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धर्म एवं यात्रा

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काशी में गंगा आरती बनी वैश्विक आस्था का केंद्र, श्रद्धालुओं का उमड़ा

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बहने वाली पवित्र गंगा नदी के तट पर प्रतिदिन आयोजित होने वाली गंगा आरती आज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, बल्कि यह एक वैश्विक आध्यात्मिक आकर्षण का केंद्र बन चुकी है, जहां देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं और इस अद्भुत दृश्य का साक्षी बनते हैं। विशेष रूप से दशाश्वमेध घाट पर होने वाली यह आरती अपने भव्य स्वरूप, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए जानी जाती है, जिसमें सैकड़ों दीपों की रोशनी, वेद मंत्रों का उच्चारण, शंखनाद और घंटियों की ध्वनि मिलकर एक ऐसा वातावरण निर्मित करते हैं जो हर व्यक्ति के मन को शांति और भक्ति से भर देता है। जैसे ही सूर्य अस्त होता है, घाट पर आरती की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, जहां पुजारी पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित होकर मां गंगा की पूजा-अर्चना करते हैं और बड़े-बड़े दीपदानों को एक निश्चित क्रम में घुमाते हुए आरती करते हैं, जो देखने में अत्यंत आकर्षक और मनमोहक लगता है। इस दौरान गंगा नदी की लहरों पर तैरते दीपक और उनके प्रतिबिंब एक दिव्य दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जो भारतीय संस्कृति की गहराई और आध्यात्मिकता को दर्शाता है। श्रद्धालु इस दौरान अपने हाथ जोड़कर मां गंगा से आशीर्वाद मांगते हैं और अपने जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। प्रशासन द्वारा इस आयोजन के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ नियंत्रण के उपाय किए जाते हैं, ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो और सभी लोग सुरक्षित तरीके से इस आयोजन का आनंद ले सकें। इसके अलावा, यह आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय व्यापारियों, नाविकों तथा होटल उद्योग को भी लाभ प्राप्त होता है। गंगा आरती का यह आयोजन भारतीय संस्कृति, परंपरा और आस्था का एक जीवंत उदाहरण है, जो हर दिन लोगों को एक नई ऊर्जा और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, और यही कारण है कि यह आयोजन आज विश्वभर में प्रसिद्ध हो चुका है तथा इसे देखने और अनुभव करने के लिए लोग दूर-दूर से यहां आते हैं।

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सिरोही में नारी शक्ति का विराट उदय, पांच हजार से अधिक मातृशक्ति की ऐतिहासिक भागीदारी

