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कीलों पर सोकर खाटू श्याम के दर्शन को चला सोनू

मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के सबलगढ़ निवासी सोनू खाटूश्याम के लक्खी मेले में शरीक होने निकला। उसकी आस्था इस कदर है कि वह 21 सौ बड़ी कीलों पर सोकर आस्था का सफर कर रहा है। सोनू पिछले 4 दिनों से 2100 लोहे की कीलों पर पेट पलायन करते हुए रींगस से खाटूश्यामजी की ओर बढ़ रहा है। भक्ति की इस अनोखी साधना में कीलें करीब 5 इंच लंबी हैं, जिनका कुल वजन लगभग 26 किलोग्राम बताया जा रहा है। इन्हीं कीलों पर पेट पलायन करते हुए सोनू करीब 17 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर रहा है। श्याम भक्त सोनू ने बताया- वह पिछले 3 वर्षों से फाल्गुनी मेले में इसी तरह कठिन यात्रा कर बाबा श्याम के दरबार में हाजिरी लगा रहा है। इस वर्ष भी 6 दिन की यात्रा पूरी कर एकादशी पर बाबा श्याम के दर्शन करेगा। वह अभी खाटू मंदिर से 6-7 किलोमीटर दूर है।सोनू ने कहा- उसकी एक ही मनोकामना है हर वर्ष बाबा श्याम इसी तरह बुलाते रहे। उसकी इस अटूट आस्था और संकल्प को देखकर मार्ग में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो रहे हैं और जयकारों के साथ उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं।विश्व प्रसिद्ध बाबा श्याम का फाल्गुन मेला 21 फरवरी से शुरू हो गया। मेले के 5वें दिन विदेश से आए हरे और गुलाबी रंग के फूलों से बाबा श्याम का आकर्षक शृंगार किया गया। शृंगार में फूलों के साथ लाल वेलवेट के कपड़े पर गोल्डन क?ाई और गुलाबी कढाईदार गोटे का बागा पहनाया गया है। सुबह से मेले में बाबा श्याम के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ रही। सीकर में बाबा खाटूश्यामजी का फाल्गुनी लक्खी मेले में 5वें दिन रंगत देखने को मिल रही है। अब तक करीब साढे 5 लाख से ज्यादा भक्त बाबा श्याम के दर्शन कर चुके हैं। श्याम बाबा का हरे और गुलाबी फूलों से बुधवार को शृंगार किया गया। ये फूल विदेश से मंगाए गए।  श्याममयी भजनों के बीच जयकारे लगाते हुए श्याम बाबा के दर्शन करते हुए श्रद्धालु मन्नतें मांग रहे हैं। रींगस से खाटू तक निशान लेकर बढ रहे पदयात्रियों के बीच तिल रखने को भी जगह नहीं है। भीड़ बढने के कारण लखदातार ग्राउंड के जिगजैग खोल दिए गए हैं। इससे श्रद्धालुओं को करीब 2 किलोमीटर तक चक्कर लगाना पड़ रहा है। खाटू पहुंचने के बाद दर्शन करने में श्रद्धालुओं को 1 घंटे से भी कम समय लग रहा है। मंदिर परिसर को ऊं लिखे सफेद दुपट्टों से सजाया गया है। इसके नीचे चटख लाल रंग की झालरें लटकाई गई हैं। श्याम बाबा के दरबार में सभी 14 लाइनों में चलते हुए श्रद्धालु खाटूश्यामजी के दर्शन कर रहे हैं।

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गंगश्यामजी मंदिर: बसंत पंचमी से रंग पंचमी तक होली की मस्ती

