Author name: Kamlesh Purohit

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वन्यजीवों के हलक तर करने पहुंचा एक लाख लीटर पानी

वन्यजीवों के हलक तर करने पहुंचा एक लाख लीटर पानी 26 टैंकरों के माध्यम से पहल ग्रुप का सराहनीय कार्य सिरोही। शहर में मानवता और प्रकृति प्रेम की एक प्रेरणादायक मिसाल देखने को मिली है। भीषण गर्मी के बीच वन्यजीवों की प्यास बुझाने के लिए पहल ग्रुप सिरोही ने एक बार फिर सराहनीय कदम उठाया है। हर साल की तरह इस वर्ष भी ग्रुप के सदस्यों ने वाडा खेड़ा जोड़ क्षेत्र में स्थित नाड़ी में पानी की व्यवस्था कर वन्यजीवों को बड़ी राहत दी है। पहल ग्रुप के सदस्यों की ओर से एक साथ 26 पानी के टैंकरों के माध्यम से लगभग एक लाख लीटर पानी वाडा खेड़ा की नाड़ी में डाला गया। गर्मी के मौसम में जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में पानी के स्रोत सूखने लगते हैं, ऐसे में यह प्रयास वन्यजीवों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रहा है। केवल पानी की ही व्यवस्था नहीं की गई, बल्कि वन्यजीवों के भोजन का भी ध्यान रखा गया। ग्रुप की ओर से ककड़ी, गाजर और आलू जैसी खाद्य सामग्री भी वहां रखवाई गई, ताकि गर्मी के दिनों में पानी के साथ-साथ वन्यजीवों को भोजन भी मिल सके। ग्रुप के सदस्यों ने बताया कि यह अभियान सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं रहेगा। आज से अगले करीब तीन महीनों तक प्रतिदिन एक पानी का टैंकर इस नाड़ी में डलवाया जाएगा, जिससे भीषण गर्मी के दौरान वन्यजीवों को पानी की कमी का सामना न करना पड़े। सालभर समाजसेवा में सक्रिय रहता है पहल ग्रुप पहल ग्रुप केवल गर्मियों में पानी की व्यवस्था तक ही सीमित नहीं है। यह समूह पूरे साल विभिन्न सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाता है। ग्रुप की ओर से शहर में जरूरतमंद लोगों, पशुओं और वन्यजीवों की सहायता के लिए समय-समय पर कई पहल की जाती हैं। शहर में जगह-जगह लगाए गए पानी के कैंपर गर्मी के मौसम में आमजन को राहत देने के लिए शहर के अलग-अलग स्थानों पर लगाए गए पानी के कैंपर भी इसी ग्रुप की पहल का परिणाम हैं। इन कैंपरों से राहगीरों और जरूरतमंद लोगों को पीने का ठंडा पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। पहल ग्रुप का संचालन सहायक उप निरीक्षक सचेंद्र रतनू के नेतृत्व में किया जा रहा है। इस समूह में करीब 95 सदस्य जुड़े हुए हैं। सभी सदस्य हर महीने स्वेच्छा से अंशदान एकत्रित करते हैं और इसी राशि से सामाजिक व सेवा कार्यों को अंजाम दिया जाता है। यह राशि वन्यजीवों, गायों और जरूरतमंद असहाय लोगों की मदद में खर्च की जाती है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सदस्य रहे मौजूद वन्यजीवों के लिए पानी की व्यवस्था के इस कार्यक्रम में ग्रुप के सभी सदस्यों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस दौरान सचेंद्र रतनू, भेरूपाल सिंह (अधिवक्ता), हेमंत पुरोहित, हरदयाल सिंह, शैतान खरोर, गणपत लाल, अमजद खान, सज्जन सिंह, एम.पी. सिंह, करण सिंह, अशोक माली, हनुमान प्रजापत, दिग्विजय सिंह, तख्तसिंह पुरोहित, भरत माली, विनोद मालवीय, मुकेश खंडेलवाल, कमलेश सोनी, महादेव, प्रदीप वैष्णव, मंछाराम, किशन माली, भंवर माली, लालचंद खंडेलवाल, राहुल माली, अशोक माली, भैराराम और मांगीलाल रावल सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे। पहल ग्रुप का यह प्रयास न केवल वन्यजीवों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि समाज के सामने सेवा, संवेदना और प्रकृति संरक्षण का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। ऐसे कार्य यह संदेश देते हैं कि यदि समाज के लोग मिलकर पहल करें, तो पर्यावरण और जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए बड़े बदलाव संभव हैं।

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10 मार्च को मनाई जाएगी शीतला सप्तमी, 9 मार्च को रांधन छठ