विशेष संवाददाता भूपेंद्र माली की खास रिपोर्ट सिरोही। माली समाज छात्रावास स्थित लखमीदास मंदिर प्रांगण आज उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जब माली समाज सेवा संस्थान 14 परगना, सिरोही के तत्वावधान में आयोजित महिला जागृति महासम्मेलन महाकुंभ में 5000 से अधिक मातृशक्ति ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। यह आयोजन नारी शक्ति की एकता, जागरूकता और सामाजिक समरसता का प्रतीक बनकर उभरा। माली समाज के 14 परगनों से गांव-गांव से पहुंची महिलाओं ने इस महासम्मेलन को जनआंदोलन का रूप दे दिया। पूरे कार्यक्रम में अनुशासन, उत्साह और समाज के प्रति समर्पण का अद्भुत संगम देखने को मिला। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सिरोही की धरती पर नारी जागरण की नई लहर उमड़ पड़ी हो। इस ऐतिहासिक आयोजन ने पूरे जिले को नारी सशक्तिकरण की भावना से सराबोर कर दिया। महासम्मेलन में शामिल होने के लिए दूर-दराज के गांवों से महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में, उत्साह और आत्मविश्वास के साथ पहुंचीं। उनकी उपस्थिति ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि अब ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं भी जागरूकता और आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। कार्यक्रम स्थल पर हर ओर ऊर्जा, उत्साह और एकता का वातावरण दिखाई दे रहा था। महिलाओं ने न केवल अपनी भागीदारी दर्ज कराई, बल्कि समाज के विकास में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने का भी संकल्प लिया। यह महासंगम वास्तव में नारी शक्ति के जागरण का जीवंत उदाहरण बन गया। महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों ने किया मार्गदर्शन इस महाकुंभ में महिलाओं को विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर जागरूक किया गया। विधिक सेवा, चिकित्सा सेवा, साइबर क्राइम एवं फ्रॉड से बचाव, रोजगार और स्वावलंबन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने विस्तार से जानकारी दी। विधिक सेवा प्राधिकरण से वार्ताकार डॉ. गीता माली, विशाखापट्टनम ने महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक किया। चिकित्सा विभाग से वार्ताकार डॉ. कीर्ति शर्मा ने स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। पुलिस विभाग एवं साइबर धोखाधड़ी से बचाव के विषय पर वार्ताकार राजकुंवर ने डिजिटल युग में सुरक्षा के उपाय बताए। स्वावलंबन विभाग की प्रतिनिधि रुचिका रावल एवं उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसरों के बारे में मार्गदर्शन दिया। इन सभी विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ा और वे अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति अधिक सजग हुईं। इस आयोजन का सफल संचालन माली समाज 14 परगना अध्यक्ष हीरालाल माली एवं उनकी पूरी कमेटी के नेतृत्व में किया गया। उनके कुशल मार्गदर्शन और अथक प्रयासों के कारण यह कार्यक्रम समाज की एकता, संगठन और सशक्तिकरण की मिसाल बनकर सामने आया। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए पूरी टीम ने समर्पण और मेहनत का परिचय दिया। आयोजन की प्रत्येक व्यवस्था चाहे वह स्वागत हो, मंच संचालन हो या व्यवस्थापन—सभी में अनुशासन और समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिला। आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हुआ महासम्मेलन महासम्मेलन की विशेषता रही वात्सल्य मूर्ति पद्म विभूषण साध्वी ऋतंभरा की कृपा पात्र शिष्या साध्वी सत्यसिद्धा गिरी की गरिमामयी उपस्थिति रही। उनके सानिध्य ने पूरे कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। साध्वी गिरी ने कहा कि सामाजिक समरसता, राष्ट्र निर्माण और एकता का संदेश दिया। उनके विचारों ने उपस्थित जनसमूह में नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच का संचार किया। उनके आशीर्वचन ने कार्यक्रम को केवल सामाजिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी समृद्ध बना दिया। नारी सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम यह महासम्मेलन न केवल माली समाज की मातृशक्ति के लिए एक सशक्त मंच साबित हुआ, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गया। इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि जब महिलाएं एकजुट होकर आगे बढ़ती हैं, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आता है। सिरोही आज नारी शक्ति का केंद्र बनकर उभरा, जहां से जागरूकता, एकता और सशक्तिकरण की नई क्रांति का आगाज हो चुका है। यह आयोजन आने वाले समय में समाज के विकास और समरसता के लिए मील का पत्थर साबित होगा। बालिका शिक्षा पर नाट्य प्रस्तुति ने जीता दिल कार्यक्रम के दौरान प्रेरणा एंड पार्टी की ओर से बालिका शिक्षा पर आधारित नाट्य प्रस्तुति दी गई, जिसने सभी उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। इस प्रस्तुति के माध्यम से समाज में बालिका शिक्षा के महत्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। नाटक ने यह संदेश दिया कि यदि बेटियों को उचित शिक्षा और अवसर दिए जाएं, तो वे समाज और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। दर्शकों ने इस प्रस्तुति की सराहना करते हुए कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। पूरे कार्यक्रम का मंच संचालन एशू माली एंड पार्टी की ओर से किया गया, जिन्होंने अपनी प्रभावशाली शैली से कार्यक्रम को रोचक और व्यवस्थित बनाए रखा। उनके संचालन ने कार्यक्रम को एक सुगठित स्वरूप प्रदान किया और दर्शकों का ध्यान अंत तक बनाए रखा। डेढ़ माह की मेहनत से साकार हुआ आयोजन इस महासम्मेलन को सफल बनाने के लिए माली समाज 14 परगनों की पूरी कार्यकारिणी, अध्यापकों की टीम एवं महिलाओं की टीम ने करीब डेढ़ माह तक गांव-गांव जाकर जनसंपर्क किया। उन्होंने महिलाओं को जागरूक करते हुए इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। इस अथक मेहनत और समर्पण का ही परिणाम रहा कि इतनी बड़ी संख्या में मातृशक्ति ने एकत्र होकर इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया। यह सामूहिक प्रयास समाज की एकजुटता और संगठन शक्ति का प्रमाण है। कार्यक्रम के अंत में मंत्री एवं उपाध्यक्ष ने सभी सहयोगियों, अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन समाज को नई दिशा देने का कार्य करते हैं और भविष्य में भी ऐसे प्रयास जारी रहेंगे। सिरोही में आयोजित यह महिला जागृति महासम्मेलन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत है। इसने यह संदेश दिया कि नारी शक्ति जब जागृत होती है, तो समाज में परिवर्तन की धारा स्वत: प्रवाहित होने लगती है।  

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सिरोही: सेंट जोसेफ चर्च में क्रॉस यात्रा और प्रार्थना से गूंजा वातावरण

