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कलम की क्रांति: सावित्रीबाई फुले ने बदली भारत की सोच

विशेष संवाददाता भूपेंद्र माली की एक खास रिपोर्ट सिरोही। भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी गूंज सदियों तक सुनाई देती है। उन महान विभूतियों में एक नाम है सावित्रीबाई फुले एक ऐसी महिला, जिन्होंने न केवल अपने समय की रुढियों को चुनौती दी, बल्कि समाज में शिक्षा, समानता और महिलाओं के अधिकारों की नई इबारत भी लिखी। आज जब हम महिला सशक्तिकरण और शिक्षा की बात करते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि इस क्रांति की नींव बहुत पहले रखी जा चुकी थी। उस नींव की पहली ईंट रखने वाली थीं सावित्रीबाई फुले है। प्रारंभिक जीवन, संघर्षों से भरी शुरुआत सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उस समय भारत में महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें शिक्षा से दूर रखा जाता था और समाज में उनकी भूमिका केवल घर तक सीमित मानी जाती थी। कम उम्र में ही उनका विवाह महात्मा ज्योतिराव फुले से हुआ। यह विवाह उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। ज्योतिराव फुले स्वयं एक प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी पत्नी को शिक्षित करने का निर्णय लिया जो उस दौर में एक क्रांतिकारी कदम था। सावित्रीबाई फुले ने अपने पति से पढऩा-लिखना सीखा और जल्द ही उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझ लिया। उन्होंने यह महसूस किया कि अगर समाज को बदलना है, तो सबसे पहले महिलाओं को शिक्षित करना होगा। 1848 में, सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने पुणे में भारत का पहला बालिका विद्यालय शुरू किया। यह कदम उस समय के लिए अभूतपूर्व था। समाज के रुढिवादी लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तो लोग उन पर पत्थर, गोबर और कीचड़ फेंकते थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वह एक अतिरिक्त साड़ी लेकर घर से निकलती थीं ताकि स्कूल पहुंचकर कपड़े बदल सकें और पढ़ाना जारी रख सकें। सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका कहा जाता है। उन्होंने केवल एक स्कूल ही नहीं, बल्कि कई विद्यालय खोले। उन्होंने दलित और पिछड़े वर्ग की लड़कियों को भी शिक्षा देने का कार्य किया जो उस समय एक बड़ा सामाजिक अपराध माना जाता था। उनकी शिक्षा नीति समानता और स्वतंत्रता पर आधारित थी। उनका मानना था कि शिक्षा ही वह हथियार है, जिससे समाज में फैले अज्ञानता और भेदभाव को खत्म किया जा सकता है। सावित्रीबाई फुले का योगदान केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज में व्याप्त कई कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। बाल विवाह और सती प्रथा के खिलाफ संघर्ष उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया और विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह का समर्थन किया। उस समय विधवाओं को बहुत ही कठोर जीवन जीना पड़ता था। सावित्रीबाई ने उनके लिए आश्रय स्थल भी बनाए। उन्होंने दलितों और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए भी संघर्ष किया। उन्होंने समाज में समानता का संदेश दिया और जातिगत भेदभाव के खिलाफ आंदोलन चलाया। उन्होंने एक ऐसा केंद्र शुरू किया जहां विधवा महिलाएं अपने बच्चों को जन्म दे सकती थीं और उन्हें सुरक्षित रख सकती थीं। यह उस समय एक बहुत बड़ा कदम था, क्योंकि समाज में विधवाओं को अपमान और बहिष्कार का सामना करना पड़ता था। सावित्रीबाई फुले केवल एक समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवयित्री भी थीं। उनकी कविताओं में शिक्षा, समानता और मानवता का संदेश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनकी प्रमुख कृतियों में काव्य फुले और बावन काशी सुबोध रत्नाकर शामिल हैं। उनकी रचनाएं लोगों को जागरूक करने और समाज में बदलाव लाने का माध्यम बनीं। प्लेग महामारी में सेवा 1897 में पुणे में प्लेग की महामारी फैली। उस समय जब लोग संक्रमित मरीजों से दूर भाग रहे थे, सावित्रीबाई फुले ने आगे बढक़र उनकी सेवा की। उन्होंने अपने दत्तक पुत्र के साथ मिलकर मरीजों के लिए एक अस्पताल खोला। वह स्वयं मरीजों को अपने कंधे पर उठाकर अस्पताल लाती थीं। इसी सेवा के दौरान उन्हें प्लेग हो गया और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवन का अंतिम क्षण भी मानव सेवा में ही बिताया। आज सावित्रीबाई फुले को भारत में महिला शिक्षा की जननी के रूप में सम्मानित किया जाता है। उनके सम्मान में कई विश्वविद्यालय, संस्थान और योजनाएं चलाई जा रही हैं। हर साल 3 जनवरी को उनका जन्मदिन महिला शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन हमें उनके संघर्षों और योगदान को याद दिलाता है। आज भले ही समाज में काफी बदलाव आ गया हो, लेकिन शिक्षा और समानता के क्षेत्र में अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है। सावित्रीबाई फुले के विचार आज भी हमें प्रेरित करते हैं कि हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए। महिलाओं को समान अवसर मिलने चाहिए। समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें सिखाता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो किसी भी मुश्किल को पार किया जा सकता है। उन्होंने समाज की जंजीरों को तोडक़र एक नई राह दिखाई एक ऐसी राह, जिस पर चलकर आज लाखों महिलाएं अपने सपनों को साकार कर रही हैं। उनकी कहानी केवल इतिहास नहीं है, बल्कि एक प्रेरणा है एक ऐसी प्रेरणा, जो हमें आगे बढऩे और समाज को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती है। सावित्रीबाई फुले केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक आंदोलन हैं शिक्षा, समानता और मानवता का आंदोलन।