सिरोही। शीतला सप्तमी अर्थात चैत्र कृष्ण सप्तमी मंगलवार तथा रांधण छठ- चैत्र कृष्ण षष्ठी सोमवार को मान्य रहेगी। ज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे एवं शीतला माता मंदिर पुजारी ओमप्रकाश वैष्णव ने बताया कि शीतला माता पूजन का शुभ मुहूर्त प्रात: 4-15 से 9-01, 9-52 से 2-16, सायं 3-44 से 5-12 बजे एवं सायं गोधुलिक वेला में 06-32 से रात्रि 09-10 तक श्रेष्ठ है, साथ ही इस बार वीदर (बिच्छुडा) पेटा में होने एवं मंगलवार सुषुप्त होने तथा सप्तमी तिथि पूजन की मान्यता होने से सप्तमी तिथि को पूरे दिन पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा।इस समय बनाए बासोड़ाशीतला माता का महाप्रसाद (भोग) बनाने का शुभ मुहूर्त चैत्र कृष्ण षष्ठी (रांधण षठ) सोमवार प्रात: शुभ वेला में 6-57 से 8-25, 9-53 से 11-21, मध्यान्ह 12-25 से 01-12 अभिजित मुहुर्त एवं सायं 04-16 से 06-40 बजे तक शुभ वेला में श्रेष्ठ रहेगा।शीतला माताजी के पूजन के विशेष नियमशीतला माता को ज्योत नहीं होती है। कपूर व अगरबत्ती नहीं जलाना चाहिए। दही, म_ा, छाछ आदि खाने-पीने की सामग्री माताजी के सामने प्रसाद के रुप में चढाई जाती है। अत: खाने-पाने पीने की सामग्री माताजी के सिर पर गिरानी या ढोलनी नहीं चाहिए। परिवार की सुरक्षा के लिए श्रीफल हमेशा अखण्ड चढता है अत: श्रीफल या नारियल को तोड़ कर नहीं चढाएं। श्रीफल (नारियल) पर यथाशक्ति भेंट रख कर माताजी को अर्पण करने से समृद्धता बढती है तथा अकाल मृत्यु का नाश होता है। शीतला माता के हाथ में झाडू है, इसका मतलब बीमारियों की रोकथाम के लिए स्वच्छता का ध्यान रखना जरुरी हैबासी भोजन का वैज्ञानिक महत्ववैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो इस मौसम में खाना एक या दो दिन पड़ा रहता है तो खाने पर फफूंद लगनी शुरु हो जाती है। वैज्ञानिक इस फफूंद को ‘पेनासिलीन’ नाम से पुकारते हैं। इस फफूंद को माइक्रोस्कोप द्वारा आसानी से देखा जा सकता है। इस प्रकार प्राकृतिक रुप से पैदा हुई फफूंद शरीर में जाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा होती है। जिससे चेचक, घमोरिया, फोड़े-फुन्सी व गर्मी जनित बीमारियां नहीं होती है। आजकल इस फफूंद के इंजेक्शन बाजार में पेनिसिलिन के नाम से उपलब्ध है। जबकि प्राचीन काल से ऐसी मान्यता चली आ रही है कि शीतला माता व ओरी माता को प्रसन्न करने से चेचक नहीं होती है। आज भी माताजी के मंदिर में जाकर शीतला व ओरी माता का पूजन कर बासोड़े का भोग लगाते है।

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नेशनल वन स्टार एंड्योरेंस चैंपियनशिप 7–8 मार्च को जयपुर में