जोधपुर। भीतरी शहर स्थित गंगश्यामजी मंदिर में फागोत्सव चरम पर है। यहां पूरे पैंतालिस दिन तक होली का जश्न चलता है। श्रद्धालुओं के साथ विदेशी सैलानी भी यहां होली खेलते है।मंदिर में उत्सव की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है और रंग पंचमी तक जारी रहती है। इस रंगारंग उत्सव में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और भक्ति के रंग में रंग जाते हैं। सबसे खास बात ये है कि मंदिर में 250 सालों से होली खेलने की परम्परा निभाई जा रही है।मंदिर के पुजारी बताते हैं कि सुबह 12 से 2 बजे तक गुलाल और पुष्पों से होली खेली जाती है, जबकि रात 8 से 11 बजे तक होली के मधुर गीतों का गायन होता है। ये परंपरा पिछले 250 सालों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही जीवंत है।मंदिर में विराजमान भगवान श्याम की प्रतिमा जोधपुर नरेश राव गांगा को उनके विवाह में दहेज के रूप में मिली थी। राव गांगा (1515-1531) का विवाह सिरोही के राव जगमाल की पुत्री रानी देवड़ी से हुआ था। विदाई के समय राव जगमाल ने बेटी की भगवान कृष्ण के प्रति गहरी आस्था देखकर कृष्ण की मूर्ति और ठाकुरजी की सेवा के लिए सेवग जीवराज को भी दहेज में जोधपुर भेज दिया। पहले ये मूर्ति किले में स्थापित की गई, फिर शहर की जूनी धान मंडी में विक्रम संवत 1818 में भव्य मंदिर बनवाकर प्रतिष्ठित की गई। चूंकि राव गांगा ने इसे स्थापित किया, इसलिए इन्हें गंगश्यामजी कहा जाता है।

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हीया कोठारी बनी साध्वी ह्रींनेमिरेखाश्रीजी बनीं