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अद्वैत दर्शन भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण एवं प्राचीन दर्शनशास्त्र है

नई दिल्ली, : अद्वैत दर्शन भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण एवं प्राचीन दर्शनशास्त्र है, जिसकी उत्पत्ति वेदांत शास्त्रों में हुई। इस दर्शन के अनुसार, ब्रह्म और आत्मा एक ही हैं, और संसार में जो विविधता दिखाई देती है, वह मायाजाल मात्र है। अद्वैत दर्शन के प्रमुख प्रतिपादक आदि शंकराचार्य हैं, जिन्होंने इस दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई। अद्वैत दर्शन का मूल मंत्र ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ से समझा जा सकता है, जिसका अर्थ है कि सच्चाई एक है, लेकिन विद्वान उसे कई रूपों में प्रकट करते हैं। इस दर्शन के अनुसार, परम सत्ता ब्रह्म ही सर्वोच्च सत्य है और जगत का कोई भी चीज़ स्थायी नहीं है। संसार की विभिन्नता केवल माया के प्रभाव से उत्पन्न होती है, जो हमें वास्तविकता को नहीं समझने देती। विद्वानों का मानना है कि अद्वैत दर्शन ने भारतीय दर्शनशास्त्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया। इसने आत्मा और ब्रह्म के बीच के अंतर को समाप्त कर एकता की भावना को बढ़ावा दिया। इसके अलावा, इस दर्शन ने भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग को संतुलित तरीके से प्रस्तुत किया, जिससे आध्यात्मिक साधना में आसानी हुई। आधुनिक भारत में भी अद्वैत दर्शन का महत्व कम नहीं हुआ है। कई विश्वविद्यालयों में यह दर्शनशास्त्र का एक अनिवार्य विषय है। इसके अधिकारिक अध्ययन से विद्यार्थियों को न केवल दार्शनिक ज्ञान मिलता है, बल्कि जीवन जीने की एक नई सोच भी मिलती है। कई समकालीन विचारक और योग गुरु इस दर्शन को अपनी शिक्षाओं का आधार मानते हैं। अद्वैत दर्शन आज भी लोगों के मन में अध्यात्मिक एवं दार्शनिक प्रश्नों के उत्तर खोजने का मार्ग प्रशस्त करता है। यह दर्शन एक ऐसी जीवनशैली और सोच प्रदान करता है, जो व्यक्ति और ब्रह्म के बीच के संबंध को गहरा करता है। परिणामस्वरूप, अद्वैत दर्शन वर्तमान युग में भी प्रासंगिक एवं प्रभावशाली बना हुआ है। इस प्रकार, अद्वैत दर्शन केवल एक शास्त्रीय संकल्पना नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकता को समझने का एक प्रभावशाली मार्ग है, जो आज के समय में भी विज्ञान, दर्शन और आध्यात्म के क्षेत्र में अपना महत्व बनाए हुए है।