जयपुर/जोधपुर। भारतीय अश्वारोहण खेल के लिए गौरव का विषय है कि लगभग एक दशक बाद जयपुर में 100 किमी नेशनल वन स्टार एंड्योरेंस चैंपियनशिप 2025–26 का आयोजन किया जा रहा है। यह प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रतियोगिता 07 एवं 08 मार्च 2026 को बेगास रोड, सांझरिया (आरईसी मणिपाल यूनिवर्सिटी के समीप) स्थित Royal Equestrian Club परिसर में आयोजित होगी। यह आयोजन Equestrian Federation of India के तत्वावधान में तथा Rajasthan Equestrian Association के सहयोग से संपन्न होगा। महासंघ के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय आयोजन प्रतियोगिता के मुख्य संयोजक एवं रॉयल इक्वेस्ट्रियन क्लब के निदेशक कैप्टन मुकेश सिंह शक्तावत ने बताया कि प्रतियोगिता अंतरराष्ट्रीय तकनीकी दिशानिर्देशों, नियमों एवं विनियमों के अनुरूप संचालित की जाएगी। देश के विभिन्न राज्यों से चयनित घुड़सवार इसमें भाग लेंगे और अपनी सहनशक्ति, कौशल एवं रणनीति का प्रदर्शन करेंगे।7 मार्च को प्रातः 5 बजे फ्लैग ऑफ, चैंपियनशिप का विधिवत शुभारंभ 07 मार्च 2026 को प्रातः 5:00 बजे फ्लैग ऑफ के साथ होगा।उद्घाटन अवसर पर जनप्रतिनिधि एवं विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहेंगे।प्रतियोगिता का समापन 08 मार्च 2026 की सायंकाल होगा, जिसमें विजेता खिलाड़ियों को सम्मानित एवं पुरस्कृत किया जाएगा। जूरी की देखरेख में पारदर्शी संचालन चैंपियनशिप की निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु जूरी का गठन किया गया है। ईएफआई के कर्नल जगत सिंह द्वारा निम्न अधिकारियों को जूरी सदस्य नियुक्त किया गया है। इसमें कर्नल अशोक यादव,कर्नल सरप्रताप सिंह,कर्नल सी. एस. सोहल सदस्य नियुक्त किए गए है। एंड्योरेंस चैंपियनशिप के इवेंट कॉर्डिनेटर एवं जोधपुर के राइडर दुष्यंत सिंह मेड़तिया ने बताया कि सफल आयोजन के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया गया है। मुख्य जिम्मेदारियां इस प्रकार हैं। दुष्यंत सिंह मेड़तिया (राठौड़)– इवेंट कॉर्डिनेटर, रामूराम देवासी – कैम्प इंचार्ज, हरभजन सिंह – अस्तबल मैनेजर, जयराम देवासी – आवास एवं अन्य व्यवस्थाएं संभालेंगे।  100 किमी नेशनल वन स्टार एंड्योरेंस क्या है? कॉर्डिनेटर दुष्यंत सिंह राठौड़ ने बताया कि यह घुड़सवारी (Equestrian) की एंड्योरेंस विधा की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता है, जिसमें घुड़सवार और उसका घोड़ा निर्धारित समय सीमा के भीतर 100 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करते हैं।  100 किमी वन स्टार इवेंट में भाग लेने वाले राइडर्स सामान्यतः 40 किमी एवं 80 किमी स्तर पूर्ण कर चुके होते हैं। यह राष्ट्रीय सीनियर श्रेणी में प्रवेश का महत्वपूर्ण चरण है। प्रतियोगिता की प्रक्रिया कैसे होती है? 100 किमी दूरी को विभिन्न चरणों (Loops) में विभाजित किया जाता है।  हर चरण के बाद वेटरनरी चेक (Vet Check) होता है, जिसमें घोड़े की— हार्ट रेट, सांस, चाल (Gait), डिहाइड्रेशनमांसपेशियों की स्थिति की जांच की जाती है। यदि घोड़ा फिट नहीं पाया जाता, तो राइडर को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इसलिए यह खेल “घोड़े की सुरक्षा पहले” के सिद्धांत पर आधारित है। राष्ट्रीय पहचान और भविष्य के अवसर यह आधिकारिक राष्ट्रीय चैंपियनशिप है। प्रदर्शन के आधार पर राइडर्स की राष्ट्रीय रैंकिंग बनती है। वन स्टार स्तर सफलतापूर्वक पूरा करने पर खिलाड़ी आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए पात्र बन सकते हैं। राजस्थान के लिए गौरव का अवसर करीब दस वर्षों बाद जयपुर में 100 किमी राष्ट्रीय वन स्टार एंड्योरेंस चैंपियनशिप का आयोजन राज्य के अश्वारोहण खेल के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली एंड्योरेंस खेल के प्रमुख केंद्र हैं। रेगिस्तानी एवं खुले ट्रैक के कारण राजस्थान एंड्योरेंस के लिए आदर्श माना जाता है।इवेंट कॉर्डिनेटर दुष्यंत सिंह ने कहा कि 100 किमी नेशनल वन स्टार एंड्योरेंस चैंपियनशिप केवल एक रेस नहीं, बल्कि घुड़सवार और घोड़े के बीच विश्वास, संतुलन और सहनशक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा है।यह प्रतियोगिता राष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है और इसमें सफलता भविष्य में बड़े अवसरों के द्वार खोल सकती है।

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कीलों पर सोकर खाटू श्याम के दर्शन को चला सोनू

मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के सबलगढ़ निवासी सोनू खाटूश्याम के लक्खी मेले में शरीक होने निकला। उसकी आस्था इस कदर है कि वह 21 सौ बड़ी कीलों पर सोकर आस्था का सफर कर रहा है। सोनू पिछले 4 दिनों से 2100 लोहे की कीलों पर पेट पलायन करते हुए रींगस से खाटूश्यामजी की ओर बढ़ रहा है। भक्ति की इस अनोखी साधना में कीलें करीब 5 इंच लंबी हैं, जिनका कुल वजन लगभग 26 किलोग्राम बताया जा रहा है। इन्हीं कीलों पर पेट पलायन करते हुए सोनू करीब 17 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर रहा है। श्याम भक्त सोनू ने बताया- वह पिछले 3 वर्षों से फाल्गुनी मेले में इसी तरह कठिन यात्रा कर बाबा श्याम के दरबार में हाजिरी लगा रहा है। इस वर्ष भी 6 दिन की यात्रा पूरी कर एकादशी पर बाबा श्याम के दर्शन करेगा। वह अभी खाटू मंदिर से 6-7 किलोमीटर दूर है।सोनू ने कहा- उसकी एक ही मनोकामना है हर वर्ष बाबा श्याम इसी तरह बुलाते रहे। उसकी इस अटूट आस्था और संकल्प को देखकर मार्ग में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो रहे हैं और जयकारों के साथ उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं।विश्व प्रसिद्ध बाबा श्याम का फाल्गुन मेला 21 फरवरी से शुरू हो गया। मेले के 5वें दिन विदेश से आए हरे और गुलाबी रंग के फूलों से बाबा श्याम का आकर्षक शृंगार किया गया। शृंगार में फूलों के साथ लाल वेलवेट के कपड़े पर गोल्डन क?ाई और गुलाबी कढाईदार गोटे का बागा पहनाया गया है। सुबह से मेले में बाबा श्याम के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ रही। सीकर में बाबा खाटूश्यामजी का फाल्गुनी लक्खी मेले में 5वें दिन रंगत देखने को मिल रही है। अब तक करीब साढे 5 लाख से ज्यादा भक्त बाबा श्याम के दर्शन कर चुके हैं। श्याम बाबा का हरे और गुलाबी फूलों से बुधवार को शृंगार किया गया। ये फूल विदेश से मंगाए गए।  श्याममयी भजनों के बीच जयकारे लगाते हुए श्याम बाबा के दर्शन करते हुए श्रद्धालु मन्नतें मांग रहे हैं। रींगस से खाटू तक निशान लेकर बढ रहे पदयात्रियों के बीच तिल रखने को भी जगह नहीं है। भीड़ बढने के कारण लखदातार ग्राउंड के जिगजैग खोल दिए गए हैं। इससे श्रद्धालुओं को करीब 2 किलोमीटर तक चक्कर लगाना पड़ रहा है। खाटू पहुंचने के बाद दर्शन करने में श्रद्धालुओं को 1 घंटे से भी कम समय लग रहा है। मंदिर परिसर को ऊं लिखे सफेद दुपट्टों से सजाया गया है। इसके नीचे चटख लाल रंग की झालरें लटकाई गई हैं। श्याम बाबा के दरबार में सभी 14 लाइनों में चलते हुए श्रद्धालु खाटूश्यामजी के दर्शन कर रहे हैं।

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बाल विवाह रोकथाम के लिए आमजन को प्रेरित करें : अल्पा चौधरी