सिरोही। शहर में गुड फ्राइडे के पावन अवसर पर सेंट जोसेफ कैथोलिक गिरजाघर में गहन श्रद्धा और आस्था के साथ ‘दुख भोग स्मरण’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पूरे गिरजाघर परिसर में आध्यात्मिक माहौल देखने को मिला, जहां श्रद्धालु प्रभु यीशु मसीह के बलिदान को याद करते हुए भाव-विभोर नजर आए। कार्यक्रम की शुरुआत पल्ली पुरोहित फादर जोमी, फादर जोजी थॉमस और फादर जीबीन के नेतृत्व में हुई। उनके मार्गदर्शन में श्रद्धालुओं ने अनुशासन और श्रद्धा के साथ सभी धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। गिरजाघर के प्रवक्ता रणजी स्मिथ ने जानकारी देते हुए बताया कि क्रॉस यात्रा चर्च के मुख्य द्वार से प्रारंभ होकर परिसर के सामने समाप्त हुई। इस यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए, जिन्होंने प्रभु यीशु के कष्टों को स्मरण करते हुए 14 विभिन्न स्थानों पर घुटनों के बल बैठकर आराधना की। यह क्रॉस यात्रा ‘स्टेशंस ऑफ द क्रॉस’ के रूप में जानी जाती है, जिसमें प्रभु यीशु के जीवन के अंतिम क्षणों और उनके बलिदान को याद किया जाता है। यात्रा के दौरान वातावरण पूरी तरह शांत और भक्ति से ओतप्रोत रहा। श्रद्धालुओं ने हाथों में क्रॉस लेकर प्रार्थना की और प्रभु यीशु के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। कई लोग भावुक होकर प्रार्थना करते नजर आए, जिससे पूरा माहौल आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। क्रॉस यात्रा के समापन के बाद लगभग 10 मिनट के विश्राम के पश्चात गिरजाघर के भीतर प्रार्थना और आराधना कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से पवित्र बाइबल का वाचन किया। बाइबल वाचन में प्रभु यीशु के जीवन, उनके संघर्ष, त्याग और मानवता के लिए दिए गए संदेशों का विस्तार से वर्णन किया गया। श्रद्धालुओं ने ध्यानपूर्वक इन शिक्षाओं को सुना और अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। गिरजाघर के भीतर गूंजती प्रार्थनाओं और भजनों ने वातावरण को और अधिक पवित्र बना दिया। हर ओर शांति, भक्ति और आत्मचिंतन का माहौल नजर आया। ईश्वर में अटूट विश्वास से ही दूर होंगे दुख- फादर जीबीन इस अवसर पर फादर जीबीन ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए प्रभु यीशु के जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यीशु मसीह ने अपने जीवन में अनेक कष्टों को सहन किया, लेकिन उन्होंने कभी भी ईश्वर पर विश्वास नहीं छोड़ा। उन्होंने बाइबल के एक महत्वपूर्ण संदेश को साझा करते हुए कहा किवे क्या कर रहे हैं, वे नहीं जानते, उन्हें माफ किया जाए। फादर जीबीन ने बताया कि यह संदेश हमें क्षमा, प्रेम और सहनशीलता की सीख देता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जब दुनिया भौतिकवाद की ओर तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में इंसान अपने रिश्तों और समाज से दूर होता जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास बनाए रखना चाहिए और दूसरों के साथ प्रेम व सद्भाव का व्यवहार करना चाहिए। फादर जीबीन ने अपने संबोधन में वर्तमान समय की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के दौर में मनुष्य अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की दौड़ में इतना व्यस्त हो गया है कि वह आध्यात्मिकता से दूर होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि समाज में तनाव, अशांति और असंतोष बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में प्रार्थना ही एक ऐसा माध्यम है, जो मनुष्य को शांति, संतुलन और सच्चे मार्ग की ओर ले जा सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे अपने जीवन में नियमित रूप से प्रार्थना करें और ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को मजबूत बनाए रखें। श्रद्धा, समर्पण और आत्मचिंतन का प्रतीक बना गुड फ्राइडे गुड फ्राइडे का यह आयोजन सिरोही में केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया। इस दिन श्रद्धालुओं ने प्रभु यीशु के बलिदान को याद करते हुए अपने जीवन की गलतियों पर विचार किया और बेहतर इंसान बनने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने शांति, प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए समाज में सदभाव बनाए रखने की कामना की।

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महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव में उमड़ा श्रद्धा और उत्साह

