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April 2026

How Ulloor Krishi Bhavan in Thiruvananthapuram is handholding small scale farmers
लाइफस्टाइल

उल्लूर कृषिभवन: तिरुवनंतपुरम में छोटे किसानों के लिए सहारा, आधुनिक खेती से जोड़ रहा नया भविष्य

तिरुवनंतपुरम, भारत। तिरुवनंतपुरम में स्थित उल्लूर कृषिभवन ने छोटे पैमाने के किसानों को सहायता प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कृषिभवन ने “उल्लूर ग्रीन्स” नामक ब्रांड के तहत कृषि उत्पादों और मूल्य संवर्धित उत्पादों को बाज़ार में लेकर किसानों की आमदनी बढ़ाने का काम किया है। उल्लूर कृषिभवन ने न केवल उत्पादों के लिए एक खुदरा आउटलेट स्थापित किया है, बल्कि ऑनलाइन बिक्री की भी सुविधा उपलब्ध करवाई है। इससे किसानों को सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ने का अवसर मिला है और उनकी उत्पादों की पहुंच व्यापक हुई है। यह पहल स्थानीय कृषि समुदाय के लिए आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग खोल रही है। कृषिभवन के अधिकारियों ने बताया कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य छोटे किसानों को न केवल तकनीकी सहायता प्रदान करना है, बल्कि उनकी पैदावार की गुणवत्ता और विपणन के लिए भी समुचित मार्गदर्शन देना है। “उल्लूर ग्रीन्स” ब्रांड के तहत उत्पादित फलों और सब्जियों के अलावा मूल्य संवर्धित खाद्य पदार्थ भी उपलब्ध हैं, जो उपभोक्ताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कृषिभवन ने किसानों को आधुनिक खेती के तरीकों, जैविक उत्पादन और फसल विविधीकरण के लिए प्रशिक्षण भी दिया है। इस पहल से किसानों को बेहतर उत्पादकता और बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिली है। क्षेत्रीय कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में सहायक होगी और ग्रामीण विकास को गति प्रदान करेगी। उपभोक्ताओं को भी ताजे और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद सीधे किसानों से मिल रहे हैं, जो स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए लाभकारी है। समाप्त करते हुए, उल्लूर कृषिभवन की यह पहल न केवल किसानों के लिए लाभकारी है, बल्कि यह तिरुवनंतपुरम की कृषि अर्थव्यवस्था को स्थायी विकास की ओर ले जाने वाला कदम भी साबित हो रही है। भविष्य में इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी अपनाने की योजना बनाई जा रही है ताकि अधिक से अधिक किसानों को इसका लाभ मिल सके।

Almost 60% of India’s elephants are in Karnataka, Assam, T.N.
राज्य-शहर

भारत के 60% हाथी सिर्फ 3 राज्यों में! जानिए क्यों खास हैं कर्नाटक, असम और तमिलनाडु

