सिरोही। कभी ग्लोबल वार्मिंग की चिंता, कभी जंगलों की कटाई पर बहस, तो कभी धरती के अंधाधुंध दोहन की खबरें। इन सबके बीच अब एक नया चमत्कार देखने को मिल रहा है। लगता है जैसे प्रकृति ने भी लोकतंत्र अपना लिया हो और सभी ऋतुओं को एक साथ भागीदारी दे दी हो। सुबह-सुबह जब नींद खुलती है तो लगता है मानो सर्दी ने फिर से वापसी कर ली हो। लोग कंबल में दुबके रहते हैं, चाय की चुस्की लेते हुए सोचते हैं कि अभी तो अप्रेल है, ये जनवरी वाला एहसास क्यों? लेकिन जैसे ही घड़ी दोपहर की ओर बढ़ती है, वही सर्दी अचानक छुट्टी पर चली जाती है और गर्मी बिना बुलाए मेहमान की तरह आ धमकती है। धूप इतनी तेज कि लगता है सूरज ने भी ओवरटाइम शुरू कर दिया है। दोपहर में पंखा, कूलर और एसी सब एक साथ चालू हो जाते हैं, और लोग सोचते हैं कि अब तो पूरी तरह गर्मी आ गई। लेकिन शाम होते-होते आसमान का मिजाज बदल जाता है। बादल घिर आते हैं, हवा में नमी बढ़ जाती है और कभी-कभी तो बारिश भी ऐसे होती है जैसे सावन का महीना चल रहा हो। अगर किस्मत ज्यादा मेहरबान हो तो ओले भी गिर जाते हैं। मानो मौसम ने सरप्राइज पैकेज दे दिया हो। सडक़ किनारे पेड़ों को देखें तो वे भी कंफ्यूज नजर आते हैं। कहीं हरे-भरे पत्ते, तो कहीं सूखे पत्तों की चादर बिछी हुई जैसे पतझड़ और बसंत ने समझौता कर लिया हो आखिर ये सब हो क्यों रहा है? विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ग्लोबल वार्मिंग का असर है। यानी पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है। लेकिन आम आदमी की भाषा में कहें तो प्रकृति अब नाराज है। वर्षों से हो रही जंगलों की कटाई, नदियों का सूखना, पहाड़ों का टूटना और जमीन का अंधाधुंध इस्तेमाल इन सबने मिलकर मौसम को भी अस्थिर कर दिया है। पहले जहां हर ऋतु का अपना एक तय समय होता था। सर्दी सर्दियों में, गर्मी गर्मियों में और बारिश अपने मौसम में। अब वो समय-सारणी भी गड़बड़ा गई है। ऐसा लगता है जैसे मौसम विभाग की फाइलें भी मिश्रित हो गई हों और किसी को समझ नहीं आ रहा कि कौनसी ऋतु कब आएगी। इस बदलाव का असर सिर्फ लोगों की दिनचर्या पर ही नहीं, बल्कि खेती-किसानों पर भी पड़ रहा है। किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं। वे तय नहीं कर पा रहे कि कब बोवाई करें और कब कटाई। बारिश समय पर नहीं होती, या फिर इतनी ज्यादा हो जाती है कि फसल खराब हो जाती है। कभी ओले गिर जाते हैं, तो कभी अचानक गर्मी बढ़ जाती है। जिससे फसलें झुलस जाती हैं। इंसान खुद इस स्थिति का जिम्मेदार है और फिर उसी पर चर्चा भी करता है। एक तरफ पेड़ों की कटाई जारी है, दूसरी तरफ पर्यावरण बचाओ के नारे लगाए जा रहे हैं। प्लास्टिक का उपयोग कम करने की बात होती है, लेकिन बाजार में हर चीज प्लास्टिक में ही मिलती है। यानी हम समस्या भी खुद पैदा कर रहे हैं और समाधान भी भाषणों में ढूंढ रहे हैं। सिरोही जैसे छोटे शहरों में भी अब बड़े शहरों जैसी समस्याएं दिखने लगी हैं। पहले यहां का मौसम अपेक्षाकृत संतुलित रहता था, लेकिन अब यहां भी वही मौसमी ड्रामा देखने को मिल रहा है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में शायद हमें मौसम शब्द की परिभाषा ही बदलनी पड़ेगी। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अब भी समय है संभलने का। अगर हमने अब भी ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में हालात और भी बिगड़ सकते हैं। यह सिर्फ तापमान का सवाल नहीं है, बल्कि हमारे अस्तित्व का सवाल है। अगर मौसम ही स्थिर नहीं रहेगा तो जीवन भी अस्थिर हो जाएगा।