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दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 1000 बेटियों को साइकिलें वितरित कीं, कन्या पूजन कार्यक्रम में पढ़ाई का संदेश

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बृहस्पतिवार को पीतमपुरा स्थित सर्वोदय विद्यालय में सामूहिक कन्या पूजन कार्यक्रम में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने 9 स्कूलों की लगभग 1000 छात्राओं को साइकिलें वितरित कीं, जिससे छात्राओं के स्कूल आने-जाने में सुविधा होगी और पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आएगी। मुख्यमंत्री ने छात्राओं से संवाद करते हुए उनकी पढ़ाई, स्कूल आने-जाने में होने वाली दिक्कतों और भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार ऐसे कदम उठा रही है जिससे बेटियों को आगे बढ़ने में मदद मिले। साइकिल वितरण से स्कूल जाने में सहूलियत इस अवसर पर छात्राओं ने मुख्यमंत्री से कहा कि साइकिल मिलने से स्कूल पहुंचना आसान होगा। वे इसका उपयोग ट्यूशन जाने, स्कूल की पढ़ाई और घर के छोटे-मोटे कामों में सामान लाने के लिए भी कर सकेंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देना सरकार की प्राथमिकता है। इस दिशा में यह कदम छात्राओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाला है। नवजात शिशु माताओं के लिए बेबी किट कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने नवजात शिशुओं की माताओं को भी बेबी किट वितरित की। इसमें शिशु देखभाल से जुड़ी आवश्यक वस्तुएं शामिल थीं। इससे माताओं को बच्चों की प्रारंभिक देखभाल में मदद मिलेगी। कार्यक्रम का आयोजन सर्वोदय विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में स्कूल के शिक्षक, अभिभावक और बड़ी संख्या में छात्राएं उपस्थित रहीं। छात्राओं में उत्साह देखने को मिला और उन्होंने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा और छात्राओं के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ऐसे कदम लगातार उठाएगी। कन्या पूजन का महत्व कन्या पूजन कार्यक्रम का आयोजन सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से समाज में बेटियों के सम्मान और उनके अधिकारों की जागरूकता बढ़ती है। मुख्यमंत्री ने छात्राओं को यह भी बताया कि शिक्षा के माध्यम से ही वे अपने भविष्य को सुरक्षित और उज्जवल बना सकती हैं। सरकार की पहल और भविष्य की योजनाएं सीएम रेखा गुप्ता ने कहा कि बेटियों की शिक्षा और सशक्तिकरण को सरकार उच्च प्राथमिकता दे रही है। साइकिल वितरण जैसी पहल से उन्हें पढ़ाई में बाधा नहीं आएगी और उनकी स्कूल उपस्थिति में सुधार होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भविष्य में और भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित करेगी, जिससे छात्राओं को सीखने और आगे बढ़ने के अवसर मिलें। अभिभावकों और शिक्षकों की भागीदारी कार्यक्रम में अभिभावकों और शिक्षकों ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि साइकिल मिलने से छात्राओं की स्कूल उपस्थिति बढ़ेगी और घर के काम-काज में मदद भी मिलेगी। छात्राओं ने मुख्यमंत्री का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह कदम उनके जीवन में बड़ा बदलाव लाएगा। छात्राओं का उत्साह और प्रतिक्रिया छात्राओं में उत्साह का माहौल देखने को मिला। उन्होंने कहा कि अब स्कूल आना-जाना आसान होगा और पढ़ाई में मन लगा रहेगा। छात्राओं ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि ऐसी पहल आगे भी जारी रहे। मुख्यमंत्री ने सभी छात्राओं से यह भी कहा कि शिक्षा के माध्यम से वे अपने सपनों को साकार कर सकती हैं। निष्कर्ष पीतमपुरा में आयोजित कन्या पूजन कार्यक्रम और साइकिल वितरण अभियान ने छात्राओं के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डाला। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की पहल से दिल्ली की बेटियों को शिक्षा में बाधा नहीं आने देगी। सरकार के इस कदम से छात्राओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे भविष्य में अधिक सशक्त बनेंगी। कार्यक्रम में नवजात शिशुओं की माताओं को बेबी किट वितरण से माताओं की भी मदद हुई। इस प्रकार, शिक्षा और बालिकाओं के सशक्तिकरण के क्षेत्र में यह कार्यक्रम महत्वपूर्ण साबित हुआ है।