सिरोही। कृषि विभाग के आत्मा सभागार में मंगलवार को जिला कलक्टर अल्पा चौधरी की अध्यक्षता में जिला बाल संरक्षण इकाई एवं बाल अधिकारिता विभाग की त्रैमासिक समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में जिले में संचालित विभिन्न बाल संरक्षण योजनाओं, अभियानों एवं समन्वयात्मक गतिविधियों की बिंदुवार समीक्षा की गई तथा संबंधित विभागों को समयबद्ध एवं प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश प्रदान किए गए। बैठक में बाल विवाह मुक्त सिरोही अभियान की प्रगति पर विशेष चर्चा करते हुए जिला कलक्टर ने निर्देशित किया कि ग्राम पंचायत स्तर पर अधिकाधिक जनभागीदारी सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं, विद्यालयों, आंगनवाड़ी केन्द्रों एवं सामुदायिक आयोजनों के माध्यम से बाल विवाह के दुष्परिणामों के संबंध में व्यापक जागरूकता फैलाई जाए। महिला अधिकारिता विभाग द्वारा आयोजित अमृता मेले में बाल विवाह मुक्त सिरोही विषय पर आकर्षक एवं जानकारी पूर्ण स्टॉल लगाकर आमजन को बाल संरक्षण कानूनों, चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 तथा बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम की जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए। जिला परिवहन अधिकारी को जिले में संचालित बाल वाहिनियों (स्कूल वाहनों) की नियमित जांच करने, ओवरलोडिंग पर सख्त कार्यवाही करने तथा ऐसे ऑटो रिक्शा एवं अन्य वाहनों के विरुद्ध कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए जो अवैध रूप से बाल वाहिनी के रूप में संचालित किए जा रहे हैं।अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जसाराम को निर्देशित किया गया कि जिले के समस्त राजकीय एवं गैर-राजकीय विद्यालयों की 200 मीटर परिधि में तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए नियमित निरीक्षण, चालान एवं कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही जिले में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए चिन्हित संवेदनशील स्थानों पर नियमित गश्त करने के निर्देश दिए। नगरीय निकायों को उन क्षेत्रों में पर्याप्त स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश प्रदान किए गए। महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देशित किया गया कि जिले की सभी आंगनवाड़ी केन्द्रों में बिजली, पेयजल एवं शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता का भौतिक सत्यापन कर आवश्यक सुधारात्मक कार्यवाही की जाए। जिससे बच्चों एवं महिलाओं को सुरक्षित एवं अनुकूल वातावरण उपलब्ध हो सके। सहायक निदेशक राजेन्द्र कुमार पुरोहित ने विभाग द्वारा संचालित योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। बैठक में अध्यक्ष बाल कल्याण समिति सुश्री रतन बाफना, सदस्य शशिकला मरडिया एवं प्रताप सिंह नून, पुलिस विभाग से मोहनसिंह राव, अतिरिक्त जिला शिक्षा अधिकारी भंवरलाल पुरोहित, विजय कुमार व्यास, अधीक्षक राजकीय सम्प्रेक्षण एवं किशोर गृह भंवरसिंह, श्रम कल्याण अधिकारी हंसदीप, उपनिदेशक सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग किशनाराम लोल, सहायक निदेशक महिला अधिकारिता विभाग श्रीमती अंकिता राजपुरोहित, जिला परिवहन अधिकारी अक्षमिता,संरक्षण अधिकारी कन्हैयालाल, कार्डिनेटर 1098 मनोहरसिंह, काउन्सलर प्रिंससिंह, कनिष्ठ सहायक प्रकाश कुमार, आउटरिच वर्कर दिलीप धवल आदि मौजूद थे।

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अभिनेत्री रस्मिका व विजय 26 को लेंगे फेरे, उदयपुर पहुंचे

उदयपुर। साउथ इंडियन फिल्मी अभिनेता विजय देवरकोंडा व अभिनेत्री रस्मिका मंडाना उदयपुर-नाथद्वारा हाईवे पर कैलाशपुरी में आइटीसी मोमेंटोज होटल में सात फेरे लेंगे। दोनों सोमवार को अलग- अलग उदयपुर पहुंचे। शादी 26 फरवरी को है। होटल की बुकिंग 24 से 26 फरवरी तक के लिए हुई है। शादी में करीब 230 गेस्ट शमिल होंगे। मेहमान 24 फरवरी को होटल में चेक-इन करेंगे।सोमवार सुबह दोनों अलग-अलग फ्लाइट से उदयपुर पहुंचे। करीब 10 बजे रश्मिका और उसके करीब 15 मिनट बाद विजय आए। यहां से दोनों एक साथ होटल के लिए रवाना हुए। रश्मिका ब्लू सूट में और काला चश्मा लगाकर बाहर आईं। विजय ने ब्लैक जैकेट पहनी थीं।शादी का एक कार्ड भी वायरल हुआ था। 3 और 4 मार्च को हैदराबाद में रिसेप्शन देंगे, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री की कई हस्तियां शामिल होंगी। यह रिसेप्शन हैदराबाद या बंजारा हिल्स की किसी प्रीमियम लोकेशन पर होने की चर्चा है।विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना ने 3 अक्टूबर को हैदराबाद में सगाई की थी। ये एक प्राइवेट सेरेमनी थीं, जिसमें कपल के परिवार के चंद लोग ही शामिल हुए थे। इसके बाद रश्मिका को कई मौकों पर इंगेजमेंट रिंग के साथ स्पॉट किया गया था।

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बच्चन को बेस्ट सपोर्टिंक एक्टर अवार्ड, साउथ फिल्म फेयर अवार्ड्स