नई दिल्ली: वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) ने देशभर में हाथियों की पहली बार डीएनए आधारित समकालिक गणना जारी की है। इस अध्ययन में सामने आया है कि भारत के लगभग 60 प्रतिशत हाथी तीन राज्यों – कर्नाटक, असम और तमिलनाडु – में पाए जाते हैं। यह रिपोर्ट हाथी संरक्षण और उनकी आवासीय स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हाथी भारत का राष्ट्रीय धरोहर प्राणी है और वन्यजीवन में इसकी अहमियत न केवल पारिस्थितिक तंत्र के लिए, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश में हाथियों की संख्या और उनकी आबादी पर नजर रखना इनके संरक्षण के लिए आवश्यक होता है। इस उद्देश्य से वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने नवीनतम तकनीकों का प्रयोग करते हुए डीएनए आधारित पुनरावृत्ति परीक्षण के माध्यम से देशभर में हाथियों की संख्या का सटीक आकलन किया है। इस अध्ययन के अनुसार, कुल हाथी आबादी में कर्नाटक का हिस्सा सबसे बड़ा है, जिसके बाद असम और तमिलनाडु का स्थान आता है। कर्नाटक में विशाल वनों की उपलब्धता और संरक्षित क्षेत्रों की संख्या अधिक होने से हाथियों की संख्या यहाँ सर्वाधिक देखी गई है। असम, जो भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में है, भी हाथी संरक्षण के लिए जाना जाता है, जबकि तमिलनाडु के जंगलों में भी हाथियों की अच्छी-खासी आबादी मौजूद है। विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत में हाथियों की संख्यात्मक समीक्षा का यह पहला बड़ा प्रयास है जो डीएनए आधारित तकनीक पर आधारित है। इससे पारंपरिक सर्वेक्षणों की तुलना में अधिक विश्वसनीय और सटीक आंकड़े प्राप्त हुए हैं। इससे वन विभाग को संरक्षण रणनीतियों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी जिससे हाथियों के संघर्ष को कम किया जा सकेगा और प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा, “हाथियों की सही संख्या का आंकलन उनके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाने में बड़ी भूमिका निभाएगा। हमारा लक्ष्य हाथियों और मनुष्यों के बीच संतुलन बनाए रखना और इनके आवासों का संरक्षण करना है।” उन्होंने यह भी बताया कि आगे भी इसके जैसे आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर वन्यजीवन की गहन निगरानी जारी रखी जाएगी। इस रिपोर्ट ने जहां हाथी संरक्षण में एक नया अध्याय जोड़ा है, वहीं यह नीति निर्माताओं के लिए भी दिशा-निर्देश प्रदान करती है कि किस प्रकार से वन्यजीव संरक्षण योजनाओं में सुधार किया जाए। कर्नाटक, असम और तमिलनाडु सरकारों को विशेष रूप से अपने-अपने राज्यों में हाथियों के आवासों को सुरक्षित करने और मानव-हाथी टकराव को कम करने के लिए तत्पर रहना होगा। देश में हाथी आबादी बढ़ाने के साथ-साथ उनके प्राकृतिक आवासों को संरक्षित करना आवश्यक है ताकि जैव विविधता बनी रहे और हाथी संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें। यह अध्ययन वन्यजीव संरक्षण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्व को दर्शाता है और कहा जा सकता है कि भविष्य में ऐसे आधुनिक अध्ययन और भी ज्यादा प्रभावी साबित होंगे।

In Focus Podcast | Has gold lost its safe haven status?
विशेषज्ञों की राय

In Focus Podcast: | क्या बाजार की उथल-पुथल के बीच सोने ने अपना ‘सेफ हेवन’ स्टेटस खो दिया ?

बढ़ती अस्थिरता, ऊंची ब्याज दरें और वैश्विक संघर्षों के बीच सोने की पारंपरिक “सेफ हेवन” भूमिका पर सवाल विश्व भर में जारी वैश्विक तनाव के बीच सोने की कीमतों में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई है। इस नए आर्थिक परिदृश्य में निवेशकों की निगाहें इस बहुमूल्य धातु की स्थिरता पर टिक गई हैं। इस एपीसोड में, कवित चौक और बी. भगवान दास से चर्चा के माध्यम से हम जानेंगे कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई और इससे निवेशकों तथा बाजार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। पिछले कुछ महीनों में सोने ने पारंपरिक सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में अपनी विश्वसनीयता साबित की है। लेकिन, हाल की वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक घटनाओं ने सोने के मूल्य को प्रभावित किया है। वैश्विक मुद्रास्फीति, ब्याज दरों में बदलाव, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अनिश्चितता के कारण निवेशकों ने अपने पोर्टफोलियो में विविधता लानी शुरू कर दी है। कविता चौक ने कहा, “अक्सर आर्थिक संकट या geopolitical तनाव के दौरान निवेशक सोने की ओर रुख करते हैं क्योंकि यह एक सुरक्षित आश्रय माना जाता है। लेकिन इस बार, बाजार में अल्पकालिक और दीर्घकालिक कारकों के मिश्रण के कारण, सोने की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है।” वहीं, बी. भगवान दास ने बताया कि वैश्विक आर्थिक नीतियों में तेजी से बदलाव और कुछ देशों की मुद्रास्फीति नियंत्रण की रणनीतियों का भी सोने की मांग और आपूर्ति पर असर पड़ा है। विश्लेषकों के अनुसार, हालिया गिरावट का एक कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि का संकेत भी है। उच्च ब्याज दरें आम तौर पर सोने जैसे गैर ब्याज आधारित संपत्ति के लिए चुनौतीपूर्ण होती हैं। इसके अलावा, डॉलर की ताकत में बढ़ोतरी भी सोने की कीमतों को दबाव में रखती है क्योंकि सोने की कीमतें अमेरिकी डॉलर में निर्धारित होती हैं। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि इस गिरावट को लंबे समय तक नहीं माना जाना चाहिए। आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्यों में तेजी से बदलाव होने के कारण सोने की मांग पुनः बढ़ सकती है। निवेशकों को सावधानी बरतते हुए बाजार की गतिशीलता और फंडामेंटल संकेतों पर ध्यान देना आवश्यक होगा। इस एपीसोड में, कवित और भगवान दास ने गहराई से इन विषयों पर चर्चा की और बताया कि निवेशक वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में कैसे अपने निवेश विकल्पों का मूल्यांकन करें। सोने की आज की स्थिति को समझने के लिए यह एक महत्वपूर्ण संवाद है जो निवेशकों एवं आम जनता दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