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जैसलमेर में दिखा दुर्लभ कैरेकल का कुनबा, रेडियो कॉलर से खुल रहे रहस्य

जैसलमेर। भारत की जैव विविधता दुनिया में सबसे समृद्ध मानी जाती है, लेकिन इसी विविधता के बीच कुछ ऐसी प्रजातियां भी हैं जो धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही हैं। ऐसी ही एक रहस्यमयी और दुर्लभ प्रजाति है कैरेकल बिल्ली, जिसे आमतौर पर रेगिस्तानी लिंक्स भी कहा जाता है। इसकी तेज रफ्तार, अद्भुत छलांग लगाने की क्षमता और विशिष्ट काले कानों की लटें इसे अन्य जंगली बिल्लियों से अलग बनाती हैं। राजस्थान के जैसलमेर जिले में दुर्लभ वन्यजीव कैरेकल को लेकर बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और वन विभाग की संयुक्त पहल के तहत इस रहस्यमयी बिल्ली पर लगातार रिसर्च की जा रही है। हाल ही में घोटारू क्षेत्र में रेडियो कॉलर और मोशन सेंसिंग कैमरे की मदद से कैरेकल का पूरा कुनबा कैमरे में कैद हुआ है। यह न केवल वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से बड़ी सफलता है, बल्कि इससे इस विलुप्तप्राय प्रजाति के व्यवहार और अस्तित्व को समझने में भी मदद मिलेगी। कैरेकल एक बेहद दुर्लभ और शर्मीली जंगली बिल्ली है, जो मुख्य रूप से अफ्रीका, मध्य एशिया और भारत के कुछ सीमित क्षेत्रों में पाई जाती है। भारत में इसकी मौजूदगी बेहद कम हो चुकी है और यह अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है। इसकी पहचान इसके लंबे काले बालों वाले कान, फुर्तीले शरीर और तेज शिकार करने की क्षमता से होती है। हालांकि यह असली लिंक्स प्रजाति से अलग है। जैसलमेर के घोटारू इलाके में लगाए गए मोशन सेंसिंग कैमरे ने एक बेहद खास पल को कैद किया कैरेकल का पूरा कुनबा एक साथ नजर आया। यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कैरेकल आमतौर पर अकेले रहने वाला जीव माना जाता है। वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरों और रेडियो कॉलर से यह पहली बार स्पष्ट रूप से सामने आया है कि इस क्षेत्र में कम से कम तीन कैरेकल मौजूद हैं। इससे पहले इनकी संख्या को लेकर केवल अनुमान ही लगाए जाते थे। वन विभाग ने करीब 7 दिन पहले एक कैरेकल पर रेडियो कॉलर लगाया था। इस कॉलर की मदद से वैज्ञानिक और वन अधिकारी उसके मूवमेंट, व्यवहार और शिकार के पैटर्न पर नजर रख पा रहे हैं। हाल के वर्षों में भारत के कुछ हिस्सों, विशेषकर राजस्थान और गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में इसके देखे जाने की खबरें सामने आई हैं, जिससे वन्यजीव प्रेमियों और वैज्ञानिकों में उत्साह तो है, लेकिन इसकी घटती संख्या चिंता का विषय भी बन गई है।कैरेकल एक मध्यम आकार की जंगली बिल्ली है जो अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। भारत में यह बेहद दुर्लभ है और मुख्यत: पश्चिमी भारत के सूखे और अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में ही देखी जाती है। वह किस प्रकार के शिकार को प्राथमिकता देता है। रेगिस्तानी परिस्थितियों में वह कैसे जीवित रहता है वन विभाग अब इस दुर्लभ जीव को बचाने के लिए पूरी तरह सक्रिय हो गया है। मुख्य वन संरक्षक जोधपुर, अनूप के. आर. के अनुसार, जैसलमेर वन विभाग की टीम लगातार कैमरा ट्रैप के जरिए कैरेकल की निगरानी कर रही है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें लोगों को बताया जा रहा है कि कैरेकल का शिकार करना कानूनन अपराध है। यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सख्त दंडनीय है।  