कोच्चि। केरल के कोच्चि में सत्तरवेंं साउथ फिल्म फेयर अवार्ड्स के दौरान अमिताभ बच्चन को फिल्म कल्कि 2676 एडी के लिए बेस्ट सपोर्टिंग मेल का अवार्ड दिया गया। यह उनका पहला साउथ फिल्म फेयर अवार्ड है। फिल्म में अमिताभ बच्चन ने अश्वत्थामा का रोल निभाया था।इस सेरेमनी में तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री की बेहतरीन फिल्मों और कलाकारों को सम्मानित किया गया। फिल्म पुष्पा 2 ने तेलुगु कैटेगरी में पांच अवॉर्ड जीते, जिनमें बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर (सुकुमार) और बेस्ट एक्टर (अल्लू अर्जुन) शामिल रहे। तमिल कैटेगरी में फिल्म अमरन ने सात अवॉर्ड अपने नाम किए, जिनमें बेस्ट फिल्म, बेस्ट एक्टर (सिवकार्तिकेयन) और बेस्ट एक्ट्रेस (साई पल्लवी) शामिल हैं। मलयालम सिनेमा से सुपरस्टार ममूटी को ब्रमायुगम के लिए बेस्ट एक्टर चुना गया। लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिवंगत एक्टर-फिल्ममेकर श्रीनिवासन को मरणोपरांत दिया गया।फिल्म कल्कि 2898एडी 27 जून 2024 को रिलीज हुई थी। इसने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल करते हुए दुनियाभर में 1,000 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी।फिल्मफेयर अवॉर्ड्स साउथ (तेलुगु) 2026 में फिल्म ने दो अवॉर्ड्स जीते, बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (मेल) का अवॉर्ड अमिताभ बच्चन ने जीता। बेस्ट प्रोडक्शन डिजाइन का अवॉर्ड नितिन जियानी चौधरी को मिला। हालांकि, अमिताभ बच्चन इस सेरेमनी में शामिल नहीं हुए। फिल्मफेयर अवॉर्ड्स साउथ टाइम्स ग्रुप की फिल्मफेयर मैगजीन द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। फिल्मफेयर अवॉर्ड्स की शुरुआत 1954 में हुई थी, शुरुआत में केवल हिंदी फिल्मों के लिए यह सेरेमनी होती थी।1964 में दक्षिण भारतीय भाषाओं (तमिल-तेलुगु) के लिए अवॉर्ड्स की शुरुआत हुई। वहीं, मलयालम 1967 में और कन्नड़ भाषा की फिल्में 1970 में शामिल हुईं। समय के साथ हर इंडस्ट्री के लिए अलग सेरेमनी आयोजित होने लगी। पहले ये सेरेमनी मुंबई में हिंदी फिल्मों के अवॉर्ड्स के साथ होती थी, लेकिन 1976 के बाद साउथ सेगमेंट को अलग कर चेन्नई और हैदराबाद में शिफ्ट किया गया।

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गंगश्यामजी मंदिर: बसंत पंचमी से रंग पंचमी तक होली की मस्ती

जोधपुर। भीतरी शहर स्थित गंगश्यामजी मंदिर में फागोत्सव चरम पर है। यहां पूरे पैंतालिस दिन तक होली का जश्न चलता है। श्रद्धालुओं के साथ विदेशी सैलानी भी यहां होली खेलते है।मंदिर में उत्सव की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है और रंग पंचमी तक जारी रहती है। इस रंगारंग उत्सव में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और भक्ति के रंग में रंग जाते हैं। सबसे खास बात ये है कि मंदिर में 250 सालों से होली खेलने की परम्परा निभाई जा रही है।मंदिर के पुजारी बताते हैं कि सुबह 12 से 2 बजे तक गुलाल और पुष्पों से होली खेली जाती है, जबकि रात 8 से 11 बजे तक होली के मधुर गीतों का गायन होता है। ये परंपरा पिछले 250 सालों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही जीवंत है।मंदिर में विराजमान भगवान श्याम की प्रतिमा जोधपुर नरेश राव गांगा को उनके विवाह में दहेज के रूप में मिली थी। राव गांगा (1515-1531) का विवाह सिरोही के राव जगमाल की पुत्री रानी देवड़ी से हुआ था। विदाई के समय राव जगमाल ने बेटी की भगवान कृष्ण के प्रति गहरी आस्था देखकर कृष्ण की मूर्ति और ठाकुरजी की सेवा के लिए सेवग जीवराज को भी दहेज में जोधपुर भेज दिया। पहले ये मूर्ति किले में स्थापित की गई, फिर शहर की जूनी धान मंडी में विक्रम संवत 1818 में भव्य मंदिर बनवाकर प्रतिष्ठित की गई। चूंकि राव गांगा ने इसे स्थापित किया, इसलिए इन्हें गंगश्यामजी कहा जाता है।

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हीया कोठारी बनी साध्वी ह्रींनेमिरेखाश्रीजी बनीं

