
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पितृ अवकाश को लेकर नई दिशानिर्देशों की मांग की है। यह विषय सामाजिक और पारिवारिक बदलाव के संदर्भ में विशेष अहमियत रखता है, जिसके तहत पुरुषों को भी मातृत्व अवकाश की तरह पितृत्व अवकाश प्रदान किया जाना चाहिए। पितृत्व अवकाश पर इस बहस को लेकर प्रसिध्द पोडकास्ट होस्ट, प्रिसिला जेबराज ने विशेषज्ञ प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे और संजय घोष के साथ इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा की।
प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे ने कहा कि भारत में पारंपरिक सोच में पुरुषों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र तक सीमित मानी जाती है, जबकि परिवार में उनकी भूमिका को कम माना जाता है। पितृत्व अवकाश से न केवल पिता और बच्चे के बीच मजबूत बंधन बनेगा, बल्कि महिलाओं के कार्यस्थल पर बने रहने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। उन्होंने यह भी बताया कि सामाजिक संरचना में बदलाव के लिए कानूनी संरक्षण आवश्यक है, जो पितृत्व अवकाश को मान्यता और लागू करवाएगा।
वहीं, संजय घोष ने इस पहल को स्वागत योग्य बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में जब भारतीय परिवार तेजी से बदल रहे हैं, तब पितृत्व अवकाश एक ऐसा कदम है जो परिवारों में संतुलन लाने में मदद करेगा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यस्थल प्रशासन एवं नीतियां भी इस बदलाव के अनुकूल होनी चाहिए, जिससे पिता अपनी जिम्मेदारियां आराम से निभा सकें।
यह विवादास्पद विषय सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ कानून एवं कार्य संस्कृति में सुधार की मांग करता है। भारत ने मातृत्व अवकाश के क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन पितृत्व अवकाश की कमी ने पुरुषों की पारिवारिक भागीदारी को सीमित रखा है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि वह न केवल पितृत्व अवकाश के लिए मान्यता सुनिश्चित करेगा, बल्कि इससे कार्यस्थल की लिंग समानता को भी बल मिलेगा।
हालांकि, पितृत्व अवकाश को लेकर कई दफे बहस हुई है, पर अब इसे कानूनी रूप देने का प्रयास तेज हुआ है। यह बदलाव भारतीय समाज में पिता की भूमिका को नए अर्थ देने का प्रयास है, जो आने वाले समय में कार्य-संतुलन और परिवार की खुशहाली के लिए अहम साबित होगा।
समाज विशेषज्ञ और मानवाधिकार समूह भी सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का समर्थन कर रहे हैं और उम्मीद जताते हैं कि जल्द ही पितृत्व अवकाश भारत में औपचारिक तौर पर लागू हो। इससे कार्य क्षेत्र में समानता, पारिवारिक जिम्मेदारियों का पुनर्मूल्यांकन और बच्चों के लिए बेहतर पालन-पोषण के अवसर सुनिश्चित होंगे।
इस चर्चा में यह भी सामने आया कि पितृत्व अवकाश न केवल एक कानूनी अधिकार होना चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक स्वीकृति भी मिलनी चाहिए ताकि पारंपरिक सोच में बदलाव आए और परिवार के सभी सदस्य अपनी योग्य भूमिका निभा सकें।