सिरोही (महावीर जैन)। दीक्षा दानेश्वरी आचार्य भगवंत गुणरत्नसूरी समुदाय के आचार्य रविरत्नसूरी एवं रश्मिरत्नसूरी की निश्रा में कृष्णगंज में 21 वर्षीय हीया कोठारी ने रविवार को विजयममुहूर्त में सांसारिक जीवन से संयम जीवन ग्रहण कर लिया। दीक्षा लेकर वे साध्वी हेमलरेखाश्रीजी की शिष्या बनी। नेमिनाथ भगवान की परम भक्त हीया का नूतन साध्वी के रूप में नामकरण ह्रींनेमिरेखाश्रीजी रखा गया हैं। वे प्रवर्तनी गुरूमैया पुण्यरेखाश्रीजी की 490 वीं शिष्या बनी। कृष्णगंज में दीक्षा मंडप में गिरनार तीर्थ की रचना कर परमात्मा नेमीनाथ के समक्ष आचार्य रविरत्नसूरीने जब दीक्षा के लिए रजोहरण यानि ओगा उन्हे अर्पित किया तो हीया नाचने लगी ओर उन्होंने दीक्षा नाण में विराजित तीन प्रमात्माओं के समक्ष तीन प्रदक्षिणा देकर परमात्मा के प्रति हर्षित भावों से उनका आभार व्यक्त किया।कहा कि उनको संयम जीवन मिले उसका सपना चतुर्विद संघ के समक्ष आज पूरा हुआ। दीक्षीर्थी ने दीक्षा के बाद काम आने वाले उपकरणों के साथ गाजते-बाजते एवं नाचते हुए मंडप में प्रवेश किया तो दीक्षार्थी अमर रहो, दीक्षार्थी नो जय-जयकार से भक्तों ने मंडप को गुंजायमान कर दिया। मंडप पर सभी गुरूदेवों एवं साध्वीयों को वंदन कर हीया ने उनसे आर्शीवाद लिया। उसके बाद हीया के माता-पिता एवं परिवार के सभी सदस्यों ने विजय तिलक कर उसे संयम जीवन की शुभकामनाएं व विजयभव का आर्शीवाद दिया। हीया की गुरूमैया हेमलरेखाश्रीजी ने 7 वर्ष की आयु में दीक्षा लेकर दीक्षा के 26 वर्ष पूर्ण होने पर वे गुरूमाता बनी। जिस पर उनका भी चतुर्विद संघ ने वधामणा किया।सांसारिक मोह माया का त्याग कर साध्वी का वेश धारण कर वे मंडप में ढोल ढमाको एवं वधामणे के साथ पहुंची तो विदुषी साध्वी गुणज्ञरेखाश्रीजी ने केश लोचन की विधि कर हीया के सिर के बाल हाथों से उखाड़े तब पंडाल में उपस्थित श्राविकाओं ने पार्लर में किसी पुरूष के हाथ से ब्यूटी या मसाज नहीं कराने का व्रत आचार्य की साक्षी में धारण कर एक नई पहल की तो मंडप में करतलध्वनी से उनका अभिनंदन किया गया।इस अवसर पर जामनगर में विराजित 490 शिष्याओं की गुरूमैया प्रवर्तनी साध्वीश्री पुण्यरेखाश्रीजी ने हीया की दीक्षा पर भेजे अपने आर्शीवचन में कहा कि इस पंचम काल में भी जैन समाज में त्याग व तपस्या का डंका कायम है। मंडप में दीक्षा के अवसर पर वैराग्य से परिपूर्ण मारे नेम प्रिय जाउ हैं का भक्ति गीत रिलीज किया गया।दीक्षीर्थी हीया एवं उनकी माता कला बेन व पिताश्री विनोद कोठारी का जैन संघ, कृष्ण्गंज की ओर से पंचमहाजनानों ने तिलक-हार-शॉल व अभिनंदन पत्र देकर बहुमान किया। कहा कि हीया ने साध्वी के रूप में पहली दीक्षा ग्रहण कर कृष्णगंज एवं आबूगोड समाज को गौरान्वित किया हैं जिसका हमें गर्व हैं।दीक्षा के बाद हित शिक्षा प्रदान करते हुए आचार्य रविरत्नसूरी एवं रश्मिरत्नसूरी ने कहा कि हीया ने दीक्षा लेकर गुरू चरणों में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है और वो अब आत्मा की खोज में डूब जाएगी। उन्होंने कहा कि संयम जीवन अपनाने वाला बहुत बड़ा त्यागी होता हैं वो अपने जीवन में सर्वपाप प्रवृतियों को त्याग कर धर्म आराधना तपस्चर्या एवं साधना में लीन हो जाता हैं। नमक खारा होने पर भी मानव नमक तक का भी त्याग जीवन में नहीं कर पाता हैं, लेकिन संयम जीवन में वो सब त्याग कर देता हैं और यही सयंम व त्याग धर्मबल को मजबूत बनाता हैं।वर्षीदान कर सांसारिक सामग्री का दान-पुण्य कियादीक्षा के पहले शनिवार को हीया ने वर्षीदान के वरघोड़े में ंअपने हाथों से अनेक सासांरिक सामग्री का दान-पुण्य किया और इस वरघोड़े में 36 कौम ने दीक्षार्थी हीया का फूलमालाओं एवं अक्षत से वधामणा कर उसके संयम मार्ग पर चलने के निर्णय की जय जयकार की। दीक्षा समारोह में आबूगोड के 27 गांवों के समाज बन्धुओं ने उपस्थित होकर साधु-साध्वी भगवंतों के दर्शन वदंन कर दीक्षार्थी व उसके माता-पिता को अपनी शुभकामनाएं दी ओर दीक्षीर्थी को भेंट किए जाने वाले उपकरणों को वोहराने यानि अर्पण का लाभ लिया।दीक्षा के बाद आचार्य रविरत्नसूरी ने अचलगढ के लिए व रश्मिरत्नसूरी ने पाली के लिए विहार किया।

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होलाष्टक: 15 दिन मांगलिक कार्यों पर रोक: दवे