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वन्यजीवों के हलक तर करने पहुंचा एक लाख लीटर पानी

वन्यजीवों के हलक तर करने पहुंचा एक लाख लीटर पानी 26 टैंकरों के माध्यम से पहल ग्रुप का सराहनीय कार्य सिरोही। शहर में मानवता और प्रकृति प्रेम की एक प्रेरणादायक मिसाल देखने को मिली है। भीषण गर्मी के बीच वन्यजीवों की प्यास बुझाने के लिए पहल ग्रुप सिरोही ने एक बार फिर सराहनीय कदम उठाया है। हर साल की तरह इस वर्ष भी ग्रुप के सदस्यों ने वाडा खेड़ा जोड़ क्षेत्र में स्थित नाड़ी में पानी की व्यवस्था कर वन्यजीवों को बड़ी राहत दी है। पहल ग्रुप के सदस्यों की ओर से एक साथ 26 पानी के टैंकरों के माध्यम से लगभग एक लाख लीटर पानी वाडा खेड़ा की नाड़ी में डाला गया। गर्मी के मौसम में जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में पानी के स्रोत सूखने लगते हैं, ऐसे में यह प्रयास वन्यजीवों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रहा है। केवल पानी की ही व्यवस्था नहीं की गई, बल्कि वन्यजीवों के भोजन का भी ध्यान रखा गया। ग्रुप की ओर से ककड़ी, गाजर और आलू जैसी खाद्य सामग्री भी वहां रखवाई गई, ताकि गर्मी के दिनों में पानी के साथ-साथ वन्यजीवों को भोजन भी मिल सके। ग्रुप के सदस्यों ने बताया कि यह अभियान सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं रहेगा। आज से अगले करीब तीन महीनों तक प्रतिदिन एक पानी का टैंकर इस नाड़ी में डलवाया जाएगा, जिससे भीषण गर्मी के दौरान वन्यजीवों को पानी की कमी का सामना न करना पड़े। सालभर समाजसेवा में सक्रिय रहता है पहल ग्रुप पहल ग्रुप केवल गर्मियों में पानी की व्यवस्था तक ही सीमित नहीं है। यह समूह पूरे साल विभिन्न सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाता है। ग्रुप की ओर से शहर में जरूरतमंद लोगों, पशुओं और वन्यजीवों की सहायता के लिए समय-समय पर कई पहल की जाती हैं। शहर में जगह-जगह लगाए गए पानी के कैंपर गर्मी के मौसम में आमजन को राहत देने के लिए शहर के अलग-अलग स्थानों पर लगाए गए पानी के कैंपर भी इसी ग्रुप की पहल का परिणाम हैं। इन कैंपरों से राहगीरों और जरूरतमंद लोगों को पीने का ठंडा पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। पहल ग्रुप का संचालन सहायक उप निरीक्षक सचेंद्र रतनू के नेतृत्व में किया जा रहा है। इस समूह में करीब 95 सदस्य जुड़े हुए हैं। सभी सदस्य हर महीने स्वेच्छा से अंशदान एकत्रित करते हैं और इसी राशि से सामाजिक व सेवा कार्यों को अंजाम दिया जाता है। यह राशि वन्यजीवों, गायों और जरूरतमंद असहाय लोगों की मदद में खर्च की जाती है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सदस्य रहे मौजूद वन्यजीवों के लिए पानी की व्यवस्था के इस कार्यक्रम में ग्रुप के सभी सदस्यों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस दौरान सचेंद्र रतनू, भेरूपाल सिंह (अधिवक्ता), हेमंत पुरोहित, हरदयाल सिंह, शैतान खरोर, गणपत लाल, अमजद खान, सज्जन सिंह, एम.पी. सिंह, करण सिंह, अशोक माली, हनुमान प्रजापत, दिग्विजय सिंह, तख्तसिंह पुरोहित, भरत माली, विनोद मालवीय, मुकेश खंडेलवाल, कमलेश सोनी, महादेव, प्रदीप वैष्णव, मंछाराम, किशन माली, भंवर माली, लालचंद खंडेलवाल, राहुल माली, अशोक माली, भैराराम और मांगीलाल रावल सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे। पहल ग्रुप का यह प्रयास न केवल वन्यजीवों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि समाज के सामने सेवा, संवेदना और प्रकृति संरक्षण का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। ऐसे कार्य यह संदेश देते हैं कि यदि समाज के लोग मिलकर पहल करें, तो पर्यावरण और जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए बड़े बदलाव संभव हैं।