सिरोही में गूंजा ‘अहिंसा परमो धर्म’ का संदेश सिरोही। शहर में इस वर्ष भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और भव्यता के साथ मनाया गया। जैन समाज द्वारा आयोजित इस पावन अवसर ने पूरे शहर को धार्मिक रंग में रंग दिया, जहां हर ओर अहिंसा परमो धर्म और जियो और जीने दो के संदेश गूंजते नजर आए। इस महोत्सव ने न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ किया, बल्कि सामाजिक समरसता और विश्व शांति के संदेश को भी व्यापक रूप से जन-जन तक पहुंचाया। महोत्सव की शुरुआत प्रात:कालीन प्रभात फेरी से हुई। सुबह-सुबह श्रद्धालु भक्ति गीतों और भगवान महावीर के जयकारों के साथ शहर की प्रमुख गलियों से होकर निकले। इस दौरान वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिससे आयोजन का महत्व और भी बढ़ गया। इसके बाद भव्य वरघोड़ा और शोभायात्रा का आयोजन किया गया, जो महोत्सव का मुख्य आकर्षण रहा। सजी-धजी झांकियों, बैंड-बाजों और पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालुओं ने इस शोभायात्रा को यादगार बना दिया। भगवान महावीर के जीवन प्रसंगों को दर्शाती झांकियों ने लोगों को उनके आदर्शों की याद दिलाई। शोभायात्रा के दौरान श्रद्धालु वर्धमान वीर की जय के उद्घोष करते हुए आगे बढ़ते रहे। शहर के विभिन्न स्थानों पर लोगों ने इस शोभायात्रा का स्वागत किया और पुष्प वर्षा कर अपनी श्रद्धा प्रकट की। महोत्सव के अंतर्गत विभिन्न मंदिरों में विशेष पूजन-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर के चरणों में शीश नवाकर अपने जीवन में शांति, संयम और सदाचार की कामना की। पूजन कार्यक्रमों में जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया। आचार्यों और विद्वानों ने अपने प्रवचनों में बताया कि सच्चा धर्म बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और सरल जीवनशैली में निहित होता है। स्वामी वात्सल्य और सेवा कार्य धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ समाजसेवा की भावना भी इस महोत्सव में देखने को मिली। स्वामी वात्सल्य कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में लोगों को भोजन प्रसादी वितरित की गई। इसके अलावा दिव्यांगजनों को मिठाई वितरित कर मानवता और करुणा का परिचय दिया गया। यह पहल इस बात का प्रतीक थी कि भगवान महावीर का संदेश केवल उपदेशों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतारा जा रहा है। गांधी पार्क योग संस्थान में इस अवसर पर एक विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में विश्व शांति, सद्भाव और मानव कल्याण के लिए प्रार्थना की गई। योग प्रशिक्षकों और समाजसेवियों ने इस दौरान कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भगवान महावीर के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। आज जब दुनिया हिंसा, अशांति और संघर्षों से जूझ रही है, तब अहिंसा का सिद्धांत ही मानवता को सही दिशा दे सकता है। रात्रि में भक्ति संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें भजन-कीर्तन के माध्यम से भगवान महावीर की महिमा का गुणगान किया गया। भक्तों ने देर रात तक भक्ति में लीन होकर आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया। भक्ति संध्या ने पूरे आयोजन को एक भावनात्मक और आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की, जहां हर व्यक्ति भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता नजर आया। समाज में एकता का आह्वान इस अवसर पर समाजसेवी जय विक्रम हरण और नितेश जैन उर्फ लाला भाई ने जैन समाज को एकजुट रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि समाज को छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठकर एकता और सहयोग की भावना को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने सभी से भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाने और समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया। कार्यक्रम में कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया, जिनमें भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के रामेश्वर लाल, योग प्रशिक्षक भीक सिंह भाटी, समाजसेवी जय विक्रम हरण, टीकम भाई सिंधी, योगाचार्य रामचंद्र, आशुतोष पटनी और गोविंद भाई शामिल रहे। इन सभी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और लोगों को नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करते हैं। भगवान महावीर के जीवन का संदेश भगवान महावीर का जीवन त्याग, तपस्या, संयम और अहिंसा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह सिखाया कि सच्ची खुशी बाहरी भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति में निहित होती है। उनका सिद्धांत जियो और जीने दो आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो गया है। यह सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत जीवन में शांति लाता है, बल्कि समाज में भी सह-अस्तित्व और सद्भाव को बढ़ावा देता है। वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया कई तरह की चुनौतियों से जूझ रही है—चाहे वह युद्ध हो, पर्यावरण संकट हो या सामाजिक असमानता—ऐसे में भगवान महावीर के विचार एक मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। उनकी अहिंसा की शिक्षा हमें यह सिखाती है कि किसी भी समस्या का समाधान हिंसा से नहीं, बल्कि शांति और संवाद से संभव है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर झांकें और अपने विचारों और कर्मों को शुद्ध करें।

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नवपद ओली तप: आस्था, संयम और आत्मशुद्धि का महापर्व,महावीर जन्म कल्याणक पर निकलेगी शोभायात्राएं

सिरोही,महावीर जैन। जैन धर्म में चैत्र और वैशाख माह में मनाए जाने वाले नवपद ओली तप का प्राचीन काल से विशेष महत्व रहा है। मान्यता है कि इस तप, जप और आराधना से कर्मों की निर्जरा होती है तथा आत्मा को शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। आचार्य भगवंत एवं साधु-साध्वी समुदाय नवपद ओली की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि इस तप के प्रभाव से जीवन के बड़े संकट भी सहज रूप से दूर हो जाते हैं। नवपद ओली तप के दौरान तपस्वी 9 दिनों तक नवपद की आराधना करते हैं। इस अवधि में वे उकाले हुए पानी का सेवन करते हुए दिन में एक बार सादा, बिना मसाले वाला आयंबिल (लूखा-अलूणा) भोजन ग्रहण करते हैं और दसवें दिन पारणा करते हैं। चैत्र मास में सिरोही जिले के विभिन्न प्राचीन जैन तीर्थों और मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं इस तपस्चर्या में बढ़-चढक़र भाग ले रहे हैं। जिरावला पार्श्वनाथ महातीर्थ में आचार्य रश्मिरत्न सूरी महाराज की निश्रा में एक हजार से अधिक तपस्वी नवपद ओली कर रहे हैं। इसी प्रकार आबू देलवाड़ा तीर्थ में आचार्य कल्पचंद्रसूरी, पावापुरी तीर्थ में आचार्य जयेशरत्नसूरी महाराज, मंडार में मुनिराज भव्यविजय महाराज तथा सिरोही शहर में भी आचार्य भगवंत की निश्रा में ओली आराधना श्रद्धा और उत्साह के साथ जारी है। चैत्र सुदी तेरस को भगवान महावीर के जन्म कल्याणक के अवसर पर जिलेभर में भव्य आयोजन होंगे। इस दिन त्रिशला नंदन वीर की जय, बोलो महावीर की के जयकारों के साथ शोभायात्राएं शहर के विभिन्न मार्गों से निकाली जाएंगी और श्रद्धालुओं को मुंह मीठा कराया जाएगा। इसके साथ ही चैत्र सुदी पूर्णिमा को सिद्धचक्र महापूजन का आयोजन किया जाएगा। नवपद ओली के दौरान प्रतिदिन एक-एक पद—अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप—की आराधना कराई जाती है। साधक इन नौ पदों की महिमा को समझते हुए प्रतिदिन 27 मालाओं का जाप करते हैं। उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार की ओली मूल नवरात्रा के दौरान भी की जाती है। यह आराधना पूरे देश में जैन मंदिरों और उपासरों में साधु-साध्वी भगवंतों की निश्रा में श्रद्धा के साथ संपन्न होती है

