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अंगूठा छाप भी बन सकेंगे गांवों के सियासी मुखिया – पंचायत चुनाव Rajasthan

राज्य सरकार हो चाहे केंद्र सरकार साक्षरता मिशन को लेकर डींगे हांक रही है,लेकिन अबकी बार होने वाले पंचायत चुनाव Rajasthan में निरक्षरता भी उम्मीदवार की पात्रता में आड़े नहीं आएगी। सरकार के पास फिलहाल नियमों में संशोधन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है, जिसका मतलब साफ़ है कि अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग भी पूर्व की भांति चुनाव लड़ सकेंगे। राजस्थान में एक बार फिर गांवों की सरकार चुनने का समय आ रहा है। इस बार के पंचायत चुनाव पिछले एक दशक के सबसे अलग चुनाव होने जा रहे हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदान की प्रक्रिया से लेकर उम्मीदवारों की योग्यता तक कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि 1 जनवरी 2026 को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा भी इस बार अपनी ग्राम सरकार चुनने के लिए मतदान कर सकेंगे। खास तौर से चर्चा थी कि राज्य सरकार दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवारों को चुनाव लडऩे की अनुमति दे सकती है और शैक्षणिक योग्यता को भी अनिवार्य बना सकती है। हालांकि, राज्य सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर साफ कर दिया है कि निकट भविष्य में पात्रता नियमों में किसी बड़े बदलाव की कोई योजना नहीं है। राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदान की प्रक्रिया से लेकर उम्मीदवारों की योग्यता तक कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। आयोग को 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव की संपूर्ण प्रक्रिया पूरी करनी है। 1 जनवरी 2026 की योग्यता तिथि के आधार पर नई वोटर लिस्ट तैयार की जा रही है। प्रदेश की 14,000 से अधिक ग्राम पंचायतों में चुनाव चरणबद्ध तरीके से मार्च और अप्रैल 2026 के बीच संपन्न होने की संभावना है। अब इवीएम नहीं, बैलेट पेपर से होगा चुनाव इस बार के चुनावों में जो सबसे चौंकाने वाला बदलाव हुआ है, वह है हाइब्रिड मॉडल। पंच और सरपंच इन दोनों पदों के लिए मतदान पारंपरिक तरीके से बैलेट पेपर (मतपत्र) और मतपेटी के जरिए होगा। यानी अब आपको बटन नहीं दबाना होगा, बल्कि मुहर लगानी होगी।जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य के लिए मतदान इवीएम के जरिए ही किया जाएगा। इधर उम्मीदवार की आयु कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए। फिलहाल राजस्थान में पंचायती राज चुनाव के लिए शैक्षिक योग्यता (जैसे 8वीं या 10वीं पास) की अनिवार्यता को लेकर पिछली सरकार ने ढील दी थी, लेकिन चुनाव लडऩे के लिए उम्मीदवार का नाम उस पंचायत की मतदाता सूची में होना अनिवार्य है। वे लोग जिनके दो से अधिक बच्चे हैं, उन्हें राहत के लिए अभी और इंतजार करना होगा। दो संतान नीति को हटाने पर विचार-विमर्श लंबे समय से चल रहा है। यह मामला अभी प्रक्रिया में है। कैबिनेट ने अभी तक इस संबंध में कोई बिल पास नहीं किया है और न ही कोई नया नियम लागू हुआ है। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से चर्चा थी कि सरकार 27 नवंबर 1995 के बाद तीसरी संतान होने पर चुनाव लडऩे की पाबंदी को हटा सकती है। वहीं उम्मीदवारी के लिए घर में कार्यात्मक शौचालय होना और परिवार के सदस्यों का खुले में शौच न जाना एक अनिवार्य शर्त है।

राज्य-शहर, राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट की यूजीसी नए नियमों पर फिलहाल रोक

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने कहा कि इसके प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर की है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। यूजीसी ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था। इनका देशभर में विरोध हो रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही नियमों का ड्राफ्ट फिर से तैयार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अगली सुनवाई अब 19 मार्च को होगी।यूजीसी के नए कानून का नाम है प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026। इसके तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई निर्देश दिए गए थे। नए नियमों के तहत, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने का निर्देश दिया गया। सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं। हालांकि, सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि यूजीसी ने जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और इससे कॉलेजों में अराजकता पैदा होगी। सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि नए नियमों में सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ बना दिए गए हैं। इनसे उनके खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा।

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