सिरोही (महावीर जैन)। दीक्षा दानेश्वरी आचार्य भगवंत गुणरत्नसूरी समुदाय के आचार्य रविरत्नसूरी एवं रश्मिरत्नसूरी की निश्रा में कृष्णगंज में 21 वर्षीय हीया कोठारी ने रविवार को विजयममुहूर्त में सांसारिक जीवन से संयम जीवन ग्रहण कर लिया। दीक्षा लेकर वे साध्वी हेमलरेखाश्रीजी की शिष्या बनी। नेमिनाथ भगवान की परम भक्त हीया का नूतन साध्वी के रूप में नामकरण ह्रींनेमिरेखाश्रीजी रखा गया हैं। वे प्रवर्तनी गुरूमैया पुण्यरेखाश्रीजी की 490 वीं शिष्या बनी। कृष्णगंज में दीक्षा मंडप में गिरनार तीर्थ की रचना कर परमात्मा नेमीनाथ के समक्ष आचार्य रविरत्नसूरीने जब दीक्षा के लिए रजोहरण यानि ओगा उन्हे अर्पित किया तो हीया नाचने लगी ओर उन्होंने दीक्षा नाण में विराजित तीन प्रमात्माओं के समक्ष तीन प्रदक्षिणा देकर परमात्मा के प्रति हर्षित भावों से उनका आभार व्यक्त किया।कहा कि उनको संयम जीवन मिले उसका सपना चतुर्विद संघ के समक्ष आज पूरा हुआ। दीक्षीर्थी ने दीक्षा के बाद काम आने वाले उपकरणों के साथ गाजते-बाजते एवं नाचते हुए मंडप में प्रवेश किया तो दीक्षार्थी अमर रहो, दीक्षार्थी नो जय-जयकार से भक्तों ने मंडप को गुंजायमान कर दिया। मंडप पर सभी गुरूदेवों एवं साध्वीयों को वंदन कर हीया ने उनसे आर्शीवाद लिया। उसके बाद हीया के माता-पिता एवं परिवार के सभी सदस्यों ने विजय तिलक कर उसे संयम जीवन की शुभकामनाएं व विजयभव का आर्शीवाद दिया। हीया की गुरूमैया हेमलरेखाश्रीजी ने 7 वर्ष की आयु में दीक्षा लेकर दीक्षा के 26 वर्ष पूर्ण होने पर वे गुरूमाता बनी। जिस पर उनका भी चतुर्विद संघ ने वधामणा किया।सांसारिक मोह माया का त्याग कर साध्वी का वेश धारण कर वे मंडप में ढोल ढमाको एवं वधामणे के साथ पहुंची तो विदुषी साध्वी गुणज्ञरेखाश्रीजी ने केश लोचन की विधि कर हीया के सिर के बाल हाथों से उखाड़े तब पंडाल में उपस्थित श्राविकाओं ने पार्लर में किसी पुरूष के हाथ से ब्यूटी या मसाज नहीं कराने का व्रत आचार्य की साक्षी में धारण कर एक नई पहल की तो मंडप में करतलध्वनी से उनका अभिनंदन किया गया।इस अवसर पर जामनगर में विराजित 490 शिष्याओं की गुरूमैया प्रवर्तनी साध्वीश्री पुण्यरेखाश्रीजी ने हीया की दीक्षा पर भेजे अपने आर्शीवचन में कहा कि इस पंचम काल में भी जैन समाज में त्याग व तपस्या का डंका कायम है। मंडप में दीक्षा के अवसर पर वैराग्य से परिपूर्ण मारे नेम प्रिय जाउ हैं का भक्ति गीत रिलीज किया गया।दीक्षीर्थी हीया एवं उनकी माता कला बेन व पिताश्री विनोद कोठारी का जैन संघ, कृष्ण्गंज की ओर से पंचमहाजनानों ने तिलक-हार-शॉल व अभिनंदन पत्र देकर बहुमान किया। कहा कि हीया ने साध्वी के रूप में पहली दीक्षा ग्रहण कर कृष्णगंज एवं आबूगोड समाज को गौरान्वित किया हैं जिसका हमें गर्व हैं।दीक्षा के बाद हित शिक्षा प्रदान करते हुए आचार्य रविरत्नसूरी एवं रश्मिरत्नसूरी ने कहा कि हीया ने दीक्षा लेकर गुरू चरणों में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है और वो अब आत्मा की खोज में डूब जाएगी। उन्होंने कहा कि संयम जीवन अपनाने वाला बहुत बड़ा त्यागी होता हैं वो अपने जीवन में सर्वपाप प्रवृतियों को त्याग कर धर्म आराधना तपस्चर्या एवं साधना में लीन हो जाता हैं। नमक खारा होने पर भी मानव नमक तक का भी त्याग जीवन में नहीं कर पाता हैं, लेकिन संयम जीवन में वो सब त्याग कर देता हैं और यही सयंम व त्याग धर्मबल को मजबूत बनाता हैं।वर्षीदान कर सांसारिक सामग्री का दान-पुण्य कियादीक्षा के पहले शनिवार को हीया ने वर्षीदान के वरघोड़े में ंअपने हाथों से अनेक सासांरिक सामग्री का दान-पुण्य किया और इस वरघोड़े में 36 कौम ने दीक्षार्थी हीया का फूलमालाओं एवं अक्षत से वधामणा कर उसके संयम मार्ग पर चलने के निर्णय की जय जयकार की। दीक्षा समारोह में आबूगोड के 27 गांवों के समाज बन्धुओं ने उपस्थित होकर साधु-साध्वी भगवंतों के दर्शन वदंन कर दीक्षार्थी व उसके माता-पिता को अपनी शुभकामनाएं दी ओर दीक्षीर्थी को भेंट किए जाने वाले उपकरणों को वोहराने यानि अर्पण का लाभ लिया।दीक्षा के बाद आचार्य रविरत्नसूरी ने अचलगढ के लिए व रश्मिरत्नसूरी ने पाली के लिए विहार किया।