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संतों का जीवन विश्व कल्याण और सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित

जयपुर। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने रविवार को जयपुर में आयोजित संत संसद कार्यक्रम में संतों की भूमिका और सनातन संस्कृति के संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि संतों का जीवन केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह पूरे विश्व के कल्याण और मानवता के मार्गदर्शन के लिए समर्पित रहता है। उन्होंने कहा कि संतों के सानिध्य में आने से व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकता है और अपने कर्मों को सार्थक बना सकता है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा विश्व में अद्वितीय है और संत-महात्माओं ने सदियों से इस परंपरा को जीवित रखा है। उन्होंने कहा कि संत समाज केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं देता, बल्कि समाज में नैतिकता, सेवा और समरसता का संदेश भी फैलाता है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ राजस्थान की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के लिए कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि पिछले दो वर्षों में सरकार ने राजकीय मंदिरों में वर्षभर उत्सवों के भव्य आयोजन के लिए वित्तीय स्वीकृतियां दी हैं, जिससे धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिला है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने मंदिरों में कार्यरत पुजारियों के मानदेय में वृद्धि की है, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है। यह कदम न केवल पुजारियों के सम्मान को बढ़ाता है, बल्कि धार्मिक संस्थानों की मजबूती में भी सहायक है। मुख्यमंत्री ने राज्य के प्रमुख तीर्थ स्थलों के विकास पर विशेष ध्यान देने की बात कही। उन्होंने बताया कि पूंछरी का लौठा, खाटूश्याम जी और तीर्थराज पुष्कर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास के लिए एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया गया है। इन स्थलों पर आधारभूत सुविधाओं का विस्तार, यात्री सुविधाओं का विकास और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि खाटूश्याम जी जैसे तीर्थ स्थल पर हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं, इसलिए वहां बेहतर व्यवस्थाएं सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है। इसी तरह पुष्कर, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है, वहां भी विकास कार्यों को गति दी जा रही है। मुख्यमंत्री ने “कृष्ण गमन पथ” परियोजना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह परियोजना न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करेगी। इस परियोजना के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थानों को एक धागे में पिरोने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे श्रद्धालुओं को एक समग्र आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होगा। उन्होंने गौ संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का भी विस्तार से उल्लेख किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि गोशालाओं में गायों के चारे के लिए प्रतिदिन 50 रुपये और बछड़ों के लिए 25 रुपये का अनुदान दिया जा रहा है। इसके साथ ही गोशालाओं में टीनशेड, स्वच्छ पानी और उचित चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि गौ संरक्षण केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है। गायों के संरक्षण से जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है और किसानों की आय में भी वृद्धि होती है। मुख्यमंत्री ने संत समाज से आह्वान किया कि वे समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए आगे आएं और युवाओं को संस्कारों और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दें। उन्होंने कहा कि आज के समय में जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब संतों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्यक्रम में गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम, विधायक कुलदीप धनकड़ और बालमुकुंदाचार्य सहित कई जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। इसके अलावा मेहंदीपुर बालाजी के महंत 1008 नरेश पुरी महाराज सहित बड़ी संख्या में साधु-साध्वीगण भी कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर संतों ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए समाज में नैतिकता और आध्यात्मिकता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बीच संतों का मार्गदर्शन लोगों को संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। कार्यक्रम का समापन भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण में हुआ, जहां उपस्थित लोगों ने संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया और समाज के उत्थान के लिए मिलकर कार्य करने का संकल्प लिया। इस प्रकार, जयपुर में आयोजित संत संसद कार्यक्रम न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि इसने समाज में सकारात्मक ऊर्जा और सांस्कृतिक जागरूकता को भी बढ़ावा दिया। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के संबोधन ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य सरकार आने वाले समय में भी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करती रहेगी।

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नारलाई पहुंचीं मलाइका अरोड़ा: आदिनाथ जैन मंदिर में किए दर्शन