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सरजावाव चौराहा बना ‘खतरे का कॉरिडोर’

रासूखात की हूल या प्रशासन की चुप्पी? सिरोही। शहर के मुख्य दरवाजे से जुड़ी सडक़ों की हालत आज सवालों के घेरे में है। जहां एक ओर प्रशासन विकास और सुचारू यातायात के बड़े-बड़े दावे करता है, वहीं दूसरी ओर हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। सरजावाव चौराहे से राजमाता धर्मशाला रोड तक का हिस्सा इन दिनों बदहाली, अतिक्रमण और अव्यवस्था का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है। हालांकि हाथ लारी की कोई परेशानी नहीं है। वे अपना सामान बेच चलता बनते है। दुखद पहलू तो यह है कि यहां स्थायी दुकानदार अतिक्रमण की पहल में शुमार है। यह सडक़ न केवल शहर के मुख्य प्रवेश मार्ग से जुड़ी है, बल्कि रोडवेज डिपो जाने वाले यात्रियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण रास्ता है। बावजूद इसके, यहां की स्थिति ऐसी है कि हर गुजरने वाला व्यक्ति खुद को जोखिम में महसूस करता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस क्षेत्र में अतिक्रमण करने वालों का हौसला इतना बढ़ गया है कि यदि कोई उन्हें टोकने की कोशिश करता है तो वे राजनीतिक रासूख का हवाला देने लगते है। यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक ढील और राजनीतिक संरक्षण अतिक्रमण को बढ़ावा दे रहे हैं। सरजावाव चौराहा, अतिक्रमण और गड्ढे का ‘डेंजर जोन’ सरजावाव चौराहा, जो शहर का एक प्रमुख आवाजाही का जंक्शन है, इन दिनों दुर्घटनाओं का केंद्र बन गया है। राजमाता धर्मशाला रोड के मुहाने पर स्थित एक मिष्ठान भंडार ने अपनी दुकान के बाहर लगभग 10 से 15 फीट तक सडक़ पर कब्जा कर रखा है। इतना ही नहीं, सडक़ के बीचों-बीच नाली पर बना गड्ढा स्थिति को और खतरनाक बना देता है। इस कारण से पूरी सडक़ सिकुडक़र मात्र 5 से 7 फीट रह गई है। हालात यह है कि दोपहिया वाहन चालक रोजाना गिरते-पड़ते है। चार पहिया वाहनों का निकलना तो कोई जंग से कम नहीं। अतिक्रमण के कारण सडक़ पर टेबल-कुर्सियां, दुकान का सामान और ग्राहकों के वाहन बेतरतीब खड़े रहते हैं। इससे हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है। कई बार तो स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि एम्बुलेंस या इमरजेंसी वाहन भी फंस सकते हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि एक संभावित बड़ा खतरा है जो कभी भी गंभीर हादसे का रूप ले सकता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस सडक़ से रोजाना प्रशासनिक अधिकारी गुजरते हैं। नगर परिषद भी महज कुछ फर्लांग की दूरी पर स्थित है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सडक़ एक ‘डेंजर जोन’ की तरह है। कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। जहां तक नियमों की बात करें तो सार्वजनिक सडक़ों पर अतिक्रमण पूरी तरह प्रतिबंधित है। दोषी पाए जाने पर जुर्माना और हटाने की कार्रवाई अनिवार्य है। इसके बावजूद यदि कार्रवाई नहीं हो रही है, तो यह प्रशासनिक विफलता मानी जा सकती है। शहरवासियों का साफ कहना है कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह बिना किसी दबाव के अतिक्रमण हटाने की मुहिम चलाए और इस सडक़ को सुरक्षित बनाए।

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महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव में उमड़ा श्रद्धा और उत्साह

