
सिरोही,महावीर जैन। जैन धर्म में चैत्र और वैशाख माह में मनाए जाने वाले नवपद ओली तप का प्राचीन काल से विशेष महत्व रहा है। मान्यता है कि इस तप, जप और आराधना से कर्मों की निर्जरा होती है तथा आत्मा को शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। आचार्य भगवंत एवं साधु-साध्वी समुदाय नवपद ओली की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि इस तप के प्रभाव से जीवन के बड़े संकट भी सहज रूप से दूर हो जाते हैं।
नवपद ओली तप के दौरान तपस्वी 9 दिनों तक नवपद की आराधना करते हैं। इस अवधि में वे उकाले हुए पानी का सेवन करते हुए दिन में एक बार सादा, बिना मसाले वाला आयंबिल (लूखा-अलूणा) भोजन ग्रहण करते हैं और दसवें दिन पारणा करते हैं। चैत्र मास में सिरोही जिले के विभिन्न प्राचीन जैन तीर्थों और मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं इस तपस्चर्या में बढ़-चढक़र भाग ले रहे हैं। जिरावला पार्श्वनाथ महातीर्थ में आचार्य रश्मिरत्न सूरी महाराज की निश्रा में एक हजार से अधिक तपस्वी नवपद ओली कर रहे हैं। इसी प्रकार आबू देलवाड़ा तीर्थ में आचार्य कल्पचंद्रसूरी, पावापुरी तीर्थ में आचार्य जयेशरत्नसूरी महाराज, मंडार में मुनिराज भव्यविजय महाराज तथा सिरोही शहर में भी आचार्य भगवंत की निश्रा में ओली आराधना श्रद्धा और उत्साह के साथ जारी है। चैत्र सुदी तेरस को भगवान महावीर के जन्म कल्याणक के अवसर पर जिलेभर में भव्य आयोजन होंगे। इस दिन त्रिशला नंदन वीर की जय, बोलो महावीर की के जयकारों के साथ शोभायात्राएं शहर के विभिन्न मार्गों से निकाली जाएंगी और श्रद्धालुओं को मुंह मीठा कराया जाएगा। इसके साथ ही चैत्र सुदी पूर्णिमा को सिद्धचक्र महापूजन का आयोजन किया जाएगा। नवपद ओली के दौरान प्रतिदिन एक-एक पद—अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप—की आराधना कराई जाती है। साधक इन नौ पदों की महिमा को समझते हुए प्रतिदिन 27 मालाओं का जाप करते हैं। उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार की ओली मूल नवरात्रा के दौरान भी की जाती है। यह आराधना पूरे देश में जैन मंदिरों और उपासरों में साधु-साध्वी भगवंतों की निश्रा में श्रद्धा के साथ संपन्न होती है