सिरोही। होली से आठ दिन पूर्व होलाष्टक एवं होली से सात दिन बाद शीतला सप्तमी तक माताजी का अगता होने से कुल 15 दिन तक समस्त शुभ कार्यों पर रोक रहेगी।ज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे ने बताया कि फाल्गुन शुक्ला अष्टमी मंगलवार से फाल्गुन पूर्णिमा मंगलवार 3 मार्च तक कुल आठ दिन होलाष्टक रहेगा तथा होलाष्टक समाप्त होते ही चैत्र कृष्ण प्रतिपदा बुधवार 4 मार्च से चैत्र कृष्ण सप्तमी मंगलवार 10 मार्च अर्थात शीतला सप्तमी तक कुल सात दिन माताजी का अगता रहेगा। इस प्रकार होलाष्टक एवं अगता होने से कुल 15 दिन शुभ कार्यों पर रोक रहेगी। इस अवधि में गृह प्रवेश, विवाह मुहूत्र्त, मुंडन, देव प्रतिष्ठा आदि मांगलिक कार्य नहीं हो सकेंगे। भारतीय ज्योतिष, लौकिक एवं स्थानीय मान्यतानुसार इस अवधि में मानसिक तनाव दूर करने, मौज-मस्ती, हास-परिहास, व्यंग्य-विनोद, हंसी-ठिठोली, फाग-गायन, चंगवादन, हुडदंग, गेरनृत्य, ढूंढ, सामाजिक मेलजोल बढ़ाने तथा चेचक से बचाव के लिए 15 दिन तक समस्त शुभ कार्यों पर रोक रहती है। इन दिनों में आकाशीय ग्रह शिथिल रहते हैं। जिससे उनका प्रभाव नकारात्मक रहता है। इसी कारण मनुष्य के शरीर की प्रकृति शिथिल हो जाती है तथा दिन में नींद, सुस्ती व आलस्य का प्रभाव बढ़ जाता है तथा रात्रि की नींद कम हो जाती है।क्या होता है होलाष्टकआचार्य प्रदीप दवे ने बताया कि होली से पूर्व जो आठ दिन होते है। उसे होलाष्टक कहते है। इस अवधि में ग्रहों के शिथिल होने से उनका प्रभाव नकारात्मक होने मांगलिक कार्य करने की मनाही है।क्या होता है अगतालौकिक धार्मिक एवं स्थानीय मान्यता अनुसार चेचक से बचने के लिए होली दहन से शीतला सप्तमी तक ओरी व शीतला माता को प्रसन्न किया जाता है। इसके लिए समस्त महत्वपूर्ण कार्य रोक कर बड़ी चेचक से बचने के लिए शीतला माता व छोटी चेचक से बचने के लिए ओरी माता की पूजा की जाती है व महिलाएं माताजी के भजन व गीत गाती है। पहले चेचक का बहुत प्रकोप रहता था और छोटेे बच्चे काल के ग्रास बन जाते थे। अत: बड़ी चेचक व छोटी चेचक से बचने के लिए शीतला व ओरी माता के भजन, गीत तथा ठंडा भोजन का प्रसाद चढाकर शीतला व ओरी माता को प्रसन्न किया जाता था।

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मुमुक्षु हीया कोठारी 22 को बनेगी साध्वी

सिरोही। जैन समाज के भगवान नेमीनाथ का पथ स्वीकार करने वाली कृष्णगंज निवासी हीया कोठारी का तीन दिवसीय दीक्षा महोत्सव शुक्रवार को कृृष्णगंज में शुरु होगा। महोत्सव के पहले दिन गुरू भगवंतों का सामैया होगा। दूसरे दिन वर्षीदान शोभायात्रा, मुमुक्षु हीया का अंतिम वायणा (भोजन) व शाम 7 बजे संसारिक जीवन को अलविदा समारोह होगा। तीसरे रत्नत्रयी का प्राप्ति कार्यक्रम में चर्तुविद संघ के समक्ष दीक्षा विधि होगी। दीक्षा दिलाने के लिए आचार्य भगवंत रविरत्नसूरी, रश्मिरत्नसूरी एवं जयेशरत्नसूरी शनिवार को कृष्णगंज पहुंचेंगे। हीया ने मास्टर ऑफ साइन्स में इन्ॅफोरमेशन टेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के बाद उनमें संसार के प्रति विरक्त भाव जागे ओर उन्होंने दीक्षा दानेश्वरी आचार्य गुणरत्नसूरी के समुदाय में दीक्षा लेने के लिए धार्मिक क्षेत्र में प्रवेश किया। मुमुक्षा हीया कोठारी ने कहा कि वे प्रभु नेम के वात्सल्य के सागर में डूबने के लिए दीक्षा ग्रहण कर रही हैं। दीक्षार्थी के माता-पिता कला बेन-विनोद कुमार कोठारी ने शुभाशीर्वाद दिया। दीक्षार्थी के पावापुरी तीर्थ में दर्शन आगमन पर तीर्थ संस्थापक केपी संघवी परिवार की प्रमुखा तपस्वीरत्न श्रीमती रतनबेन बाबूलाल संघवी ने मुमुक्षु हीया बेन एवं उनकी माता कलाबेन एवं पिताश्री विनोद भाई कोठारी का तिलक-माला एवं शॉल ओढाकर बहुमान किया।