सिरोही में गूंजा ‘अहिंसा परमो धर्म’ का संदेश सिरोही। शहर में इस वर्ष भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और भव्यता के साथ मनाया गया। जैन समाज द्वारा आयोजित इस पावन अवसर ने पूरे शहर को धार्मिक रंग में रंग दिया, जहां हर ओर अहिंसा परमो धर्म और जियो और जीने दो के संदेश गूंजते नजर आए। इस महोत्सव ने न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ किया, बल्कि सामाजिक समरसता और विश्व शांति के संदेश को भी व्यापक रूप से जन-जन तक पहुंचाया। महोत्सव की शुरुआत प्रात:कालीन प्रभात फेरी से हुई। सुबह-सुबह श्रद्धालु भक्ति गीतों और भगवान महावीर के जयकारों के साथ शहर की प्रमुख गलियों से होकर निकले। इस दौरान वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिससे आयोजन का महत्व और भी बढ़ गया। इसके बाद भव्य वरघोड़ा और शोभायात्रा का आयोजन किया गया, जो महोत्सव का मुख्य आकर्षण रहा। सजी-धजी झांकियों, बैंड-बाजों और पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालुओं ने इस शोभायात्रा को यादगार बना दिया। भगवान महावीर के जीवन प्रसंगों को दर्शाती झांकियों ने लोगों को उनके आदर्शों की याद दिलाई। शोभायात्रा के दौरान श्रद्धालु वर्धमान वीर की जय के उद्घोष करते हुए आगे बढ़ते रहे। शहर के विभिन्न स्थानों पर लोगों ने इस शोभायात्रा का स्वागत किया और पुष्प वर्षा कर अपनी श्रद्धा प्रकट की। महोत्सव के अंतर्गत विभिन्न मंदिरों में विशेष पूजन-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर के चरणों में शीश नवाकर अपने जीवन में शांति, संयम और सदाचार की कामना की। पूजन कार्यक्रमों में जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया। आचार्यों और विद्वानों ने अपने प्रवचनों में बताया कि सच्चा धर्म बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और सरल जीवनशैली में निहित होता है। स्वामी वात्सल्य और सेवा कार्य धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ समाजसेवा की भावना भी इस महोत्सव में देखने को मिली। स्वामी वात्सल्य कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में लोगों को भोजन प्रसादी वितरित की गई। इसके अलावा दिव्यांगजनों को मिठाई वितरित कर मानवता और करुणा का परिचय दिया गया। यह पहल इस बात का प्रतीक थी कि भगवान महावीर का संदेश केवल उपदेशों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतारा जा रहा है। गांधी पार्क योग संस्थान में इस अवसर पर एक विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में विश्व शांति, सद्भाव और मानव कल्याण के लिए प्रार्थना की गई। योग प्रशिक्षकों और समाजसेवियों ने इस दौरान कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भगवान महावीर के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। आज जब दुनिया हिंसा, अशांति और संघर्षों से जूझ रही है, तब अहिंसा का सिद्धांत ही मानवता को सही दिशा दे सकता है। रात्रि में भक्ति संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें भजन-कीर्तन के माध्यम से भगवान महावीर की महिमा का गुणगान किया गया। भक्तों ने देर रात तक भक्ति में लीन होकर आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया। भक्ति संध्या ने पूरे आयोजन को एक भावनात्मक और आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की, जहां हर व्यक्ति भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता नजर आया। समाज में एकता का आह्वान इस अवसर पर समाजसेवी जय विक्रम हरण और नितेश जैन उर्फ लाला भाई ने जैन समाज को एकजुट रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि समाज को छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठकर एकता और सहयोग की भावना को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने सभी से भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाने और समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया। कार्यक्रम में कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया, जिनमें भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के रामेश्वर लाल, योग प्रशिक्षक भीक सिंह भाटी, समाजसेवी जय विक्रम हरण, टीकम भाई सिंधी, योगाचार्य रामचंद्र, आशुतोष पटनी और गोविंद भाई शामिल रहे। इन सभी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और लोगों को नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करते हैं। भगवान महावीर के जीवन का संदेश भगवान महावीर का जीवन त्याग, तपस्या, संयम और अहिंसा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह सिखाया कि सच्ची खुशी बाहरी भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति में निहित होती है। उनका सिद्धांत जियो और जीने दो आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो गया है। यह सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत जीवन में शांति लाता है, बल्कि समाज में भी सह-अस्तित्व और सद्भाव को बढ़ावा देता है। वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया कई तरह की चुनौतियों से जूझ रही है—चाहे वह युद्ध हो, पर्यावरण संकट हो या सामाजिक असमानता—ऐसे में भगवान महावीर के विचार एक मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। उनकी अहिंसा की शिक्षा हमें यह सिखाती है कि किसी भी समस्या का समाधान हिंसा से नहीं, बल्कि शांति और संवाद से संभव है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर झांकें और अपने विचारों और कर्मों को शुद्ध करें।

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