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होलाष्टक: 15 दिन मांगलिक कार्यों पर रोक: दवे

सिरोही। होली से आठ दिन पूर्व होलाष्टक एवं होली से सात दिन बाद शीतला सप्तमी तक माताजी का अगता होने से कुल 15 दिन तक समस्त शुभ कार्यों पर रोक रहेगी।ज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे ने बताया कि फाल्गुन शुक्ला अष्टमी मंगलवार से फाल्गुन पूर्णिमा मंगलवार 3 मार्च तक कुल आठ दिन होलाष्टक रहेगा तथा होलाष्टक समाप्त होते ही चैत्र कृष्ण प्रतिपदा बुधवार 4 मार्च से चैत्र कृष्ण सप्तमी मंगलवार 10 मार्च अर्थात शीतला सप्तमी तक कुल सात दिन माताजी का अगता रहेगा। इस प्रकार होलाष्टक एवं अगता होने से कुल 15 दिन शुभ कार्यों पर रोक रहेगी। इस अवधि में गृह प्रवेश, विवाह मुहूत्र्त, मुंडन, देव प्रतिष्ठा आदि मांगलिक कार्य नहीं हो सकेंगे। भारतीय ज्योतिष, लौकिक एवं स्थानीय मान्यतानुसार इस अवधि में मानसिक तनाव दूर करने, मौज-मस्ती, हास-परिहास, व्यंग्य-विनोद, हंसी-ठिठोली, फाग-गायन, चंगवादन, हुडदंग, गेरनृत्य, ढूंढ, सामाजिक मेलजोल बढ़ाने तथा चेचक से बचाव के लिए 15 दिन तक समस्त शुभ कार्यों पर रोक रहती है। इन दिनों में आकाशीय ग्रह शिथिल रहते हैं। जिससे उनका प्रभाव नकारात्मक रहता है। इसी कारण मनुष्य के शरीर की प्रकृति शिथिल हो जाती है तथा दिन में नींद, सुस्ती व आलस्य का प्रभाव बढ़ जाता है तथा रात्रि की नींद कम हो जाती है।क्या होता है होलाष्टकआचार्य प्रदीप दवे ने बताया कि होली से पूर्व जो आठ दिन होते है। उसे होलाष्टक कहते है। इस अवधि में ग्रहों के शिथिल होने से उनका प्रभाव नकारात्मक होने मांगलिक कार्य करने की मनाही है।क्या होता है अगतालौकिक धार्मिक एवं स्थानीय मान्यता अनुसार चेचक से बचने के लिए होली दहन से शीतला सप्तमी तक ओरी व शीतला माता को प्रसन्न किया जाता है। इसके लिए समस्त महत्वपूर्ण कार्य रोक कर बड़ी चेचक से बचने के लिए शीतला माता व छोटी चेचक से बचने के लिए ओरी माता की पूजा की जाती है व महिलाएं माताजी के भजन व गीत गाती है। पहले चेचक का बहुत प्रकोप रहता था और छोटेे बच्चे काल के ग्रास बन जाते थे। अत: बड़ी चेचक व छोटी चेचक से बचने के लिए शीतला व ओरी माता के भजन, गीत तथा ठंडा भोजन का प्रसाद चढाकर शीतला व ओरी माता को प्रसन्न किया जाता था।

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