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10 मार्च को मनाई जाएगी शीतला सप्तमी, 9 मार्च को रांधन छठ

सिरोही। शीतला सप्तमी अर्थात चैत्र कृष्ण सप्तमी मंगलवार तथा रांधण छठ- चैत्र कृष्ण षष्ठी सोमवार को मान्य रहेगी। ज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे एवं शीतला माता मंदिर पुजारी ओमप्रकाश वैष्णव ने बताया कि शीतला माता पूजन का शुभ मुहूर्त प्रात: 4-15 से 9-01, 9-52 से 2-16, सायं 3-44 से 5-12 बजे एवं सायं गोधुलिक वेला में 06-32 से रात्रि 09-10 तक श्रेष्ठ है, साथ ही इस बार वीदर (बिच्छुडा) पेटा में होने एवं मंगलवार सुषुप्त होने तथा सप्तमी तिथि पूजन की मान्यता होने से सप्तमी तिथि को पूरे दिन पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा।इस समय बनाए बासोड़ाशीतला माता का महाप्रसाद (भोग) बनाने का शुभ मुहूर्त चैत्र कृष्ण षष्ठी (रांधण षठ) सोमवार प्रात: शुभ वेला में 6-57 से 8-25, 9-53 से 11-21, मध्यान्ह 12-25 से 01-12 अभिजित मुहुर्त एवं सायं 04-16 से 06-40 बजे तक शुभ वेला में श्रेष्ठ रहेगा।शीतला माताजी के पूजन के विशेष नियमशीतला माता को ज्योत नहीं होती है। कपूर व अगरबत्ती नहीं जलाना चाहिए। दही, म_ा, छाछ आदि खाने-पीने की सामग्री माताजी के सामने प्रसाद के रुप में चढाई जाती है। अत: खाने-पाने पीने की सामग्री माताजी के सिर पर गिरानी या ढोलनी नहीं चाहिए। परिवार की सुरक्षा के लिए श्रीफल हमेशा अखण्ड चढता है अत: श्रीफल या नारियल को तोड़ कर नहीं चढाएं। श्रीफल (नारियल) पर यथाशक्ति भेंट रख कर माताजी को अर्पण करने से समृद्धता बढती है तथा अकाल मृत्यु का नाश होता है। शीतला माता के हाथ में झाडू है, इसका मतलब बीमारियों की रोकथाम के लिए स्वच्छता का ध्यान रखना जरुरी हैबासी भोजन का वैज्ञानिक महत्ववैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो इस मौसम में खाना एक या दो दिन पड़ा रहता है तो खाने पर फफूंद लगनी शुरु हो जाती है। वैज्ञानिक इस फफूंद को ‘पेनासिलीन’ नाम से पुकारते हैं। इस फफूंद को माइक्रोस्कोप द्वारा आसानी से देखा जा सकता है। इस प्रकार प्राकृतिक रुप से पैदा हुई फफूंद शरीर में जाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा होती है। जिससे चेचक, घमोरिया, फोड़े-फुन्सी व गर्मी जनित बीमारियां नहीं होती है। आजकल इस फफूंद के इंजेक्शन बाजार में पेनिसिलिन के नाम से उपलब्ध है। जबकि प्राचीन काल से ऐसी मान्यता चली आ रही है कि शीतला माता व ओरी माता को प्रसन्न करने से चेचक नहीं होती है। आज भी माताजी के मंदिर में जाकर शीतला व ओरी माता का पूजन कर बासोड़े का भोग लगाते है।