पाली जिले के शांत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कस्बे नारलाई ने रविवार को एक खास पल का साक्षी बना, जब फिल्म अभिनेत्री मलाइका अरोड़ा यहां स्थित प्राचीन आदिनाथ जैन मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचीं। उनके आगमन की खबर फैलते ही मंदिर परिसर में उत्साह और उत्सुकता का माहौल बन गया। स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटक भी उनकी एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े। दोपहर करीब 12 बजे मलाइका अरोड़ा मंदिर पहुंचीं, जहां उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना कर भगवान आदिनाथ का आशीर्वाद लिया। इस दौरान मंदिर परिसर में शांति और श्रद्धा का वातावरण बना रहा, लेकिन बाहर उनके प्रशंसकों की भीड़ लगातार बढ़ती रही। लोगों में उनके साथ फोटो लेने और उन्हें करीब से देखने की उत्सुकता साफ झलक रही थी। मलाइका अरोड़ा इन दिनों राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में छुट्टियां बिता रही हैं। वह नारलाई के प्रसिद्ध विरासत होटल ‘रावला नारलाई’ में ठहरी हुई हैं। यह होटल अपनी पारंपरिक राजस्थानी वास्तुकला, शाही आतिथ्य और प्राकृतिक परिवेश के लिए जाना जाता है।बताया जा रहा है कि मलाइका यहां की प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ियों के बीच बसे शांत वातावरण और ग्रामीण जीवन के अनुभव का आनंद ले रही हैं। शहरों की भागदौड़ से दूर, यह क्षेत्र सुकून और आत्मिक शांति की तलाश करने वाले लोगों के लिए एक आदर्श स्थल बन चुका है। जैसे ही स्थानीय लोगों को मलाइका के मंदिर आने की सूचना मिली, बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए। मंदिर परिसर के बाहर युवाओं और महिलाओं की भीड़ देखने को मिली। कई लोग मोबाइल फोन से उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाते नजर आए। हालांकि, मंदिर प्रशासन और स्थानीय व्यवस्था ने स्थिति को संभालते हुए दर्शन प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाए रखा। मलाइका ने भी सरलता और सहजता के साथ सभी का अभिवादन किया, जिससे उनके प्रशंसकों में और भी उत्साह देखने को मिला। नारलाई राजस्थान के उन खास स्थानों में से एक है, जहां धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहां स्थित आदिनाथ जैन मंदिर अपनी प्राचीनता और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।इसके अलावा, नारलाई में तपेश्वर महादेव मंदिर और जैकल नाथ महादेव मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। ये मंदिर पहाड़ियों और प्राकृतिक गुफाओं के बीच स्थित हैं, जो इनकी विशेषता को और बढ़ाते हैं।नारलाई क्षेत्र केवल धार्मिक स्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी लेपर्ड सफारी के लिए भी जाना जाता है। यहां पर्यटक जंगलों में जाकर तेंदुओं को उनके प्राकृतिक आवास में देखने का रोमांचक अनुभव लेते हैं।देश-विदेश से आने वाले पर्यटक इस सफारी का हिस्सा बनते हैं, जिससे स्थानीय पर्यटन उद्योग को भी मजबूती मिलती है। यही कारण है कि नारलाई अब धीरे-धीरे एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा हैमलाइका अरोड़ा जैसी प्रसिद्ध हस्ती के नारलाई दौरे से क्षेत्र के पर्यटन को निश्चित रूप से बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अक्सर देखा जाता है कि जब कोई सेलिब्रिटी किसी स्थान का दौरा करता है, तो वह जगह सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए चर्चा में आ जाती है।  नारलाई के साथ भी कुछ ऐसा ही होने की संभावना है। यहां के होटल, पर्यटन स्थल और धार्मिक स्थान अब अधिक लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। इससे स्थानीय व्यवसायों और रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि हो सकती है। मलाइका के आगमन से स्थानीय लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला। कई लोगों ने इसे अपने क्षेत्र के लिए गर्व का क्षण बताया। उनका मानना है कि इस तरह के दौरे से नारलाई को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। स्थानीय व्यापारियों और होटल व्यवसायियों को भी उम्मीद है कि आने वाले समय में पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी होगी, जिससे उनकी आय में भी इजाफा होगा।

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फगड़ा–घुड़ला भौलावणी गणगौर: लोक आस्था, परंपरा और उत्सव का अनुपम संगम