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धर्म एवं यात्रा समाचार: आस्था और पर्यटन के संगम से आध्यात्मिक अनुभव

धर्म एवं यात्रा समाचार भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत न केवल अपनी विविध धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां मौजूद तीर्थ स्थल और धार्मिक यात्राएं लाखों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और आत्मिक अनुभव प्रदान करती हैं। धर्म और यात्रा का यह संगम जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। भारत में धार्मिक यात्राओं का महत्व भारत में धार्मिक यात्राएं सदियों से आस्था और विश्वास का प्रतीक रही हैं। चार धाम यात्रा, कुंभ मेला, अमरनाथ यात्रा, वैष्णो देवी और अन्य तीर्थ स्थलों की यात्रा श्रद्धालुओं के जीवन का अहम हिस्सा मानी जाती है। धर्म एवं यात्रा समाचार के अनुसार, इन यात्राओं से व्यक्ति को आत्मिक संतोष और मानसिक शांति मिलती है। धार्मिक पर्यटन से बढ़ती अर्थव्यवस्था धार्मिक यात्रा केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। तीर्थ स्थलों पर बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या से स्थानीय रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। धर्म एवं यात्रा समाचार बताता है कि धार्मिक पर्यटन से होटल, परिवहन और स्थानीय व्यवसायों को लाभ मिलता है। आधुनिक सुविधाओं से आसान हुई यात्राएं आज के समय में तकनीक और सरकारी योजनाओं के कारण धार्मिक यात्राएं पहले से कहीं अधिक सुविधाजनक हो गई हैं। ऑनलाइन पंजीकरण, बेहतर सड़कें और यात्री सुविधाएं श्रद्धालुओं के अनुभव को बेहतर बना रही हैं। धर्म एवं यात्रा समाचार में यह बदलाव खास तौर पर देखने को मिलता है। आध्यात्मिकता और आत्मिक शांति का अनुभव धार्मिक यात्रा केवल स्थल भ्रमण नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मिक शुद्धि का अवसर भी प्रदान करती है। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों की यात्रा से व्यक्ति जीवन के उद्देश्य को समझने का प्रयास करता है। यही कारण है कि धर्म एवं यात्रा समाचार लोगों को आस्था से जोड़ता है। भविष्य में धर्म एवं यात्रा की दिशा आने वाले समय में धार्मिक पर्यटन और भी संगठित और आधुनिक होने की उम्मीद है। डिजिटल सेवाएं, पर्यावरण संरक्षण और सतत पर्यटन पर जोर दिया जा रहा है। इससे धर्म और यात्रा का अनुभव और अधिक सार्थक बनेगा। निष्कर्ष कुल मिलाकर, धर्म एवं यात्रा समाचार यह दर्शाता है कि आस्था और पर्यटन का यह संगम न केवल आत्मिक संतोष देता है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास में भी योगदान करता है। धार्मिक यात्राएं जीवन में शांति, विश्वास और सकारात्मकता का संचार करती हैं।

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