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विशेष आयोजन समाचार: राष्ट्रीय और सामाजिक कार्यक्रमों से जुड़ी अहम गतिविधियाँ

विशेष आयोजन समाचार समाज, देश और संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की जानकारी प्रदान करता है। राष्ट्रीय पर्वों से लेकर सामाजिक, सांस्कृतिक और सरकारी आयोजनों तक—ये सभी कार्यक्रम समाज को जोड़ने और जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। विशेष आयोजनों के माध्यम से लोगों को परंपरा, उद्देश्य और सामूहिक सहभागिता का अनुभव मिलता है। राष्ट्रीय और सरकारी विशेष आयोजन देशभर में समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर पर कई विशेष आयोजन किए जाते हैं। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, राष्ट्रीय अभियान, सरकारी योजनाओं के शुभारंभ और जनजागरूकता कार्यक्रम—ये सभी विशेष आयोजन समाचार के प्रमुख विषय होते हैं। ऐसे आयोजनों का उद्देश्य जनता को नीति, विकास और राष्ट्र निर्माण से जोड़ना होता है। सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम समाज में होने वाले सांस्कृतिक महोत्सव, सामाजिक सम्मेलन, पुरस्कार समारोह और जागरूकता अभियान भी विशेष आयोजन की श्रेणी में आते हैं। विशेष आयोजन समाचार के अनुसार, ऐसे कार्यक्रम सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और सकारात्मक संदेश को आगे बढ़ाते हैं। धार्मिक और सामुदायिक आयोजन धार्मिक उत्सव, सामुदायिक कार्यक्रम और लोक परंपराओं से जुड़े आयोजन भी लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़े होते हैं। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी देखने को मिलती है, जिससे सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है। युवाओं और समाज पर प्रभाव विशेष आयोजनों का युवाओं और समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ये कार्यक्रम नेतृत्व, सहभागिता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देते हैं। विशेष आयोजन समाचार युवाओं को प्रेरित करता है कि वे ऐसे कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाएं। भविष्य में विशेष आयोजनों की भूमिका आने वाले समय में विशेष आयोजन और अधिक संगठित, डिजिटल और व्यापक स्वरूप में देखने को मिलेंगे। ऑनलाइन प्रसारण, सोशल मीडिया कवरेज और जनसहभागिता से इन आयोजनों की पहुंच और प्रभाव बढ़ेगा। निष्कर्ष कुल मिलाकर, विशेष आयोजन समाचार समाज और देश से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को एक मंच पर लाता है। ये आयोजन न केवल सूचना प्रदान करते हैं, बल्कि लोगों को जोड़ने, जागरूक करने और सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम भी बनते हैं।

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