौरों में। उनके लिए राजनीति अब जनता के बीच पसीना बहाने का काम नहीं, बल्कि एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर योजनाओं की ‘फाइलिंग’ करने का माध्यम बनती जा रही है। दूसरी ओर प्रतिपक्ष है, जो अपने विरोध को भी बुनाई की तरह धीरे-धीरे गढ़ रहा है। वह जोरदार प्रहार नहीं करता, बल्कि ‘सुई-धागे’ से विरोध के पैटर्न तैयार करता है। कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस, कभी सोशल मीडिया पोस्ट, तो कभी छोटे-छोटे धरनों के जरिए वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन यह विरोध भी उतना ही ‘संयमित’ है, जितनी सत्तापक्ष की सक्रियता ‘संयमित’ है।
बाण तरकश में ही क्यों हैं?
राजनीति में बाण चलाने का समय और तरीका दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन सिरोही में इन दिनों बाण तरकश में ही आराम फरमा रहे हैं। नेता तैयार हैं, मुद्दे भी हैं, मंच भी हैं, लेकिन तीर चलाने का साहस या कहें इच्छा, दोनों ही कम दिखाई देते हैं। यह स्थिति वैसी ही है जैसे कोई योद्धा युद्धभूमि में खड़ा हो, लेकिन तलवार म्यान से बाहर निकालने से पहले ही सोचने लगे कि क्या जरूरत है? राजनीति में यह ‘क्या जरूरत है’ वाला भाव सबसे खतरनाक होता है, क्योंकि यहीं से जनहित पीछे छूट जाता है और व्यक्तिगत सुविधा आगे आ जाती है। कुछ समय पहले तक सिरोही की राजनीति में जमीनों के कथित खुर्द-बुर्द का मामला गरम था। आरोप-प्रत्यारोप के तीर चल रहे थे, बयानबाजी चरम पर थी और ऐसा लग रहा था कि यह मुद्दा राजनीतिक भूचाल ला देगा। लेकिन अचानक यह मामला भी ‘ठंडा’ पड़ गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या समस्या हल हो गई, या फिर समस्या को ही ‘ठंडे बस्ते’ में डाल दिया गया? हमारे यहां समस्याएं खत्म नहीं होतीं, बल्कि उन्हें ‘मैनेज’ कर लिया जाता है। राजनीति में समाधान से ज्यादा ‘संतुलन’ जरूरी हो गया है और यह संतुलन अक्सर सच्चाई के खिलाफ खड़ा नजर आता है।
वीआइपी मूवमेंट, जनता से दूरी का नया बहाना
सत्ताधारी नेताओं के लिए इन दिनों ‘वीआइपी मूवमेंट’ एक नया कवच बन गया है। जहां जाना है, वहां प्रोटोकॉल है, सुरक्षा है, स्वागत है, मालाएं हैं, फोटो सेशन है। सब कुछ है, बस जनता के असली सवालों के जवाब नहीं हैं। जनता भी अब समझने लगी है कि वीआइपी मूवमेंट का मतलब है नेता आएंगे, हाथ हिलाएंगे, मुस्कुराएंगे और चले जाएंगे। उनके जाने के बाद रह जाती है धूल, कुछ बैनर और सोशल मीडिया पर अपलोड होने वाली तस्वीरें। यह स्थिति किसी फिल्म के उस सीन जैसी है, जहां हीरो आता है, स्टाइल में एंट्री करता है, डायलॉग बोलता है और बिना किसी समस्या का समाधान किए आगे बढ़ जाता है।
प्रतिपक्ष की बुनाई, धीमी लेकिन योजनाबद्ध
प्रतिपक्ष इन दिनों खुलकर आक्रमण नहीं कर रहा, लेकिन वह चुप भी नहीं है। वह अपने विरोध को ‘बुन’ रहा है। जैसे कोई कारीगर धैर्यपूर्वक कपड़ा तैयार करता है, वैसे ही प्रतिपक्ष मुद्दों को जोड़ रहा है। उसकी रणनीति स्पष्ट है अभी शोर नहीं, बल्कि समय आने पर ‘धमाका’। लेकिन राजनीति में ज्यादा देर तक चुप रहना भी खतरनाक होता है, क्योंकि जनता को लगता है कि दोनों पक्षों में कोई खास फर्क नहीं है।
सिंहनाद बनाम शंखनाद
सिरोही की राजनीति में एक नाम ऐसा है, जिसकी आवाज अक्सर ‘सिंहनाद’ के रूप में गूंजती रही है। जहां बाकी नेता शंख बजाकर औपचारिक शुरुआत करते हैं, वहां यह आवाज सीधे दहाड़ के रूप में सामने आती है। लेकिन इन दिनों यह सिंहनाद भी कुछ सीमित सा लग रहा है। मुद्दे हैं, मौके हैं, लेकिन आवाज उतनी व्यापक नहीं हो पा रही, जितनी पहले हुआ करती थी। शायद यह समय का प्रभाव है, या फिर राजनीति की बदलती प्रकृति का परिणाम। अब राजनीति में दहाड़ से ज्यादा ‘डिजिटल पोस्ट’ का महत्व बढ़ गया है। जो जितना ज्यादा ट्रेंड करता है, वही उतना बड़ा नेता माना जाता है।
आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर
सिरोही में इन दिनों स्थानीय मुद्दों से ज्यादा प्रदेश और देश की राजनीति पर बहस हो रही है। नेता अपने-अपने दलों की लाइन को आगे बढ़ा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है, लेकिन यह बहस अक्सर ‘टीवी डिबेट’ जैसी लगती है। जहां शोर ज्यादा होता है, समाधान कम। यह स्थिति भी बड़ी दिलचस्प है। स्थानीय समस्याएं जैसे सडक़, पानी, बिजली, रोजगार—इन पर चर्चा कम होती है, जबकि राष्ट्रीय मुद्दों पर बयानबाजी ज्यादा। जैसे किसी घर में छत टपक रही हो, लेकिन लोग पड़ोसी के घर की दीवार पर चर्चा कर रहे हो।
जिंदा राजनीति की पहचान कहां गई?
सिरोही को हमेशा ‘जिंदा राजनीति’ का जिला कहा जाता रहा है। यहां जनता जागरूक रही है, नेताओं को जवाब देना पड़ता रहा है और हर मुद्दे पर बहस होती रही है। लेकिन आज वही जीवंतता कहीं खोती हुई नजर आती है। यह नहीं कि राजनीति खत्म हो गई है। बल्कि राजनीति का स्वरूप बदल गया है। अब यह जमीन से ज्यादा ‘इमेज’ पर आधारित हो गई है। काम से ज्यादा ‘प्रेजेंटेशन’ महत्वपूर्ण हो गया है।

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