जोधपुर। मरुधरा की सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत और आकर्षक अध्याय—फगड़ा-घुड़ला भौलावणी गणगौर—आज शाम 6:30 बजे से पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा उदाहरण है, जो शहर की गलियों को रंग, संगीत और भक्ति के माहौल से भर देता है। इस अवसर पर निकलने वाली गणगौर की सवारियों का भव्य जुलूस ओलम्पिक सिनेमा से प्रारंभ होकर गांधी स्कूल, जालोरी गेट, बालवाड़ी स्कूल, खाण्डाफलसा, आड़ा बाजार और सिरे बाजार होते हुए ऐतिहासिक घण्टाघर व नई सड़क तक पहुंचेगा, जहां मध्य रात्रि के आसपास इसका समापन होगा। जुलूस में सजी-धजी झांकियां, पारंपरिक वेशभूषा में कलाकार, लोक वाद्य यंत्रों की धुन और सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन को विशेष बना देंगे। गणगौर और घुड़ला: इतिहास और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि राजस्थान में गणगौर पर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व मुख्य रूप से माता गौरी (पार्वती) और भगवान शिव की पूजा को समर्पित होता है। अविवाहित युवतियां मनचाहा वर पाने के लिए और विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। घुड़ला परंपरा का इतिहास घुड़ला की परंपरा का संबंध एक ऐतिहासिक कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि मध्यकाल में एक मुस्लिम शासक या सेनापति घुड़ला खान ने गांव की महिलाओं पर अत्याचार किया था। इसके विरोध में ग्रामीणों ने उसका वध कर दिया। उसकी स्मृति में एक छेद वाला मिट्टी का घड़ा (घुड़ला) बनाकर उसमें दीप जलाकर घुमाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस परंपरा के माध्यम से समाज में यह संदेश दिया जाता है कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए। फगड़ा: रंग, संगीत और उल्लास का प्रतीक फगड़ा, होली के बाद मनाया जाने वाला एक लोक उत्सव है, जिसमें महिलाएं और पुरुष पारंपरिक गीत गाते हुए, नृत्य करते हुए जुलूस का हिस्सा बनते हैं। इसमें लोकगीतों के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। फगड़ा-घुड़ला का यह संगम राजस्थान की लोक संस्कृति का अद्भुत उदाहरण है, जहां धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता का सुंदर मेल देखने को मिलता है। जुलूस का मार्ग और विशेष आकर्षण आज शाम निकलने वाला जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरेगा। प्रमुख मार्ग इस प्रकार हैं: ओलम्पिक सिनेमा से शुरुआत गांधी स्कूल जालोरी गेट बालवाड़ी स्कूल खाण्डाफलसा आड़ा बाजार सिरे बाजार घण्टाघर नई सड़क (समापन स्थल) जुलूस में ट्रैक्टर-ट्रॉली, ठेले, तांगे और अन्य वाहनों पर विभिन्न प्रकार की झांकियां सजाई जाएंगी। इन झांकियों में पौराणिक कथाएं, सामाजिक संदेश और स्थानीय लोक जीवन की झलक देखने को मिलेगी। यातायात व्यवस्था: शहर में रहेगा विशेष प्रबंधन जुलूस के दौरान शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए हैं: 1. पूर्ण प्रतिबंधित मार्ग ओलम्पिक तिराहा से जालोरी गेट के बीच सभी प्रकार के वाहनों का आवागमन पूरी तरह बंद रहेगा। 2. डायवर्जन व्यवस्था जुलूस का अगला सिरा जालोरी गेट पहुंचने पर शनिश्चरजी का थान और पांचवीं रोड की ओर से आने वाले यातायात को सरदारपुरा की ओर मोड़ा जाएगा। नई सड़क से जालोरी गेट की ओर जाने वाले वाहनों को पुरी तिराहा, रेलवे स्टेशन, ओलम्पिक तिराहा, तारघर मोड़, मेहता भवन और जलजोग होते हुए 12वीं रोड की ओर डायवर्ट किया जाएगा। विशेष छूट: मरीजों के अस्पताल आने-जाने पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। 3. प्रमुख बाजारों में प्रतिबंध जालोरी गेट से आड़ा बाजार, सिरे बाजार, घण्टाघर और नई सड़क तक सभी प्रकार के वाहनों का प्रवेश बंद रहेगा। 4. आंशिक सामान्य यातायातजुलूस का पिछला हिस्सा जालोरी गेट पार करने के बाद शनिश्चरजी का थान से नई सड़क चौराहा और विपरीत दिशा में यातायात सामान्य रूप से चालू रहेगा। 5. घण्टाघर क्षेत्र में प्रतिबंध जुलूस के घण्टाघर पहुंचने पर जवाहर खाना मोड़, पन्ना निवास और द्वितीय पोल पुलिस चौकी से घण्टाघर तक वाहनों का आवागमन पूरी तरह बंद रहेगा। प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था इस आयोजन को देखते हुए पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। शहर के प्रमुख चौराहों और जुलूस मार्ग पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था से तुरंत निपटा जा सके। लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण फगड़ा-घुड़ला भौलावणी गणगौर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह आयोजन पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है, जिसमें हर वर्ग और हर आयु के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह संदेश देता है कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजकर रखना कितना महत्वपूर्ण है।

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शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब, ‘जय श्री राम’ के जयकारों से गूंजा शहर

सिरोही। दोपहर बाद हिंदू महोत्सव समिति के तत्वावधान में भगवान राम-जानकी की आरती की गई। इसके पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अपने लाव-लश्कर के साथ भक्तों को दर्शन देने के लिए रामझरोखा मंदिर से भव्य शोभायात्रा के रूप में निकले। शोभायात्रा में सबसे आगे रामदूत हनुमान चल रहे थे, जो भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। इसके पीछे भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की सुसज्जित झांकियां रथ पर विराजमान थीं। यह शोभायात्रा भाटकड़ा सर्कल से प्रारंभ होकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए आगे बढ़ी। शोभायात्रा का मार्ग संपूर्णानंद कॉलोनी, बसस्टैंड रोड, सरजावाव दरवाजा, खंडेलवाल मंदिर, सदर बाजार, मोचीवाड़ा एनसीसी सर्कल, आर्य समाज रोड, घांचीवाड़ा और पैलेस रोड होते हुए अंत में श्रीराम मंदिर पर जाकर समाप्त हुआ। करीब 5 किलोमीटर लंबे इस मार्ग को तय करने में शोभायात्रा को लगभग साढ़े चार घंटे से अधिक समय लगा। पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं ने फूल वर्षा कर भगवान श्रीराम का स्वागत किया। शोभायात्रा में भक्ति और उत्साह का अनोखा संगम देखने को मिला। डीजे पर बजते भक्ति गीतों, बैंड की मधुर धुनों और ढोल-नगाड़ों की थाप पर युवा झूमते नजर आए। भगवा साफा और पारंपरिक परिधान पहने श्रद्धालु हाथों में भगवा ध्वज लेकर नाचते-गाते हुए शोभायात्रा में शामिल हुए। जगह-जगह भजन मंडलियों द्वारा सुंदर भजनों की प्रस्तुतियां दी गईं, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा। इस शोभायात्रा की सबसे खास बात भगवान राम की 18 फीट ऊंची और हनुमान की 15 फीट ऊंची मूर्तियां रहीं, जो आमजन के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनीं। इसके अलावा दिल्ली से आए कलाकारों द्वारा प्रस्तुत 8 फीट ऊंचे बजरंगबली का जीवंत स्वरूप भी लोगों को मंत्रमुग्ध करता रहा। श्रद्धालु इन झांकियों के साथ फोटो और वीडियो बनाते नजर आए। झांकियों ने दर्शाया सांस्कृतिक वैभव शोभायात्रा में शहर की 22 बस्तियों, विभिन्न समाजों, विद्यालयों और छात्रावासों की ओर से 55 से अधिक आकर्षक झांकियां शामिल की गईं। इन झांकियों में भगवान राम के जीवन प्रसंगों, रामायण की घटनाओं और भारतीय संस्कृति के विविध रूपों का सुंदर चित्रण किया गया। हर झांकी अपने आप में एक अलग संदेश और प्रस्तुति लेकर आई थी, जिसे देखने के लिए मार्ग के दोनों ओर खड़े श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। इस शोभायात्रा में केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों और शहरों की सांस्कृतिक झलक भी देखने को मिली। नासिक की प्रसिद्ध ढोल पार्टी ने अपनी जोशीली धुनों से माहौल को ऊर्जावान बना दिया। बालोतरा का पारंपरिक गैर नृत्य लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। 15 से अधिक भजन मंडलियों ने पूरे मार्ग में भक्ति रस की धारा बहाई। सुरक्षा बंदोबस्त माकूल रहे इतने बड़े आयोजन को सफल बनाने के लिए प्रशासन और पुलिस विभाग की ओर से विशेष इंतजाम किए गए थे। शहर के प्रमुख चौराहों और मार्गों पर पुलिस बल तैनात रहा। ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए वैकल्पिक मार्ग निर्धारित किए गए थे। साथ ही चिकित्सा और आपातकालीन सेवाओं की भी व्यवस्था की गई थी, ताकि किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। सामाजिक समरसता और एकता का संदेश रामनवमी का यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सामाजिक समरसता और एकता का भी संदेश दिया। विभिन्न समाजों और वर्गों के लोग एक साथ मिलकर इस आयोजन में शामिल हुए। हर वर्ग, हर आयु और हर क्षेत्र के लोगों ने मिलकर इस आयोजन को सफल बनाया, जिससे समाज में भाईचारे और एकजुटता की भावना मजबूत हुई। देर शाम शोभायात्रा श्रीराम मंदिर पहुंचकर संपन्न हुई। पूरे दिन चले इस आयोजन ने सिरोही शहर को पूरी तरह राममय बना दिया।

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रामनवमी पर जन्मे घनश्याम दास बिड़ला: कैसे खड़ा हुआ 67 अरब डॉलर का साम्राज्य

राम नवमी का पर्व भारत में आस्था और परंपरा का प्रतीक है, लेकिन यह दिन भारतीय उद्योग जगत के लिए भी ऐतिहासिक महत्व रखता है। इसी शुभ दिन 1894 में घनश्याम दास बिड़ला का जन्म हुआ, जिन्होंने भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक बिड़ला ग्रुप की नींव रखी। 🏭 शुरुआत: कपड़े के व्यापार से औद्योगिक साम्राज्य तक बिड़ला परिवार की व्यावसायिक यात्रा की शुरुआत सेठ शिव नारायण बिड़ला ने की थी, लेकिन इसे नई ऊंचाई देने का काम जीडी बिड़ला ने किया। राजस्थान के पिलानी से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे देश के बड़े उद्योगों में बदल गया। 🤝 गांधीजी से मुलाकात और राष्ट्र निर्माण 1912 में महात्मा गांधी से मुलाकात के बाद जीडी बिड़ला केवल उद्योगपति नहीं रहे, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के समर्थक भी बने। उन्होंने शिक्षा, समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण में बड़ा योगदान दिया। 🏗️ स्वतंत्रता के बाद विस्तार स्वतंत्रता के बाद बिड़ला ग्रुप ने सीमेंट, एल्युमीनियम, टेक्सटाइल, केमिकल और माइनिंग जैसे क्षेत्रों में तेजी से विस्तार किया। यह वह दौर था जब भारत को बुनियादी उद्योगों की जरूरत थी और बिड़ला ग्रुप ने इस कमी को पूरा किया। 🌍 तीसरी पीढ़ी: आदित्य विक्रम बिड़ला का वैश्विक विस्तार 1969 में आदित्य विक्रम बिड़ला ने थाईलैंड में इंडो-थाई सिंथेटिक्स की शुरुआत की। यह भारतीय कंपनियों के ग्लोबल बनने की शुरुआत थी। उन्होंने ग्रुप को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। 👔 कुमार मंगलम बिड़ला का नेतृत्व अपने पिता के निधन के बाद 28 साल की उम्र में कुमार मंगलम बिड़ला ने ग्रुप की कमान संभाली। उन्होंने 60 से अधिक अधिग्रहण किए और कंपनी को 40 देशों में फैलाया। आज यह 67 बिलियन डॉलर का साम्राज्य है। 🏏 चौथी पीढ़ी: नए युग की शुरुआत अब बिड़ला परिवार की चौथी पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है। 🔹 आर्यमन बिड़ला आर्यमन बिड़ला ने हाल ही में IPL टीम Royal Challengers Bengaluru (RCB) खरीदकर बड़ा कदम उठाया। वह अब टीम के चेयरमैन हैं। 🎤 अनन्या बिड़ला अनन्या बिड़ला ने 17 साल की उम्र में माइक्रोफाइनेंस कंपनी शुरू की और साथ ही एक सफल सिंगर के रूप में पहचान बनाई। 🏁 निष्कर्ष रामनवमी पर जन्मे एक दूरदर्शी व्यक्ति ने जो बीज बोया, वह आज चार पीढ़ियों की मेहनत से विशाल वटवृक्ष बन चुका है।

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